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Showing posts from December, 2025

संवाद, सत्ता और सच्चाई का संगम: डीडी कॉनक्लेव में एक यादगार दिन

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मेरे लिए आज दिनांक 24 दिसंबर 2025 को भोपाल के कोर्टयार्ड बाय मैरियट होटल में दूरदर्शन का कार्यक्रम 'डीडी डायलॉग दमदार 2 साल मोहन सरकार' सिर्फ एक कार्यक्रम में शामिल होने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह विचार, विमर्श और अनुभवों से भरपूर एक यादगार यात्रा बन गया। दोस्तों के साथ संवाद, हंसी-मज़ाक और गंभीर चर्चाओं के बीच हर क्षण खास रहा। कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण आकर्षण देश के चर्चित और प्रभावशाली न्यूज़ एंकर सुधीर चौधरी रहे। मुझे उनसे मुलाक़ात और संवाद का अवसर मिला साथ ही हम सभी मित्रों ने उनके साथ ढेर सारी स्मरणीय तस्वीर भी खिंचवाई। पत्रकारिता को लेकर उनका मार्गदर्शन विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि रोज़ न्यूज़पेपर पढ़ो और डिजिटल ई-पेपर में नहीं, बल्कि पारंपरिक फिजिकल हार्ड कॉपी में पढ़ना चाहिए, क्योंकि यही आदत पत्रकारिता की बुनियादी समझ, अनुशासन और संवेदनशील दृष्टि विकसित करेगी। जब हमने उन्हें बताया कि हम माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के विद्यार्थी हैं, तो उन्होंने सहज भाव से कहा, “फिर तो मुझ पर आपका पहला अधिकार है।” यह वाक्य हम ...

जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ मध्यप्रदेश (JAMP) की ऐतिहासिक प्रदेश कार्यसमिति बैठक

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संगठन को और अधिक सशक्त बनाने का आह्वान (नैवेद्य पुरोहित) पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, यह ज़िम्मेदारी है सच के साथ खड़े रहने की, सत्ता से सवाल पूछने की और समाज के उस हिस्से की आवाज़ बनने की, जिसकी आवाज़ अक्सर दबा दी जाती है। इसी भावना के साथ जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ मध्यप्रदेश - जम्प (JAMP), जो कि नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स ऑफ इंडिया - एनयूजेआई (NUJI) से संबद्ध है, की नवगठित कार्यकारिणी की प्रथम प्रदेश कार्यसमिति बैठक आज दिनांक 17 दिसंबर 2025 को भोपाल के होटल सुकून प्रेस्टिज पैलेस, शिवाजी नगर में गरिमामय वातावरण में संपन्न हुई। बैठक का सधे हुए शब्दों से परिपूर्ण संचालन वरिष्ठ पत्रकार चंपालाल गुर्जर द्वारा किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत से लेकर अंत तक यह स्पष्ट था कि यह कोई औपचारिक बैठक नहीं, बल्कि आत्ममंथन और पुनर्संकल्प का मंच है। इस अवसर पर एनयूजेआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष, भोपाल से प्रकाशित प्रतिष्ठित दैनिक शिखर वाणी के प्रधान संपादक सुरेश शर्मा ने अपने विचार रखते हुए पत्रकारिता के वर्तमान स्वरूप पर बेहद स्पष्ट ज़रूरी बातें कहीं। उन्होंने कहा कि “वास्तविकता यह है कि पत्रकारिता का जो ...

डॉ प्रकाश हिन्दुस्तानी से एक सार्थक संवाद!

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आज जन्मदिन के एक दिन पहले, मुझे हिंदी वेब पत्रकारिता के अग्रदूत वरिष्ठ पत्रकार डॉ. प्रकाश हिंदुस्तानी से उनके निवास स्कीम नंबर 54, विजय नगर इंदौर पर मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह मुलाकात मेरे लिए सिर्फ एक भेंट नहीं, बल्कि लगभग दो घंटे का ऐसा सार्थक संवाद हो गई जिसने मेरे दृष्टिकोण को और अधिक स्पष्टता दी। उन्होंने नईदुनिया, धर्मयुग, नवभारत टाइम्स, दैनिक भास्कर में विभिन्न पदों पर कार्य किया। वे आठ वर्षों तक नवभारत टाइम्स के संडे संस्करण के संपादक रहे। दुनिया के पहले हिंदी पोर्टल वेबदुनिया डॉट कॉम के संस्थापक संपादक रहे। वे हिंदी इंटरनेट पत्रकारिता में पीएचडी करने वाले पहले पत्रकार हैं। उनका आग्रह था कि जब भी इंदौर आओ, अवश्य मिलना और आज शाम लगभग 4:45 बजे से लेकर 6:45 तक चला यह संवाद कब बीत गया, इसका एहसास ही नहीं हुआ। इस दौरान उनके यहाँ मयंक अग्रवाल से भी भेंट हुई। मेरे सभी प्रश्नों का उन्होंने अत्यंत धैर्य, सहजता और बड़े इत्मीनान से उत्तर दिया। हमारी बातचीत पत्रकारिता के भविष्य, मीडिया की वर्तमान स्थिति, अखबारों में विज्ञापन के आंकड़ों और भारतीय प्रिंट मीडिया के बाज़ार की रणनीतिय...

‘कार्टून शो-पहला सीज़न’: एमसीयू में देश के दिग्गज कार्टूनिस्टों का महासंगम

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(नैवेद्य पुरोहित) माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में 5 दिसंबर 2025 का दिन एक ऐतिहासिक तारीख की तरह दर्ज हो गया। यह वह दिन था जब देश के 11 दिग्गज कार्टूनिस्ट पहली बार एक ही मंच पर इकट्ठा हुए। सभी ने अपने अनुभवों, विचारों, ह्यूमर, व्यंग्य और कला की बारीकियों के साथ एक अनूठा संगम प्रस्तुत किया। ‘कार्टून शो – पहला सीज़न’ सिर्फ एक आयोजन नहीं था, बल्कि यह उस कला की पुनर्स्थापना का उत्सव था जिसे कई बार “dying art” कहकर खारिज कर दिया गया है। कार्यक्रम का स्वागतीय उद्बोधन कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी ने दिया और पहली ही पंक्ति में मानो पूरे आयोजन के भाव को शब्द दे दिया, “शब्द और शीर्षक केवल अख़बार का ढाँचा खड़ा करते हैं, लेकिन कार्टून अख़बार के धड़कते दिल का कोना है।” कुलगुरु ने स्पष्ट कहा कि कार्टून को ‘मरती हुई कला’ कह देना कला और पत्रकारिता दोनों के साथ घोर अन्याय है। भीमबेटका की दीवारें इस बात की गवाह है कि जब भाषाओं और लिपियों का अस्तित्व नहीं था, तब भी हमारे पुरखे बैठकर कुछ रच रहे थे। वह रेेखाएं कहानी कहती थीं, भाव जगाती थीं। शब्दों को यह ‘दंभ’ नहीं...