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Showing posts from October, 2025

दीपावली पर 1982 से अभिषेक ब्रिक्स की अनूठी परंपरा

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(नैवेद्य पुरोहित) मेरे दादाजी राजेन्द्र पुरोहित के द्वारा 1982 में जब ईट का भट्ठा लगाया गया था तब शुरू की गई उनकी पहल ने हमें सिखाया कि सच्ची खुशी दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाने में है। आज भी, हम वही परंपरा का निर्वहन करते हुए प्रेम और सेवा के साथ दीपावली मनाते हैं। इस साल भी वही रोशनी, वही भावना, वही समर्पण आज जब लोग नए कपड़ों में सजे हैं, मिठाइयों की महक से घर महक रहे हैं, तब हमने एक बार फिर उन गलियों का रास्ता चुना, जहाँ दिवाली की रौशनी आज भी मिट्टी और सीमेंट के बीच है। इस बार भी हमने अभिषेक ब्रिक्स परिवार के मेहनती मजदूरों और उनके परिवारों के साथ मिलकर मिठाइयाँ और कपड़े बाँटे। उन छोटे-छोटे बच्चों की आँखों में जब खुशियों की चमक आई वह पल किसी भी दीपक की लौ से ज़्यादा उज्जवल था। कभी-कभी लगता है असली दिवाली पटाखों की आवाज़ में नहीं, बल्कि किसी के चेहरे पर आई एक मुस्कान में छिपी होती है। हमने देखा, कैसे एक छोटा बच्चा, जो फटे कपड़ों में था, अपने परिवार के लिए मिठाइयां और कपड़े देखकर कितना खुश था। उसकी वह मासूम हँसी, वही तो असली लक्ष्मी का आगमन थी। यही हमारी दिवाली की पहचान है। यह ...

बेगमपुल से दरियागंज : लुगदी साहित्य के गौरवशाली पन्नों की खोज

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(नैवेद्य पुरोहित) हिंदी साहित्य के परिदृश्य में ‘बेगमपुल से दरियागंज’ जैसी किताब बहुत कम आती है जो न केवल एक भूले हुए दौर का दस्तावेज़ बन जाए, बल्कि हमारी सांस्कृतिक स्मृति को भी झकझोर दे। यशवंत व्यास की यह पुस्तक उसी विलक्षण श्रेणी में आती है। यह मात्र एक साहित्यिक यात्रा नहीं, बल्कि हिंदी पल्‍प या लुगदी साहित्य के इतिहास, उसकी समाजशास्त्रीय पृष्ठभूमि, उसकी लोकप्रियता और उसके गौरवशाली अवदान का गहन अध्ययन है। व्यास ने इस किताब में उस युग की धड़कन को शब्दों में बाँधा है, जब मेरठ का बेगमपुल सिर्फ एक स्थान नहीं था बल्कि एक सांस्कृतिक प्रतीक था। वहीं से वह लहर उठी थी जिसने हिंदी के लाखों-करोड़ों पाठकों को रहस्य, रोमांच, जासूसी और प्रेमकथाओं की दुनिया से जोड़ा। मेरठ से चलकर दिल्ली के दरियागंज तक पहुँची यह साहित्यिक धारा आम पाठक के जीवन का हिस्सा बन गई थी सस्ते कागज़ पर छपने वाली वे कहानियाँ, जो किसी रेल के डिब्बे, गलियों की दुकानों या स्कूल की किताबों के बीच छिपकर पढ़ी जाती थीं। यशवंत व्यास की दृष्टि सिर्फ साहित्यिक नहीं, शोधपरक और सांस्कृतिक भी है। उन्होंने लुगदी साहित्य के इतिहास की...

छह महीने, सैकड़ों अनुभव: माननीय विधायक श्री गोपाल राय के कार्यालय में राजनीति की असली पाठशाला

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(नैवेद्य पुरोहित) सुबह का वक्त था। घड़ी में 5 बजकर 40 मिनट हो रहे थे और मैं भोपाल के रानी कमलापति स्टेशन से दिल्ली के हज़रत निजामुद्दीन के लिए वंदे भारत एक्सप्रेस में सवार हो चुका था। न कोई ट्रिप थी...न कोई इवेंट...बस एक कागज़ के लिए यह यात्रा थी। किसी और के लिए वह केवल औपचारिक दस्तावेज़ हो सकता है पर मेरे लिए वह कागज़ किसी पुरस्कार से कम नहीं हैं। मेरे लिए यह उन अनगिनत घंटों की मेहनत, जिम्मेदारी और सीख का प्रतीक है जो मैंने पिछले छह महीनों में हासिल की है। इसका फल आज मेरे हाथ में था - इंटर्नशिप कम्प्लीशन सर्टिफिकेट, लेटर ऑफ रिकमेंडेशन और लेटर ऑफ अप्रिशिएशन, जो खुद माननीय गोपाल राय जी ने मुझे सौंपे। राजनीति के भीतर की दुनिया - 1 मार्च 2025 से शुरू हुई यह यात्रा सिर्फ़ इंटर्नशिप नहीं थी यह मेरे करियर का पहला औपचारिक राजनीतिक अनुभव था। आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्य, पूर्व कैबिनेट मंत्री और दिल्ली विधानसभा में तीसरी बार विधायक श्री गोपाल राय जी के कार्यालय में मुझे राजनीति की असली परतों में देखने का अवसर मिला। यहाँ मेरा रोल सिर्फ़ लेखन या डॉक्यूमेंटेशन तक सीमित नहीं था। मैंने एक...

अध्यक्ष की आसंदी पर मास्टरक्लास: नरेन्द्र सिंह तोमर ने साझा किए अपने अनुभव

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(नैवेद्य पुरोहित) माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में 'अध्यक्ष की आसंदी' विषय पर आधारित एक विशेष मास्टरक्लास का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत मध्यप्रदेश विधानसभा के स्पीकर नरेंद्र सिंह तोमर को पुस्तक भेंट कर की गई। स्वागत उद्बोधन विश्वविद्यालय के कुलगुरू विजय मनोहर तिवारी ने दिया। उन्होंने कहा कि, “यह मास्टरक्लास का उद्देश्य विभिन्न विधाओं के विशेषज्ञों से संवाद का मंच तैयार करना है। अध्यक्ष की आसंदी याने जिनका आसन ऊंचा है उनकी जिम्मेदारी भी ऊंची है।" उन्होंने सफलता के दो रूप बताए एक अस्थाई और दूसरी स्थाई। “स्थाई सफलता के पीछे अनेक कारक होते हैं, जो व्यक्ति के चरित्र और कर्म से निर्मित होती है।” अपने राजनीतिक कवरेज के अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि, “मैंने देखा है कि जब तोमर साहब प्रदेश अध्यक्ष थे तब प्रदेश भर से कार्यकर्ता भोपाल आते थे और अक्सर शिकायतों से भरे हुए, लेकिन तोमर साहब का फीडबैक हमेशा सकारात्मक रहा है वे सबको सुनते हैं। जितने भरे हुए लोग आते थे, उतने ही खाली होकर लौटते थे।” कार्यक्रम के मुख्य वक्ता और मास्...

मामाजी माणिकचन्द्र वाजपेयी: पत्रकारिता की आत्मा और राष्ट्रधर्म के अग्रदूत

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(नैवेद्य पुरोहित) मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी की 106वीं जन्म जयंती के अवसर पर विश्व संवाद केन्द्र भोपाल में “मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी स्मृति व्याख्यान” का आयोजन हुआ। यह आयोजन ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता के उस युगपुरुष को नमन करने का अवसर बना, जिन्होंने पत्रकारिता को राष्ट्रधर्म के रूप में जिया। कार्यक्रम की शुरुआत महर्षि वाल्मीकि के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करके हुई। प्रतिवर्ष की तरह इस वर्ष भी विश्व संवाद केन्द्र की स्मारिका का विमोचन किया गया, जिसका विषय था: “कन्वर्जन का खेल: निशाने पर जनजातीय”। पत्रकारिता की आत्मा राष्ट्रहित में निहित - गिरीश जोशी मुख्य वक्ता माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के सहायक कुलसचिव गिरीश जोशी ने कहा कि मामाजी की पत्रकारिता का एक ही लक्ष्य था राष्ट्रहित। उन्होंने कहा, “पत्रकारिता का माध्यम बदल सकता है, क्लेवर बदल सकता है, पर उसकी आत्मा नहीं बदलती।” उन्होंने गीता के श्लोक “नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि...” का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस प्रकार आत्मा अमर है, उसी प्रकार पत्रकारिता की आत्मा कभी नहीं बदली। भारत में पत्रकारिता की आत्मा को...