डेढ़ सौ साल बाद भी अपनी मिट्टी नहीं भूलें: इंदौर से धनवल तक जड़ों से जुड़ने की सच्ची दास्तान

(नैवेद्य पुरोहित)
कुछ यात्राएँ गूगल मैप के जीपीएस से नहीं दिल से होती हैं। ऐसी यात्राएँ इंसान को उसकी जड़ों, उसकी पहचान और उसकी रूह से दोबारा मिलवा देती हैं। 23 अप्रैल 2026 की रात ऐसी ही एक यात्रा की शुरुआत थी। मैं, मेरे अंकल देवेश पुरोहित (Devesh Purohit) और मेरी बुआजी का बेटा वरुण जोशी (विन्नी) इंदौर से रात में 8 बजे जैन ट्रेवल्स मुल्तानी सोना की बस में सवार हुए। रात के सफ़र की अपनी एक अलग ही ख़ामोशी होती है खिड़की के बाहर अंधेरा, भीतर यादों का उजाला, मन में अपने गांव, अपने कुलदेवता और अपनों से मिलने की बेचैनी।
24 अप्रैल की सुबह लगभग 6 बजे हम नाथद्वारा पहुँचे और न्यू कॉटेज में चेक-इन किया। थोड़ी देर तरोताज़ा होकर नाश्ता-पानी किया और सुबह 8 बजे ड्राइवर देवीसिंह पंवार के साथ निकल पड़े उस सफ़र पर जिसका इंतज़ार मेरे दिल को पूरे साल रहता है। इस बार सबसे पहला पड़ाव था गांव सुंदरचा, जहाँ मेरी नानी का मायका है। वहाँ हम मेरी परनानीजी से मिलने पहुँचे। उनकी उम्र 95 वर्ष से अधिक है लेकिन उनकी याददाश्त आज भी बेहद तेज़ है। उनसे मिलना, उनकी बातें, उनका स्नेह, उनका चेहरा झुर्रियों भरे नरम हाथ से मुझे लाड़ करना। सब कुछ अपने भीतर एक इतिहास समेटे हुए था। वहाँ मम्मी के ननिहाल के सभी लोगों से मुलाक़ात हुई। रिश्तों की गर्माहट ने सुबह को और ख़ूबसूरत बना दिया।
इसके बाद हम मेरे पैतृक गांव धनवल पहुंचे यह राजसमंद ज़िले की वो मिट्टी है जहाँ से हमारे पुरोहित परिवार की कहानी शुरू हुई थी। यही वो गांव है जहाँ से लगभग 150-160 साल पहले, 1857 के दौर के आसपास मेरे परदादाजी स्वर्गीय गणेशचन्द्र जी पुरोहित के भी दादाजी स्व. लालाजी पुरोहित इंदौर के लिए निकले थे और फिर तब से यहीं इन्दौर बस गए। धनवल पहुँचकर सबसे पहले हमने अपने कुलदेवता श्री धर्मराज जी भैरूजी बावजी के दर्शन किए। मंदिर में प्रवेश करते ही मन को एक अजीब सी तसल्ली मिली जैसे कोई अदृश्य शक्ति कह रही हो, “तुम चाहे कहीं भी चले जाओ, तुम्हारी असली पहचान यहीं मंदिर से है।” इसके बाद हम वहीं पीछे कुलदेवी श्री चामुंडा माता रानी के मंदिर गए और वहां से फिर अपने पूर्वज बावजी के स्थान पर गए। उस पल ने एहसास कराया कि हम सिर्फ़ अपने वर्तमान के प्रतिनिधि नहीं हैं बल्कि उन तमाम पीढ़ियों की विरासत भी हैं जिन्होंने संघर्ष करके हमें यहाँ तक पहुँचाया।
फिर हमारा अगला पड़ाव था गांव दड़वल जो विन्नी का पैतृक गांव है। वहाँ पहले हमने कालिका माताजी के दर्शन किए और फिर शिशोदा भेरूजी बावजी के मंदिर पहुँचे। दड़वल सिर्फ़ अपनी आस्था के लिए नहीं, एक प्रेरणादायक कार्य के लिए भी कुछ समय पहले चर्चा में रहा। इसी गांव के दो भाई मेघराज धाकड़-अजीत धाकड़ ने मिलकर लगभग 15 करोड़ रुपये खर्च करके बचपन के उस सरकारी स्कूल को एक आधुनिक भव्य स्वरूप दिया है। जिस स्कूल में कभी वे पढ़े थे आज उसे देखकर किसी वर्ल्ड क्लास लग्ज़री संस्थान का एहसास होता है। ऐसे लोग सच में समाज के लिए मिसाल हैं।
सभी जगह दर्शन करने के बाद हम दोपहर करीब 12:30 बजे वापस नाथद्वारा लौट आए। यात्रा की थकान थी, लेकिन उससे ज़्यादा मन में संतोष था। न्यू कॉटेज के रेस्टोरेंट में हमने शानदार थाली मंगवाई और उसका स्वाद अभी भी ज़हन में ताज़ा है। आखिर में आइसक्रीम ली और फिर कमरे में पहुंचकर ही कुछ देर आराम करने लगे। यह भरपेट भोजन का ही असर था कि हमें नींद का नशा चढ़ा और गहरी नींद आ गई। शाम को उठकर हम नाथद्वारा के बाज़ार की तरफ निकले। वहाँ की गलियाँ, दुकानों की रौनक, प्रसाद की खुशबू और भक्तों की भीड़ एक अलग ही माहौल बनाती है। हम श्रीनाथजी मंदिर पहुँचे प्रसाद लिया फिर वापस कमरे की ओर लौट आए।
लेकिन दिन अभी ख़त्म नहीं हुआ था। नाथद्वारा में ही मेरी मम्मी की सगी बुआ: द्रौपदी पुरोहित का घर है। हम वहाँ उनसे मिलने गए। बुआजी, फूफाजी, मामीजी और बच्चों से मुलाक़ात हुई। मेरे मामा अमित पुरोहित वर्तमान में राजस्थान सरकार के जयपुर मुख्यालय में मत्स्य पालन विभाग में डिप्टी डायरेक्टर के पद पर कार्यरत हैं। परिवार के साथ बिताया गया वो समय भी बेहद ख़ास रहा। इसके बाद हम नाथद्वारा की चौपाटी पहुँचे। थोड़ा बहुत हल्का-फुल्का कुछ खाया और वहाँ की मशहूर ठंडाई पी। सफ़र की थकान के बीच वह ठंडाई का आनंद ही अलग था।
रात को वापस कमरे में पहुँचे, थोड़ा आराम किया फिर रात 11 बजे चेक-आउट कर पैदल ही बस स्टैंड की ओर निकल पड़े। रात 12 बजे एमआर ट्रेवल्स की बस आई और हम उसमें बैठकर वापस इंदौर के लिए रवाना हो गए। सफ़र खत्म हो चुका मगर भीतर एक अजीब सा सुकून महसूस हो रहा है। आज की तेज़ रफ़्तार दुनिया में लोग अपने गांव, अपनी मिट्टी, अपने कुलदेवता और अपने रिश्तों से दूर होते जा रहे हैं। लोग बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ हासिल कर रहे हैं, ऊँचे ओहदों पर पहुँच रहे हैं, लेकिन अगर इंसान अपनी जड़ों से ही कट जाए तो उस तरक़्क़ी का क्या मतलब? जो दरख़्त अपनी जड़ों को भूल जाता है, उसकी शाख़ें ज़्यादा देर तक हरी-भरी नहीं रहतीं, वे शाखें मुरझा जाती है सूख जाती है! साल में एक बार अपने गांव जाइए। अपने कुलदेवता के दर्शन कीजिए। अपने बुज़ुर्गों के पास बैठिए। अपने पूर्वजों को याद कीजिए। यक़ीन मानिए आपकी रूह को अलग ही नेक्स्ट लेवल का सुकून मिलेगा! #पैतृक_गांव #धनवल #दड़वल #राजसमंद #नाथद्वारा #श्रीनाथजी #कुलदेवता #परिवार #राजस्थान #विरासत #इंदौर

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