बड़तला से मानिकतला तक: क्या ढहेगा पांडे परिवार का 42 वर्षों का ‘अभेद्य किला’?
(नैवेद्य पुरोहित)
उत्तर कोलकाता की गलियों में इन दिनों एक चर्चा आम है कि क्या तापस रॉय मानिकतला में साधन पांडे के अभेद्य किले को ढह पाएंगे? करीब चार दशकों तक जिस क्षेत्र पर कद्दावर नेता साधन पांडे का निर्विवाद रूप से राज रहा आज वहां की जमीनी हकीकत और राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं।
एक विरासत और बदलती वफादारियां -
मानिकतला की राजनीति का इतिहास 'पांडे परिवार' के इर्द-गिर्द रहा है। 1984 में तत्कालीन बड़तला सीट से शुरू हुआ साधन पांडे का विजय रथ परिसीमन के बाद वर्ष 2021 तक भी मानिकतला में अजेय रहा। फरवरी 2022 में उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनकी पत्नी सुप्ति पांडे ने इस विरासत को संभाला और चुनाव जीता, लेकिन 2026 की राह उतनी आसान नहीं दिखती। वर्तमान में साधन पांडे की बेटी श्रेया पांडे टीएमसी की ओर से अपनी पैठ मजबूत कर रही हैं, जिन्हें अपने पिता के पुराने समर्थकों का भावनात्मक साथ मिल रहा है।
दुश्मन न करें दोस्त ने वो काम किया -
कभी साधन पांडे के बेहद करीबी और सहयोगी दोस्त रहे तापस रॉय ने 2024 में पाला बदलकर बीजेपी का दामन थाम लिया। वरिष्ठ पत्रकार कौशल किशोर त्रिवेदी के मुताबिक, "तापस रॉय को आप किसी भी सूरत में कमजोर नहीं आंक सकते। वह एक हेवीवेट कैंडिडेट हैं।" 1985 में पार्षद से लेकर 2001, 2011, 2016, 2021 में विधायक होने के साथ मंत्री रहे तापस रॉय आज अपने उसी दिवंगत मित्र की बेटी के खिलाफ ताल ठोक रहे हैं, जिनके साथ उन्होंने राजनीति की कई पारियां खेली थीं।
डेमोग्राफिक्स और जमीनी मुद्दे -
शत प्रतिशत शहरी आबादी वाले इस क्षेत्र में मतदाता बेहद जागरूक हैं। यहाँ की 87% साक्षरता दर बताती है कि यहाँ का वोटर केवल नारों पर नहीं, बल्कि 'रिपोर्ट कार्ड' पर वोट देता है। मध्यमवर्गीय बंगाली आबादी के साथ-साथ यहाँ एक बड़ा हिस्सा अल्पसंख्यक और हिंदी भाषी मतदाताओं का भी है। टीएमसी जहां सरकारी योजनाओं (लक्ष्मी भंडार आदि) के दम पर जीत का दावा कर रही है, वहीं बीजेपी भ्रष्टाचार और शहरी बुनियादी ढांचे के मुद्दों पर घेराबंदी कर रही है। मुख्य मुकाबला टीएमसी और बीजेपी के बीच है लेकिन वामपंथियों और कांग्रेस का छोटा मगर 'साइलेंट' वोट बैंक किसका खेल बिगाड़ेगा, यह 4 मई को पता चल जाएगा।
मानिकतला में अंदर ही अंदर बदलाव की सुगबुगाहट तेज है। क्या श्रेया पांडे अपने पिता के 'अभेद्य किले' की दीवारें बचा पाएंगी, या तापस रॉय का अनुभव और बीजेपी का बढ़ता ग्राफ 42 साल पुराने इस गढ़ को ढहा देगा? यह देखना दिलचस्प होगा।
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