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Showing posts from March, 2026

राम के नवरस: एक अविस्मरणीय संध्या

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(नैवेद्य पुरोहित) कुछ शामें सिर्फ बीतती नहीं, आत्मा में उतर जाती हैं। 29 मार्च 2025 की रात भोपाल के समन्वय भवन में कुछ ऐसी ही थी। पंकज मुकाती जी के पॉलिटिक्सवाला मीडिया समूह के तत्वावधान में आयोजित "राम के नवरस" काव्य महोत्सव में जब एक-एक कवि मंच पर आया तो शब्दों ने ऐसा जादू किया कि हास्य के बाद भक्ति, भक्ति के बाद वेदना और वेदना के बाद फिर मुस्कुराहट। एक के बाद एक नौ रसों की यह यात्रा सच में पूरी हो गई। दावे के साथ कह सकता हूं कि वहां हॉल में बैठे हर शख़्स ने कल रात कुछ न कुछ ऐसा ज़रूर पाया होगा जो घर जाते वक़्त भी उसके साथ था। मंच पर उपस्थित महानुभाव - कल शाम मंच पर कई गणमान्य हस्तियाँ उपस्थित थीं। मुख्य अतिथि के रूप में मध्यप्रदेश शासन के कैबिनेट मंत्री विश्वास सारंग पधारे। उनके साथ पूर्व जनसम्पर्क मंत्री पी.सी. शर्मा, मध्यप्रदेश कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी, इंदौर के पूर्व कलेक्टर एवं वर्तमान में राज्य निर्वाचन आयुक्त मनोज श्रीवास्तव और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी सर भी मौजूद थे। कार्यक्रम ...

इत्तेफाक: सिलाई मशीन से कंपोजिंग मशीन तक का सफर

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(नैवेद्य पुरोहित) मंज़िलें उन्हीं को मिलती हैं जो रास्तों की तलाश में निकलते हैं, लेकिन कभी-कभी रास्ते खुद चलकर आपके पास आ जाते हैं। वर्षा जोशी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। इंदौर की तपती दोपहरों में जब दैनिक भास्कर अपनी पहचान बना रहा था तब महू की एक साधारण सी युवती अपने हाथों में धागा और सुई थामे 'सिलाई' का डिप्लोमा कर रही थी। उनका सपना अखबार की दुनिया नहीं, बल्कि कपड़ों पर नक्काशी करना था। लेकिन नियति ने उनके लिए कुछ और ही 'डिज़ाइन' कर रखा था। उस सिलाई सेंटर पर वर्षा की मुलाकात एक महिला से हुई, जो अक्सर वहां आया करती थीं। बातों-बातों में जिक्र छिड़ा कि वर्षा को काम की तलाश है वे कुछ करना चाहती हैं। वह महिला कोई और नहीं बल्कि दैनिक भास्कर में कार्यरत शेखर जैन की धर्मपत्नी थीं। उन्होंने वर्षा के उत्साह को देखा और सहज भाव से कहा, "मेरे हसबैंड भास्कर में हैं, वहां सबको जानते हैं, मैं उनसे बात करूँगी तो वो करवा देंगे।" एक मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की के लिए यह किसी सपने जैसा था। वह शेखर जैन से मिलीं। यह दौर ऐसा था जब प्रेस की दुनिया में पैर रखने के लिए सिफारिश...

एक नई शुरुआत का आगाज़ जब इतिहास का हिस्सा बनीं 'महू वाली मैडम'

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(नैवेद्य पुरोहित) मार्च 1983 का वह महीना इंदौर की पत्रकारिता के लिए किसी उत्सव से कम नहीं था। शहर की आबोहवा में एक नई हलचल थी, एक नया अखबार आकार ले रहा था और प्रेस की मशीनों की गूँज में एक नए युग की आहट सुनाई दे रही थी। 5 मार्च 1983 को जब 'दैनिक भास्कर' का पहला अंक इंदौर की सड़कों पर पहुँचा, तो यह एक सपने की उड़ान थी। लेकिन इस बड़े धमाके और चकाचौंध से दूर, महू की शांत गलियों में रहने वाली एक युवती, वर्षा जोशी अपनी ही दुनिया में मगन थीं। उन्हें तब अंदाज़ा भी नहीं था कि आने वाले कुछ ही दिन उनकी ज़िंदगी की पटरी को हमेशा के लिए बदलने वाले हैं। अखबार को लॉन्च हुए अभी मात्र 15 दिन ही बीते थे। दफ्तर में अभी भी लॉन्चिंग की थकान और काम के नए रूटीन का तालमेल बिठाया जा रहा था। ठीक इसी समय वर्षा जोशी दैनिक भास्कर की देहलीज़ पर अपना पहला कदम रखती है। वह तारीख और वह पल, वर्षा के लिए सिर्फ एक नौकरी की शुरुआत नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक सफर में उनकी भागीदारी का पहला दिन था। उस समय प्रेस का माहौल आज जैसा डिजिटल नहीं था चारों तरफ कागजों का ढेर, स्याही की महक और मशीनों का शोर था। इन सबके बीच ए...

गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड और 61 की उम्र में अनस्टॉपेबल जुनून

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(नैवेद्य पुरोहित) किसी ने सच कहा है कि रिटायरमेंट सिर्फ कागजों पर होता है, रगों में दौड़ते जुनून का कभी अंत नहीं होता। धर्मेश यशलहा की कहानी इसका सबसे बड़ा सबूत है। दैनिक भास्कर इंदौर की लॉन्चिंग टीम से शुरू हुआ यह सफर आज 43 साल बाद भी उसी रफ़्तार से जारी है। धर्मेश के नाम गिनीज़ वर्ल्ड बुक में एक रिकॉर्ड भी दर्ज है। एक मैच के दौरान सबसे ज्यादा 'शटल' इस्तेमाल होने की सटीक गिनती करना और उसे आधिकारिक रूप से दर्ज कराना कोई मामूली बात नहीं थी। उनकी इस उपलब्धि का लोहा प्रतिष्ठित मैगज़ीन 'बैडमिंटन इंग्लैंड' ने भी माना और वहीं से यह जानकारी 'गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड' तक पहुँची। एक रेफरी के रूप में उनकी एकाग्रता और खेल के प्रति समर्पण ने इंदौर का नाम दुनिया के नक्शे पर चमका दिया। इस साल वे 62 साल के हो जायेंगे लेकिन उनकी सक्रियता किसी 21 साल के नौजवान को भी मात दे दे। वे आज भी 'नेशनल स्पोर्ट्स टाइम्स' के लिए निरंतर लिख रहे हैं। तकनीक बदली, अखबारों के पन्ने बदले, लेकिन उन्होंने खुद को वक्त के साथ ढाला। आज वे फेसबुक और व्हाट्सएप के माध्यम से अपनी बेबाक टिप्पण...

दैनिक भास्कर के साथ 'सेकंड इनिंग' और वर्ल्ड चैंपियनशिप की वो ऐतिहासिक गूंज!

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(नैवेद्य पुरोहित) वक्त का पहिया घूमकर वापस वहीं आता है जहाँ से सफर शुरू हुआ था। 1983 से लगातार डेढ़ साल काम करने के बाद में ₹200 के स्वाभिमान की खातिर भास्कर छोड़ने वाले धर्मेश यशलहा का नाता इस संस्थान से कभी पूरी तरह टूटा नहीं। सालों बाद, जब धर्मेश बैडमिंटन की दुनिया का एक बड़ा नाम बन चुके थे तब दैनिक भास्कर और उनके बीच एक नई और 'प्रोफेशनल' पारी की शुरुआत हुई। यह पारी थी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इंदौर की कलम और कैमरे का लोहा मनवाने की। साल 2009 में हैदराबाद में विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप का आयोजन हुआ। यह भारत के लिए एक बड़ा मौका था और दैनिक भास्कर के लिए इसकी रिपोर्टिंग का जिम्मा संभाला धर्मेश जी ने। लेकिन इस बार वे सिर्फ एक रिपोर्टर नहीं थे। धर्मेश बताते हैं, "मैंने वहां रिपोर्टिंग और फोटोग्राफी, दोनों की जिम्मेदारी निभाई। उस समय वर्ल्ड चैंपियनशिप जैसे बड़े इवेंट को कवर करना और साथ ही बेहतरीन फोटोज़ निकालना भी एक बड़ी चुनौती थी।" दैनिक भास्कर वालों ने भी उनके इस हुनर की कद्र की और उन्हें रिपोर्टिंग के साथ-साथ फोटोग्राफी का भी अलग से पारिश्रमिक दिया। हैदराबाद वर्ल्ड चै...

हिंदी पत्रकारिता के 200 साल का आईना और उसमें अपना चेहरा देखने का साहस

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(नैवेद्य पुरोहित) बुधवार 25 मार्च की सुबह सप्रे संग्रहालय में कदम रखते ही एक अजीब-सा एहसास हुआ जैसे किसी ऐसे घर में दाखिल हो रहे हों जो बाहर से तो रोशन है मगर भीतर कोई पुराना दर्द छिपाए बैठा हो। दीवारों पर अखबारों की पुरानी सुर्खियाँ, गलियारे में मूर्धन्य पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी का वह चित्र जिन आँखों में न डर था, न समझौते की कोई गुंजाइश। और हम इक्कीसवीं सदी के पत्रकार, संपादक, कुलगुरु, राज्यपाल उन आँखों के सामने खड़े थे। विद्यार्थी जी के बलिदान दिवस के साथ दो शताब्दी के हिंदी पत्रकारिता के इस सफ़र को याद कर रहे थे। लेकिन जश्न में जब आत्मालोचना घुल जाए, तो वह जश्न नहीं रहता वह इबादत बन जाता है। राष्ट्रगान से हुई शुरुआत और विद्यार्थी जी की आँखों से नज़रें मिलाने की कोशिश में जब जन गण मन की पंक्तियाँ हवा में घुलीं और कार्यक्रम का आगाज़ हुआ तो मानो विद्यार्थी जी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करना एक रस्म की तरह नहीं, एक शपथ की तरह लगा। मंच पर सप्रे संग्रहालय की रूह पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर थे जिन्होंने ताउम्र हिंदी पत्रकारिता के अतीत को संजोने में अपनी ज़िंदगी खपा दी। उन्होंने ...