पुराने दिग्गज और उनकी यादें उन बुज़ुर्गों का साया, वो अनुभवों की तालीम

(नैवेद्य पुरोहित)
किसी भी संस्थान की इमारत सिर्फ ईंट-गारे से नहीं, बल्कि वहां काम करने वाले लोगों के तजुर्बों और उनकी शख़्सियत से भी बनती है। वर्षा जोशी जब भास्कर के उस दौर को याद करती है तो उनकी आँखों के सामने उन दिग्गजों के चेहरे घूम जाते हैं, जिनकी कलम की धमक पूरे शहर में सुनाई देती थी। वह दौर अजीम पत्रकारों और संजीदा संपादकों का था।
वर्षा की यादों के झरोखे में सबसे रोशन नाम है हीरालाल शर्मा जी का। वह एक ऐसे पत्रकार थे जिन्हें पत्रकारिता की चलती-फिरती इबारत कहा जाता था। वर्षा बताती हैं कि हीरालाल जी जैसे वरिष्ठों की मौजूदगी ही अपने आप में एक 'अनुशासन' थी। उनके शब्द जब कागज़ पर उतरते थे, तो कंपोजिंग विभाग में वर्षा और उनकी टीम उन शब्दों को बड़ी नज़ाकत से मशीनों पर उतारती थी।
वहां सिर्फ काम का रिश्ता नहीं था, बल्कि एक 'उस्ताद-शागिर्द' वाली रिवायत थी। वर्षा जी अपने सीनियर अरुण आहूजा जी को भी बड़े सम्मान से याद करती हैं। आहूजा जी के मार्गदर्शन में वह पूरी टीम एक इकाई की तरह काम करती थी। उस दौर में दफ्तर का माहौल ऐसा था कि अगर कोई वरिष्ठ पत्रकार कंपोजिंग रूम में आता, तो काम की आपाधापी के बीच भी एक खामोश सा सम्मान ठहर जाता था। वर्षा जोशी और उनकी सखियां उन दिग्गजों की छत्रछाया में काम कर रही थी। वहां सिर्फ खबरें टाइप नहीं होती थीं, बल्कि ये भी सीखा जाता था कि शब्दों की मर्यादा क्या होती है और अखबार की गरिमा कैसे कायम रखी जाती है।
आज के शोर-शराबे वाले न्यूज़रुम से उलट, वह दौर बेहद ठहराव वाला था। हीरालाल शर्मा जैसे दिग्गजों के साथ बिताए वे लम्हे वर्षा के लिए किसी पूंजी से कम नहीं हैं। भले ही वह आज पत्रकारिता की चकाचौंध से दूर हैं, लेकिन उन बुज़ुर्गों से मिली 'नसीहतें' और काम के प्रति उनका 'जुनून' आज भी उनकी बातों में साफ़ झलकता है।
(अगली किस्त में पढ़िए: क्या जुनून की कोई कीमत हो सकती है? उस दौर में तनख्वाह जो भले ही गिनती में कम थी, लेकिन उस 'चंद रुपयों' में जो बरकत और सुकून था, वो आज की हज़ारों-लाखों की सैलरी में भी कुछ लोगों को शायद मयस्सर नहीं!) #दैनिक_भास्कर_इंदौर_लॉन्चिंग_टीम_के_गुमनाम_नायक #सीरीज_27 #डीबी_कॉर्प #गुमनाम_नायक #वर्षा_जोशी

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