'महू वाली मैडम': शहर के नाम से शुरू हुई एक दास्तान
(नैवेद्य पुरोहित)
इंसान की पहचान अक्सर उसके ओहदे या उसके नाम से होती है, लेकिन कभी-कभी उसकी शख्सियत उसके सफर से ऐसी जुड़ जाती है कि 'रास्ता' ही उसकी 'पहचान' बन जाता है। दैनिक भास्कर के उस दफ्तर में जहाँ बड़े-बड़े संपादकों और पत्रकारों की आवाजाही थी, वहां वर्षा जोशी की अपनी एक मुकम्मल पहचान थी। उन्हें वहां कोई उनके नाम से नहीं, बल्कि बड़े एहतराम और मोहब्बत से 'महू वाली मैडम' पुकारता था।
यह एक नाम नहीं था, एक लड़की के उस जज़्बे को सलाम था, जो रोज़ाना महू से इंदौर की मुसाफ़िरी तय करके वक्त से पहले दफ्तर की सीढ़ियां चढ़ती थी। जब वह सुबह-सुबह प्रेस परिसर में दाखिल होतीं, तो उनके चेहरे पर उस थका देने वाले सफर की ज़रा भी शिकन नहीं होती थी।
उर्दू में एक लफ्ज़ है 'शनाख़्त' याने पहचान। वर्षा की पहचान ही उनकी सादगी बन गई थी। पूरे ऑफिस में हर किसी की ज़बान पर वर्षा जोशी के बजाए 'महू वाली मैडम' यही नाम रहता था।
यह एक तरह से खिताब था उनके लिए जो उन्हें किसी कागज़ पर नहीं मिला था, बल्कि उनकी उस अटूट निष्ठा की देन था जिसे उस संस्थान में कार्य करने वाले लोग अपनी आँखों से रोज़ देख रहे थे। जब वह कंपोजिंग की मशीन पर बैठतीं, तो महू की वह 'छोटी शहर वाली लड़की' ओझल हो जाती और एक बेहद मंझी हुई और संजीदा 'पेशेवर' सामने आ जाती।
उस दौर में, जब महू और इंदौर के बीच का फासला आज के मुकाबले कहीं ज़्यादा लगता था, तब वर्षा ने अपनी इस मुस्तैदी से लोगों के दिलों में वो जगह बना ली थी, जो शायद बड़े-बड़े कॉलम लिखने वालों को भी नसीब न हुई हो। 'महू वाली मैडम' पुकारे जाने पर उनके चेहरे पर जो मुस्कुराहट खिलती थी, वह आज भी उनकी यादों के सरमाए में महफूज़ है। यह नाम एक गवाही थी इस बात की कि आप कहाँ से आते हैं, इससे ज़्यादा यह मायने रखता है कि आप अपने काम को किस शिद्दत से निभाते हैं।
(अगली किस्त में पढ़िए: वो दौर जब हीरालाल शर्मा जैसे उन पुराने लोगों का, जिनकी छत्रछाया में वर्षा जी ने पत्रकारिता की बारीकियों को करीब से महसूस किया।)
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