300 रुपये का वह दौर छोटी तनख्वाह, बड़ा जुनून
(नैवेद्य पुरोहित)
आज के दौर में जब हम नौकरियों की तुलना 'पैकेज' और 'इंक्रीमेंट' से करते हैं, तब वर्षा जोशी के उस दौर की यादें हमें एक अलग ही धरातल पर ले जाती हैं। वह समय ऐसा था जब काम का पैमाना 'पैसा' नहीं, बल्कि 'जुनून' हुआ करता था।
वर्षा जब अपने शुरुआती वेतन का ज़िक्र करती हैं, तो उनके चेहरे पर एक सादगी भरी मुस्कान तैर जाती है। वे बताती हैं, "उस समय तनख्वाह बहुत कम थी, शायद 300 या 350 रुपये मिलते थे।"
आज की पीढ़ी के लिए यह रकम किसी मज़ाक जैसी लग सकती है, लेकिन 1983 के इंदौर में इन तीन सौ रुपयों की अपनी एक गरिमा थी। उन चंद नोटों में महीने भर का किराया, महू से इंदौर का ट्रेन पास और परिवार की छोटी-मोटी खुशियाँ सब सिमट आती थीं। लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि उस कम तनख्वाह में भी 'बरकत' बहुत थी।
दैनिक भास्कर की उस लॉन्चिंग टीम में काम करने वाला हर शख्स एक बड़े मिशन पर था। प्रेस के अंदर पसीना बहाते वक्त किसी ने यह नहीं गिना कि उसे कितने रुपये मिल रहे हैं। सबकी आँखों में बस एक ही सपना था कि सुबह जब इंदौर की नींद खुले, तो उसके हाथ में दैनिक भास्कर का ताज़ा अंक हो।
वर्षा कहती हैं कि भले ही जेब में पैसे कम थे, लेकिन टीम के बीच जो 'बॉन्डिंग' और भाईचारा था, वह बेमिसाल था। काम के दौरान आने वाली मुश्किलें और थकान उस समय फीकी पड़ जाती थी जब पूरी टीम एक साथ मिलकर किसी बड़े संकट को हल कर लेती थी। वह दौर सिखाता है कि संतुष्टि का ताल्लुक बैंक बैलेंस से नहीं, बल्कि आपके द्वारा किए गए काम की सार्थकता से होता है। वर्षा के लिए वह 300-350 रुपये सिर्फ एक वेतन नहीं था, उनकी आत्मनिर्भरता और महू से इंदौर तक की उस रोज़ाना की मेहनत का 'सम्मान' था।
(अगली किस्त में पढ़िए: हर कहानी में एक मोड़ आता है जहाँ दिल और दिमाग के बीच जंग होती है। एक कठिन घड़ी उस वक्त आई जब वर्षा जी को अपने चढ़ते हुए करियर और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच किसी एक को चुनना पड़ा! इस किरदार की आखिरी किस्त अगली कड़ी में...।)
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