Posts

Showing posts from August, 2025

गुनाहों का देवता बनाम रेत की मछली: प्रेम, पाखंड और पर्दे के पीछे का सच!

Image
(नैवेद्य पुरोहित) कुछ दिनों पहले मैंने धर्मवीर भारती की प्रसिद्ध प्रेम-कथा ‘गुनाहों का देवता’ और उनकी पहली पत्नी कांता भारती की रचना ‘रेत की मछली’ पढ़ी। शुरुआत में गुनाहों का देवता ने आदर्शवादी प्रेम का दिव्य चित्रण प्रस्तुत किया, लेकिन इसके अंतर्मन में छुपा सत्य पढ़कर मन विचलित हो उठा। रेत की मछली को पढ़ते ही यही महसूस हुआ कि दो विभिन्न व्यंजनों की शक्ल में एक ही कड़वी दवा छिपी है। इन दोनों कृतियों को पढ़ते हुए मैंने पाया कि चंदर के ‘देवता’ स्वरूप के पीछे कामुक स्वार्थ छिपा था, और रेत की मछली में छिपे चरित्र ने उसके प्रचंड रूप को उजागर कर दिया। गुनाहों का देवता: आदर्श प्रेम या छल? - धर्मवीर भारती का उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’ हिन्दी साहित्य में अभूतपूर्व स्थान रखता है और प्रेम के अव्यक्त रूप का चित्रण प्रस्तुत करता है। शुरुआती पन्नों पर यही विश्वास होता है कि चंदर-सुधा की प्रेम-कथा सर्वोच्च आदर्शवाद है। लेकिन जब मैंने चंदर और सुधा का अंत तक पीछा किया, तो अहसास हुआ कि चंदर का चरित्र कागज़ पर जितना महान और त्यागी दिखाया गया था, असल में वह उतना पवित्र नहीं था। उसमें सिर्फ बाहर सतही ...

विदेशों में हिंदी पत्रकारिता: इतिहास, संघर्ष और भविष्य

Image
(नैवेद्य पुरोहित) माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के पत्रकारिता विभाग में शुक्रवार, 29 अगस्त को “विदेशों में हिंदी पत्रकारिता” विषय पर एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का संचालन आत्मीयता और ऊर्जा के साथ प्रो. शिवकुमार विवेक ने किया। मुख्य वक्ता डॉ. जवाहर कर्नावट (निदेशक, टैगोर अंतर्राष्ट्रीय हिंदी केंद्र) का परिचय कराते हुए उन्होंने कहा कि बैंक सेवा से सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने अभूतपूर्व कार्य किया है। संसाधनों के अभाव में भी उन्होंने विदेशों में हिंदी पत्रकारिता के 120 वर्षों से अधिक के इतिहास को संकलित किया और 25 देशों से प्रकाशित 150 से अधिक पत्र–पत्रिकाओं को एकत्रित कर नई पीढ़ी के सामने रखा। मुख्य वक्ता डॉ. कर्नावट ने आते ही चुटकी लेकर कहा, “घर की मुर्गी दाल बराबर! जब मैं विदेशों में हर जगह व्याख्यान दे चुका, उसके बाद भोपाल वालों को याद आई।” उन्होंने विस्तार से विभिन्न महाद्वीपों में हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत, उसके स्वरूप और संघर्षों की चर्चा की। उल्लेखनीय है कि भारत में हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष होने वाले हैं, जबकि ...

अच्छा कवि बनने के लिए अपमान और तिरस्कार सहना पड़ता है: दयानंद पाण्डेय

Image
(नैवेद्य पुरोहित) भोपाल। “पत्रकारिता एक बहती नदी है यह किसी का जीवन बना भी सकती है और बिगाड़ भी सकती है।” वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार श्री दयानंद पाण्डेय ने यह विचार 26 अगस्त को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के पत्रकारिता विभाग में आयोजित विशेष व्याख्यान में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता केवल पेशा नहीं बल्कि जिम्मेदारी है। आज भी छपे हुए शब्दों को लोग अंतिम सत्य मानते हैं, इसलिए पत्रकार की लेखनी में गंभीरता और ईमानदारी होना आवश्यक है। आईएएस और पत्रकार को कहीं भी भेज दो, काम हो जाएगा! श्री पाण्डेय ने विद्यार्थियों से संवाद करते हुए कहा कि एक अच्छा पत्रकार वही है, जिसके पास गहरी समझ, अध्ययनशील प्रवृत्ति और व्यापक दृष्टिकोण हो। उन्होंने कहा, “सीखने की कोई उम्र नहीं होती। एक आईएएस और एक पत्रकार उन्हें चाहे कही भी भेज दो किसी भी विभाग में चाहे कॉमर्स भेज दो, चाहे क्राइम या हेल्थ वह हर विषय में काम करने की क्षमता रखता है।” भाषा की महत्ता पर जोर देते हुए उन्होंने प्रभाष जोशी, राजेंद्र माथुर और आलोक तोमर जैसे दिग्गज संपादकों का उदाहरण दिया...

अभ्युदय 2025 : एक अविस्मरणीय आरंभ!

Image
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में आयोजित ‘अभ्युदय-2025’ न केवल एक कार्यक्रम था बल्कि यह हम सभी नवागंतुक विद्यार्थियों के लिए एक नई यात्रा का शुभारंभ था। अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं – “तुम दिल्ली छोड़कर भोपाल क्यों चले आए?” पर आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मुझे अपने फैसले पर गर्व होता है। नियति ने जो तय किया, वही हुआ और सच कहूँ तो जो अनुभव और अवसर यहाँ मिल रहे हैं, वे शायद कहीं और संभव नहीं थे। एक भव्य शुरुआत 20 अगस्त 2025 को जब विश्वविद्यालय परिसर में मुख्यमंत्री श्री मोहन यादव और लोकप्रिय कवि डॉ. कुमार विश्वास ने दादा माखनलाल चतुर्वेदी की 12 फीट ऊँची प्रतिमा का अनावरण किया। इस प्रतिमा के चारों ओर कोई ‘उद्घाटनकर्ता’ या ‘मुख्य अतिथि’ का नाम नहीं था। इसके बजाय तीन ओर महात्मा गांधी, फ़िराक गोरखपुरी और मैथिलीशरण गुप्त द्वारा दादा के लिए कहे गए उद्गार अंकित थे। चौथी ओर ‘कर्मवीर’ नामक समाचार पत्र की प्रतीकात्मक प्रति अंकित थी, जो कभी उन्हीं के द्वारा प्रकाशित किया जाता था। हमारे कुलगुरु आदरणीय विजय मनोहर तिवारी सर का यह विचार इस बात का प्रमाण है ...

प्रेरणा का स्रोत: रामभुवन सिंह कुशवाह की पत्रकारिता यात्रा

Image
(नैवेद्य पुरोहित) पत्रकारिता की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो सिर्फ कलम के धनी नहीं, बल्कि अपने संघर्ष, साहस और समाज के प्रति समर्पण से अगली पीढ़ियों के लिए जीती-जागती प्रेरणा बन जाते हैं। 82 वर्षीय वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और शोधकर्ता श्री रामभुवन सिंह कुशवाह उन्हीं में से एक हैं। हाल ही में मुझे अपने मित्र शिवम तिवारी और हर्ष कर्णवाल के साथ उनसे मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह मुलाकात हमारे लिए केवल एक संवाद नहीं, बल्कि अनुभवों और सीख का ऐसा अनमोल खजाना साबित हुई जिसे हम जीवनभर संजोकर रखेंगे। आपातकाल का संघर्ष और जेल यात्रा बातचीत के दौरान जब उन्होंने आपातकाल के दिनों की स्मृतियाँ साझा कीं, तो हम स्तब्ध रह गए। उन्होंने बताया कि किस प्रकार उस दौर में मीसा के तहत उन्हें गिरफ्तार कर लगभग 20 महीनों तक जेल में रखा गया। एक-एक दिन कठिनाइयों और संघर्षों से भरा था, लेकिन उनका संकल्प अटूट था। पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, बल्कि जनता की आवाज़ है। अगर इसके लिए जेल भी जाना पड़े तो वह कीमत बहुत छोटी है। उनके चेहरे पर गर्व की मुस्कान और आत्मविश्वास हमें यह समझा रहा था कि पत्रकार की असली ताकत ...

ज्ञानतीर्थ में आत्मीय मिलन: सप्रे संग्रहालय ने मेरे परदादाजी की विरासत से कराया साक्षात्कार!

Image
(नैवेद्य पुरोहित) कुछ पल ऐसे आते है जो अतीत और वर्तमान का मिलन होता है...कुछ अधूरी खोजों को पूर्णता मिलती है...और कभी-कभी, अतीत की किसी धूल जमी पगडंडी पर चलते-चलते, आपको अपने ही वंशवृक्ष की जड़ों से मिलवा देती है। आज मेरे साथ कुछ ऐसा ही भोपाल के माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान में हुआ। इस संस्थान के बारे में बहुत सुना था, लेकिन जब अपने मित्र हर्ष कर्णवाल के साथ वहां पहुँचा, तो महसूस हुआ कि ये जगह केवल एक संग्रहालय नहीं, बल्कि सचमुच ज्ञानतीर्थ है। और मेरे लिए तो आज ये तीर्थ सिर्फ ज्ञान का नहीं, भावनाओं का, स्मृतियों का और अपने वंश से जुड़े इतिहास का भी बन गया। सप्रे संग्रहालय : एक चेतना का तीर्थ साल 1984 में स्थापित हुआ ये संस्थान सिर्फ किताबों और अखबारों का ढेर नहीं है...यहाँ वो स्याही महकती है जिससे इतिहास रचा गया। वो पन्ने सहेजे गए हैं जो समय की आँधियों में बिखर सकते थे। हर दीवार, हर रैक, हर दस्तावेज़ जैसे मुझसे कुछ कह रहे थे... "तुम यहाँ सिर्फ जानने नहीं, 'खोजने' आए हो।" जैसे ही हमने प्रवेश किया, सौभाग्य से मुलाकात हुई इस संस्थान क...