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Showing posts from April, 2026

रतलाम का वो 'चंचल' सिपाही जिसकी किस्मत संजय गांधी के एक दौरे ने बदल दी

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(नैवेद्य पुरोहित) आज के दौर में अगर आपको किसी बड़े अखबार में नौकरी चाहिए तो रिज्यूमे, ईमेल और न जाने कितने राउंड के इंटरव्यू से गुजरना पड़ता है। लेकिन पत्रकारिता का एक दौर वो भी था जब नियुक्तियाँ न्यूज़ रूम के बंद कमरों में नहीं बल्कि 'रिश्तों की गर्माहट' और 'अदब' के साथ तय होती थीं। दैनिक भास्कर इंदौर लॉन्चिंग टीम के गुमनाम नायक सीरीज में आज से हमारे नए किरदार है रमेश मिश्रा 'चंचल'। बात साल 1980 के इर्द-गिर्द की है। भोपाल की फिजाओं में सियासत और पत्रकारिता साथ-साथ परवान चढ़ रही थी। उन्हीं दिनों संजय गांधी का भोपाल आना हुआ। रमेश मिश्रा तब रतलाम के एक युवा और ऊर्जावान पत्रकार हुआ करते थे। साथ में थे उनके दोस्त कांग्रेस नेता मनोहर बैरागी जिन्हें अपना रसूख दिखाना था और कवरेज भी तगड़ा चाहिए था। उस समय भोपाल में 'दैनिक भास्कर' के सर्वेसर्वा हुआ करते थे स्व द्वारका प्रसाद अग्रवाल। रवायत कुछ ऐसी थी कि सेठजी से मिलने खाली हाथ नहीं जाया जाता था। तो साहब, एक बढ़िया फलों की डलिया सजाई गई और साथ में मनोहर बैरागी जी ने थमाया 25 हजार का एक लिफाफा विज्ञापन के लिए। ...

त्याग की दहलीज और एक शांत विदा

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(नैवेद्य पुरोहित) ज़िंदगी अक्सर हमें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है, जहाँ दो रास्तों में से एक को चुनना हमारी मजबूरी बन जाता है। एक रास्ता वह होता है जहाँ आपके सपने, आपकी पहचान और आपकी आज़ादी होती है और दूसरा रास्ता वह जो 'ज़िम्मेदारी' और 'त्याग' की मांग करता है। वर्षा जोशी के जीवन में यह मोड़ नवंबर 1986 में आया। तीन साल तक भास्कर की धड़कन बने रहने के बाद, एक दिन ऐसा आया जब उन्हें अपनी मशीनों, अपने दोस्तों और उस 'महू वाली मैडम' की पहचान को अलविदा कहना पड़ा। शादी के बाद ससुराल की ज़िम्मेदारियाँ सामने थीं। जिस परिवार में ब्याह हुआ था उनका अपना स्कूल था और अपनों का कहना था कि अब बाहर की नौकरी छोड़कर घर की ज़िम्मेदारी संभाली जाए। वर्षा याद करती हैं कि पीछे चार छोटी बहनें भी थी और एक बड़े भाई की तरह पूरे परिवार की उम्मीदों का मान रखना उनकी प्राथमिकता थी। उन्होंने भारी मन से लेकिन पूरी गरिमा के साथ उस करियर को छोड़ दिया जो अभी उड़ान भर ही रहा था। जब उन्होंने आखिरी बार दैनिक भास्कर की प्रेस से बाहर कदम रखा होगा, तो यकीनन महू जाने वाली वह ट्रेन उस दिन बहुत भारी लगी होगी। वह ...

300 रुपये का वह दौर छोटी तनख्वाह, बड़ा जुनून

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(नैवेद्य पुरोहित) आज के दौर में जब हम नौकरियों की तुलना 'पैकेज' और 'इंक्रीमेंट' से करते हैं, तब वर्षा जोशी के उस दौर की यादें हमें एक अलग ही धरातल पर ले जाती हैं। वह समय ऐसा था जब काम का पैमाना 'पैसा' नहीं, बल्कि 'जुनून' हुआ करता था। वर्षा जब अपने शुरुआती वेतन का ज़िक्र करती हैं, तो उनके चेहरे पर एक सादगी भरी मुस्कान तैर जाती है। वे बताती हैं, "उस समय तनख्वाह बहुत कम थी, शायद 300 या 350 रुपये मिलते थे।" आज की पीढ़ी के लिए यह रकम किसी मज़ाक जैसी लग सकती है, लेकिन 1983 के इंदौर में इन तीन सौ रुपयों की अपनी एक गरिमा थी। उन चंद नोटों में महीने भर का किराया, महू से इंदौर का ट्रेन पास और परिवार की छोटी-मोटी खुशियाँ सब सिमट आती थीं। लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि उस कम तनख्वाह में भी 'बरकत' बहुत थी। दैनिक भास्कर की उस लॉन्चिंग टीम में काम करने वाला हर शख्स एक बड़े मिशन पर था। प्रेस के अंदर पसीना बहाते वक्त किसी ने यह नहीं गिना कि उसे कितने रुपये मिल रहे हैं। सबकी आँखों में बस एक ही सपना था कि सुबह जब इंदौर की नींद खुले, तो उसके हाथ में द...

पुराने दिग्गज और उनकी यादें उन बुज़ुर्गों का साया, वो अनुभवों की तालीम

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(नैवेद्य पुरोहित) किसी भी संस्थान की इमारत सिर्फ ईंट-गारे से नहीं, बल्कि वहां काम करने वाले लोगों के तजुर्बों और उनकी शख़्सियत से भी बनती है। वर्षा जोशी जब भास्कर के उस दौर को याद करती है तो उनकी आँखों के सामने उन दिग्गजों के चेहरे घूम जाते हैं, जिनकी कलम की धमक पूरे शहर में सुनाई देती थी। वह दौर अजीम पत्रकारों और संजीदा संपादकों का था। वर्षा की यादों के झरोखे में सबसे रोशन नाम है हीरालाल शर्मा जी का। वह एक ऐसे पत्रकार थे जिन्हें पत्रकारिता की चलती-फिरती इबारत कहा जाता था। वर्षा बताती हैं कि हीरालाल जी जैसे वरिष्ठों की मौजूदगी ही अपने आप में एक 'अनुशासन' थी। उनके शब्द जब कागज़ पर उतरते थे, तो कंपोजिंग विभाग में वर्षा और उनकी टीम उन शब्दों को बड़ी नज़ाकत से मशीनों पर उतारती थी। वहां सिर्फ काम का रिश्ता नहीं था, बल्कि एक 'उस्ताद-शागिर्द' वाली रिवायत थी। वर्षा जी अपने सीनियर अरुण आहूजा जी को भी बड़े सम्मान से याद करती हैं। आहूजा जी के मार्गदर्शन में वह पूरी टीम एक इकाई की तरह काम करती थी। उस दौर में दफ्तर का माहौल ऐसा था कि अगर कोई वरिष्ठ पत्रकार कंपोजिंग रूम में आता...

'महू वाली मैडम': शहर के नाम से शुरू हुई एक दास्तान

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(नैवेद्य पुरोहित) इंसान की पहचान अक्सर उसके ओहदे या उसके नाम से होती है, लेकिन कभी-कभी उसकी शख्सियत उसके सफर से ऐसी जुड़ जाती है कि 'रास्ता' ही उसकी 'पहचान' बन जाता है। दैनिक भास्कर के उस दफ्तर में जहाँ बड़े-बड़े संपादकों और पत्रकारों की आवाजाही थी, वहां वर्षा जोशी की अपनी एक मुकम्मल पहचान थी। उन्हें वहां कोई उनके नाम से नहीं, बल्कि बड़े एहतराम और मोहब्बत से 'महू वाली मैडम' पुकारता था। यह एक नाम नहीं था, एक लड़की के उस जज़्बे को सलाम था, जो रोज़ाना महू से इंदौर की मुसाफ़िरी तय करके वक्त से पहले दफ्तर की सीढ़ियां चढ़ती थी। जब वह सुबह-सुबह प्रेस परिसर में दाखिल होतीं, तो उनके चेहरे पर उस थका देने वाले सफर की ज़रा भी शिकन नहीं होती थी। उर्दू में एक लफ्ज़ है 'शनाख़्त' याने पहचान। वर्षा की पहचान ही उनकी सादगी बन गई थी। पूरे ऑफिस में हर किसी की ज़बान पर वर्षा जोशी के बजाए 'महू वाली मैडम' यही नाम रहता था। यह एक तरह से खिताब था उनके लिए जो उन्हें किसी कागज़ पर नहीं मिला था, बल्कि उनकी उस अटूट निष्ठा की देन था जिसे उस संस्थान में कार्य करने वाले ल...

सखी और सहकर्मी वो सुबह 7:00 बजे का इंतज़ार

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‘दैनिक भास्कर इंदौर लॉन्चिंग टीम के गुमनाम नायक’ यह सीरीज लिखते वक्त मैंने कभी नहीं सोचा था कि ये सफर 25वीं दहलीज़ तक पहुँचेगा। बीच में ये सिलसिला थम सा गया था। वजह थी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की ग्राउंड रिपोर्टिंग और फिर राजस्थान में अपने कुलदेवता का आशीर्वाद लेने चला गया था। मीडिया की डेडलाइन और ज़िंदगी की डेडलाइन, दोनों ने कुछ दिन इस सीरीज को विराम दे दिया। पर कहानियाँ रुकती कहाँ हैं? ढेरों गुमनाम नायक अब भी कतार में हैं। उनकी आवाज़, उनका संघर्ष, उनका समर्पण शनै: शनै: सब सामने आयेगा। आज वहीं से शुरुआत कर रहा हूँ जहाँ 24वीं किस्त खत्म हुई थी वर्षा जोशी के किरदार में दैनिक भास्कर के उस दौर में तब कुछ रिश्ते इंक और कागज़ से भी गहरे बन गए थे। 25वीं किस्त एक ऐसी ही रूहानी दोस्ती की है जिसका इंतज़ार सुबह 7 बजे से शुरू होकर 8 बजे की दस्तक पर पूरा होता था। कुछ नायक हेडलाइन नहीं बनते वो हेडलाइन बनाने वालों की हिम्मत बनते हैं। वर्षा जोशी के बाद बहुत जल्द आप एक नए गुमनाम नायक से मिलेंगे। तब तक पढ़िए - सखी और सहकर्मी वो सुबह 7:00 बजे का इंतज़ार (नैवेद्य पुरोहित) कहते हैं कि एक अच्छा दो...

डेढ़ सौ साल बाद भी अपनी मिट्टी नहीं भूलें: इंदौर से धनवल तक जड़ों से जुड़ने की सच्ची दास्तान

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(नैवेद्य पुरोहित) कुछ यात्राएँ गूगल मैप के जीपीएस से नहीं दिल से होती हैं। ऐसी यात्राएँ इंसान को उसकी जड़ों, उसकी पहचान और उसकी रूह से दोबारा मिलवा देती हैं। 23 अप्रैल 2026 की रात ऐसी ही एक यात्रा की शुरुआत थी। मैं, मेरे अंकल देवेश पुरोहित (Devesh Purohit) और मेरी बुआजी का बेटा वरुण जोशी (विन्नी) इंदौर से रात में 8 बजे जैन ट्रेवल्स मुल्तानी सोना की बस में सवार हुए। रात के सफ़र की अपनी एक अलग ही ख़ामोशी होती है खिड़की के बाहर अंधेरा, भीतर यादों का उजाला, मन में अपने गांव, अपने कुलदेवता और अपनों से मिलने की बेचैनी। 24 अप्रैल की सुबह लगभग 6 बजे हम नाथद्वारा पहुँचे और न्यू कॉटेज में चेक-इन किया। थोड़ी देर तरोताज़ा होकर नाश्ता-पानी किया और सुबह 8 बजे ड्राइवर देवीसिंह पंवार के साथ निकल पड़े उस सफ़र पर जिसका इंतज़ार मेरे दिल को पूरे साल रहता है। इस बार सबसे पहला पड़ाव था गांव सुंदरचा, जहाँ मेरी नानी का मायका है। वहाँ हम मेरी परनानीजी से मिलने पहुँचे। उनकी उम्र 95 वर्ष से अधिक है लेकिन उनकी याददाश्त आज भी बेहद तेज़ है। उनसे मिलना, उनकी बातें, उनका स्नेह, उनका चेहरा झुर्रियों भरे नरम हाथ ...

एक सीट तीन पंडित: क्या जोड़ासांको (पश्चिम बंगाल) में भाजपा "विजय" का स्वाद चख पाएगी?

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(नैवेद्य पुरोहित) उत्तर कोलकाता के बड़ा बाजार की गलियों में जब आप कदम रखते हैं, तो हवा में लाली छंगाणी की मशहूर कचौरी की खुशबू और चुनावी चर्चाओं का शोर एक साथ सुनाई देता है। जोड़ासांको विधानसभा क्षेत्र जो अपनी व्यापारिक विरासत और संकरी गलियों के लिए जाना जाता है। यह क्षेत्र इस बार एक दिलचस्प 'त्रिकोणीय' और 'जातीय' मुकाबले का गवाह बनने जा रहा है। एक ही बिरादरी के तीन धुरंधर - जोड़ासांको की चुनावी बिसात इस बार बेहद अनोखी है। यहाँ मुख्य लड़ाई तीन ब्राह्मण उम्मीदवारों के बीच सिमट गई है जो मतदाताओं के एक ही बड़े हिस्से को रिझाने की कोशिश कर रहे हैं। 1. विजय उपाध्याय (टीएमसी): तृणमूल ने दो बार के पार्षद और 'धार्मिक छवि' वाले विजय उपाध्याय को मैदान में उतारकर दांव खेला है। वे ममता बनर्जी के विकास कार्यों और अपनी जमीनी पकड़ के भरोसे हैं। 2. विजय ओझा (भाजपा): भाजपा की ओर से अनुभवी नेता विजय ओझा ताल ठोक रहे हैं। बड़ा बाजार का व्यापारिक वर्ग पारंपरिक रूप से भाजपा का समर्थक रहा है और ओझा इसी 'वोट बैंक' की किलेबंदी कर रहे हैं। 3. भरत कुमार तिवारी (सीपीआई एम)...

बड़तला से मानिकतला तक: क्या ढहेगा पांडे परिवार का 42 वर्षों का ‘अभेद्य किला’?

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(नैवेद्य पुरोहित) उत्तर कोलकाता की गलियों में इन दिनों एक चर्चा आम है कि क्या तापस रॉय मानिकतला में साधन पांडे के अभेद्य किले को ढह पाएंगे? करीब चार दशकों तक जिस क्षेत्र पर कद्दावर नेता साधन पांडे का निर्विवाद रूप से राज रहा आज वहां की जमीनी हकीकत और राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं। एक विरासत और बदलती वफादारियां - मानिकतला की राजनीति का इतिहास 'पांडे परिवार' के इर्द-गिर्द रहा है। 1984 में तत्कालीन बड़तला सीट से शुरू हुआ साधन पांडे का विजय रथ परिसीमन के बाद वर्ष 2021 तक भी मानिकतला में अजेय रहा। फरवरी 2022 में उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनकी पत्नी सुप्ति पांडे ने इस विरासत को संभाला और चुनाव जीता, लेकिन 2026 की राह उतनी आसान नहीं दिखती। वर्तमान में साधन पांडे की बेटी श्रेया पांडे टीएमसी की ओर से अपनी पैठ मजबूत कर रही हैं, जिन्हें अपने पिता के पुराने समर्थकों का भावनात्मक साथ मिल रहा है। दुश्मन न करें दोस्त ने वो काम किया - कभी साधन पांडे के बेहद करीबी और सहयोगी दोस्त रहे तापस रॉय ने 2024 में पाला बदलकर बीजेपी का दामन थाम लिया। वरिष्ठ पत्रकार कौशल किशोर त्...

पश्चिम बंगाल यात्रा वृत्तान्त चुनाव के समय बंगाल की धड़कनें

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यात्राएँ महज़ स्थानों को नहीं, स्वयं को भी नापती हैं। अप्रैल 2026 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की रिपोर्टिंग के लिए मैं इंदौर से कोलकाता की ओर निकला, तो मन में एक ही संकल्प था कि अब तक टेक्स्ट फॉर्मेट में रिपोर्ट करता था, अब वीडियो रिपोर्टिंग में भी हाथ आज़माना है। साथ में थे दो माइक आईडी एक टाइम्स ऑफ इंदौर का और दूसरा देश के पहले राजनीति पर केंद्रित दैनिक अखबार पॉलिटिक्सवाला का। यह यात्रा सिर्फ चुनावी कवरेज नहीं थी यह एक युवा की अपने आप से मुठभेड़ थी अपनी सीमाओं को पहचानने और उन्हें लाँघने की कोशिश थी। इस वृत्तान्त में वह सब कुछ है जो मैंने देखा, सुना और महसूस किया चाहे वह कोलकाता के केएमसी दफ्तर के बाहर किसी बुज़ुर्ग की पीड़ा हो, एक विधायक का साक्षात्कार हो, या फिर जादवपुर विश्वविद्यालय के प्रांगण में न्यूज़लॉन्ड्री की टीम के साथ बिताए कुछ यादगार पल। इस यात्रा वृत्तांत के बाद अगले कुछ दिनों तक आप लोगों को पश्चिम बंगाल की ग्राउंड रिपोर्ट पढ़ने को मिलेगी। जिन विधानसभा क्षेत्रों में जाने का मौका मिला वहां की राजनीतिक हालत आप सभी को जानने को मिलेगी। आइए, चलते हैं उस यात्रा पर जो इंदौर...