सखी और सहकर्मी वो सुबह 7:00 बजे का इंतज़ार

‘दैनिक भास्कर इंदौर लॉन्चिंग टीम के गुमनाम नायक’ यह सीरीज लिखते वक्त मैंने कभी नहीं सोचा था कि ये सफर 25वीं दहलीज़ तक पहुँचेगा। बीच में ये सिलसिला थम सा गया था। वजह थी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की ग्राउंड रिपोर्टिंग और फिर राजस्थान में अपने कुलदेवता का आशीर्वाद लेने चला गया था। मीडिया की डेडलाइन और ज़िंदगी की डेडलाइन, दोनों ने कुछ दिन इस सीरीज को विराम दे दिया। पर कहानियाँ रुकती कहाँ हैं? ढेरों गुमनाम नायक अब भी कतार में हैं। उनकी आवाज़, उनका संघर्ष, उनका समर्पण शनै: शनै: सब सामने आयेगा। आज वहीं से शुरुआत कर रहा हूँ जहाँ 24वीं किस्त खत्म हुई थी वर्षा जोशी के किरदार में दैनिक भास्कर के उस दौर में तब कुछ रिश्ते इंक और कागज़ से भी गहरे बन गए थे। 25वीं किस्त एक ऐसी ही रूहानी दोस्ती की है जिसका इंतज़ार सुबह 7 बजे से शुरू होकर 8 बजे की दस्तक पर पूरा होता था। कुछ नायक हेडलाइन नहीं बनते वो हेडलाइन बनाने वालों की हिम्मत बनते हैं। वर्षा जोशी के बाद बहुत जल्द आप एक नए गुमनाम नायक से मिलेंगे। तब तक पढ़िए -
सखी और सहकर्मी वो सुबह 7:00 बजे का इंतज़ार (नैवेद्य पुरोहित) कहते हैं कि एक अच्छा दोस्त काम के बोझ को आधा और दफ्तर की चाय के स्वाद को दोगुना कर देता है। वर्षा के लिए भास्कर का वह सफर सिर्फ अक्षरों और मशीनों का सफर नहीं था। वह सफर था एक अटूट और निस्वार्थ दोस्ती का। वह दोस्ती सुधा और वर्षा की दोस्ती थी। सुधा वहां टेलीफोन ऑपरेटर के रूप में कार्यरत थीं। जिस समय वर्षा महू से सुबह 6:30 की ट्रेन पकड़कर इंदौर के लिए निकलती थीं, लगभग उसी समय सुधा भी दफ्तर के लिए कदम बढ़ा चुकी होती थीं। सुधा सुबह 7:00 बजे ही ऑफिस पहुँच जाती थीं। जब वर्षा ठीक 8:00 बजे प्रेस के दरवाजे पर दस्तक देतीं, तो वहां सबसे पहले उनका स्वागत सुधा की मुस्कुराहट और उस सन्नाटे में गूँजती आवाज़ से होता था।
वह एक घंटे का समय, जब दफ्तर के बाकी लोग अभी आना शुरू नहीं होते थे इन दो सखियों का अपना समय होता था। वर्षा याद करती हैं कि सुधा उनकी सबसे प्रिय दोस्त थी। टेलीफोन ऑपरेटर की वह मेज और कंपोजिंग की वो मशीनें इनके बीच के फासले को उनकी गपशप और साझा किए गए किस्से पाट देते थे।
आज के दौर में जहाँ 'प्रोफेशनल रिलेशनशिप' की बात होती है, उस समय ये रिश्ता रूहानी था। वर्षा जोशी बताती हैं कि उस दौर के तनावपूर्ण और भागदौड़ वाले काम में सुधा का साथ एक बहुत बड़ा सहारा था। जब कभी काम की थकान हावी होती या घर की याद आती, तो सुधा के पास होना ही काफी होता था।
वे दोनों सिर्फ सहकर्मी नहीं थीं, बल्कि उस उभरते हुए अखबार के संघर्षों की गवाह भी थीं। दफ्तर के उस शांत कोने में बैठकर भविष्य के सपने बुनना और एक-दूसरे के सुख-दुख साझा करना ही वह ताकत थी जिसने वर्षा को कभी रुकने नहीं दिया। आज भी जब वह पुराने पन्ने पलटती हैं, तो सुधा का नाम उनके चेहरे पर एक अलग ही चमक ले आता है।
(अगली किस्त में पढ़िए: क्या आपने कभी सोचा है कि एक पूरे संस्थान में आपकी पहचान आपके काम से नहीं, बल्कि आपके शहर के नाम से जुड़ जाए?) #दैनिक_भास्कर_इंदौर_लॉन्चिंग_टीम_के_गुमनाम_नायक #सीरीज_25 #डीबी_कॉर्प #गुमनाम_नायक #वर्षा_जोशी

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