हिंदी पत्रकारिता के 200 साल का आईना और उसमें अपना चेहरा देखने का साहस
(नैवेद्य पुरोहित)
बुधवार 25 मार्च की सुबह सप्रे संग्रहालय में कदम रखते ही एक अजीब-सा एहसास हुआ जैसे किसी ऐसे घर में दाखिल हो रहे हों जो बाहर से तो रोशन है मगर भीतर कोई पुराना दर्द छिपाए बैठा हो। दीवारों पर अखबारों की पुरानी सुर्खियाँ, गलियारे में मूर्धन्य पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी का वह चित्र जिन आँखों में न डर था, न समझौते की कोई गुंजाइश। और हम इक्कीसवीं सदी के पत्रकार, संपादक, कुलगुरु, राज्यपाल उन आँखों के सामने खड़े थे। विद्यार्थी जी के बलिदान दिवस के साथ दो शताब्दी के हिंदी पत्रकारिता के इस सफ़र को याद कर रहे थे।
लेकिन जश्न में जब आत्मालोचना घुल जाए, तो वह जश्न नहीं रहता वह इबादत बन जाता है। राष्ट्रगान से हुई शुरुआत और विद्यार्थी जी की आँखों से नज़रें मिलाने की कोशिश में जब जन गण मन की पंक्तियाँ हवा में घुलीं और कार्यक्रम का आगाज़ हुआ तो मानो विद्यार्थी जी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करना एक रस्म की तरह नहीं, एक शपथ की तरह लगा।
मंच पर सप्रे संग्रहालय की रूह पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर थे जिन्होंने ताउम्र हिंदी पत्रकारिता के अतीत को संजोने में अपनी ज़िंदगी खपा दी। उन्होंने स्वागत उद्बोधन में कहा कि गणेश शंकर विद्यार्थी ने लिखने से पहले प्रमाण और परिणाम दोनों सोचे यह सिर्फ पत्रकारिता का सिद्धांत नहीं था, यह एक जीवन-दर्शन था। कई लोगों को गलतफहमी है कि खोजी पत्रकारिता आपातकाल के बाद पैदा हुई जबकि ऐसा नहीं है विद्यार्थी जी ने तो खोजी पत्रकारिता की ही लेकिन उनके भी बहुत पहले जेम्स ऑगस्टस हिक्की भी तो भंडाफोड़ ही कर रहा था।
महामहिम राज्यपाल मंगुभाई पटेल, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी, बरकतउल्ला विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. एस.के. जैन और सप्रे संग्रहालय के अध्यक्ष शिवकुमार अवस्थी जी मंच पर विराजमान थे।
तीन सम्मान और तीन कहानियां -
नागपुर से आए लोकमत के वरिष्ठ संपादक विकास मिश्र को माधवराव सप्रे सम्मान, चंडीगढ़ से आए ट्रिब्यून के अरुण नैथानी को महेश गुप्ता सृजन सम्मान और नरसिंहपुर के डॉ. ब्रजेश शर्मा को आंचलिक पत्रकारिता के राज्य-स्तरीय सम्मान के रूप में इस वर्ष नव-स्थापित अशोक मनोरिया पुरस्कार प्रदान किया गया। शॉल, श्रीफल, प्रशस्ति पत्र के साथ और उन विभूतियों के परिजन भी उपस्थित थे जिनके नाम पर ये पुरस्कार स्थापित हुए हैं। यह एक छोटी-सी लेकिन बहुत मार्मिक बात थी। जब किसी के नाम का पुरस्कार किसी और को मिलता है और उनके अपने वहाँ बैठे देखते हैं तो उस पल में अतीत और वर्तमान एक-दूसरे की आँखों में झाँकते हैं।
मुख्य वक्तव्य जब पीड़ा शब्दों में छलकी -
कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी ने मुख्य वक्तव्य दिया जो एक ज़ख्मी आत्मा का बयान था। उन्होंने याद दिलाया कि 30 मई 1826 को कलकत्ता से निकले हिंदी के पहले अखबार उदन्त मार्तण्ड ने अपना मूल मंत्र घोषित किया था, "हिंदुस्तानियों के हित का हेत" पंडित युगल किशोर शर्मा के ये शब्द आज भी उतने ही ज़रूरी हैं जितने तब थे। इस वर्ष हिंदी पत्रकारिता के दो सौ साल पूरे हुए हैं, वन्दे मातरम् के डेढ़ सौ साल पूरे हुए हैं और पिछले साल हमने संविधान के पचहत्तर वर्ष मनाए।
फिर उन्होंने एक ऐसी बात कही जिसने सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया। प्रधानमंत्री को लिखे अपने एक पत्र का उन्होंने ज़िक्र किया जिसका विषय सार्वजनिक अवकाशों पर था। उन्होंने कहा कि हमारे देश में इतने सारे महापुरुष हैं कि तीज-त्योहारों के साथ यदि एक-एक की जयंती और पुण्यतिथि भी मनाने लग जायेंगे तो साल के 365 दिन भी कम पड़ेंगे। उन्होंने कहा, "मैं जन्माष्टमी के दिन आखिर छुट्टी क्यों लूँ, जबकि जिस महापुरुष का हम जन्मोत्सव मना रहे हैं उन्होंने कहा था कर्म करो, फल की चिंता मत करो।" उन्होंने अपने मन की इच्छा भी प्रकट की और कहा कि वे आगामी 2 अक्टूबर को गांधी जी के चित्र पर दो फूल चढ़ाकर, वैष्णव जन गाकर अपने दफ्तर जाकर शाम छह बजे तक काम करना चाहते हैं।
पुराणों में पत्रकारिता नारद से संजय तक -
संगोष्ठी के पहले सत्र में एक दिलचस्प सूत्र यह उभरा कि पत्रकारिता की जड़ें पुराणों तक जाती हैं। विश्व के प्रथम संचारक देवर्षि नारद लोकमंगल को अपना पहला कर्तव्य मानते थे। महाभारत में संजय जो धृतराष्ट्र को युद्ध का आँखों देखा हाल सुनाते थे, जस का तस। पांडव, कौरव, और यहाँ तक कि तब तक अवतारी पुरुष माने जा चुके कृष्ण को भी उन्होंने नहीं बख्शा। सबकी खबर ली, सबकी खबर दी किसी को नहीं छोड़ा। और रही बात फेक न्यूज़ की तो वह भी महाभारत में थी। "अश्वत्थामा हतः" धीरे से बोला गया और फिर नरो वा कुञ्जरो वा" यानी सच का एक हिस्सा काटकर झूठ गढ़ने की कला भी उतनी ही पुरानी है जितनी पत्रकारिता।
राज्यपाल का उद्बोधन आत्मिक संतोष और ज़िम्मेदारी का बोझ -
राज्यपाल मंगुभाई पटेल ने कहा कि उनके पाँच साल के कार्यकाल में वे पाँचवीं बार सप्रे संग्रहालय आ रहे हैं और हर बार यहाँ आकर उन्हें आत्मिक संतोष मिलता है। यह महज़ शिष्टाचार नहीं था सप्रे संग्रहालय के बारे में यह बात सच भी है। यहाँ आकर कुछ ऐसा ही होता है जो आधुनिक शोरगुल में नहीं होता। उन्होंने ब्रेकिंग न्यूज़, फेक न्यूज़, व्हाट्सऐप, सोशल मीडिया, पॉडकास्ट सबका ज़िक्र किया। और अंत में कहा कि उदन्त मार्तण्ड का वह मूल मंत्र "हिंदुस्तानियों के हित का हेत" आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना पहले था।
दूसरा सत्र -
राज्यपाल और मुख्य अतिथि विदा हो चुके थे। आधा सभागार उठकर चला गया यह भी एक खबर है, जो बिना कहे भी कही जाती है। वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने मंच सँभाला और अपने खास अंदाज़ में कहा "हम पत्रकार लोग इतने बेशर्म हो गए हैं कि कोई फर्क नहीं पड़ता।" यह उनकी एक कसक थी।
विकास मिश्र ने कहा कि पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ा संकट विश्वसनीयता का नहीं भाषा का संकट है। "निवाला ग्रहण करना" और "खाना खाना" सुनने में एक से लगते हैं, मगर हैं अलग। शब्दों का यह चयन ही एक पत्रकार की पूँजी है। नई पीढ़ी ग्लैमर देखकर इस क्षेत्र में आ रही है और स्वस्थ पत्रकारिता हाशिये पर जा रही है।
अरुण नैथानी ने कहा कि मध्यप्रदेश में एक अलग-सी आत्मीयता है, एक सहज भाव है जो पंजाब में नहीं मिलता। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया ने जो भ्रम का माहौल बनाया है, उसके दुष्परिणाम आने वाले समय में भुगतने होंगे इसके लिए एक आचार संहिता ज़रूरी है। उन्होंने एक व्यावहारिक सुझाव भी दिया विजयदत्त श्रीधर जी के तीन खंडों वाले शोध ग्रंथ "समग्र भारतीय पत्रकारिता" को एक संक्षिप्त संस्करण में एक साथ प्रकाशित किया जाए।
राजेश बादल कहना था कि महात्मा गांधी की पत्रकारिता के बारे में पाठ्यक्रमों में बहुत कम पढ़ाया जाता है। माधवराव सप्रे के तीन शिष्यों का उन्होंने नाम लिया माखनलाल चतुर्वेदी, सेठ गोविंददास, और द्वारका प्रसाद मिश्र। उन लोगों की कहानियां कितने लोग जानते हैं? और फिर उन्होंने एक ऐसी बात कही जो भीतर तक हिला गई एक वाकया सुनाया 'सफ़र' अखबार का जिसके दफ्तर में पत्रकारों की भर्ती के लिए शर्त थी कि उन्हें चक्की पीसनी आनी चाहिए ताकि जेल में जाकर समस्या ना हो। ऐसी अनगिनत कहानियां आज के पत्रकारिता के विश्वविद्यालयों में आखिर क्यों नहीं पढ़ाई जाती हैं? चंद्रशेखर आज़ाद की माँ को आज़ादी के बाद भी अपराधी की माँ कहा जाता रहा। 1857 की लड़ाई में पहले शहीद की खबर किसने छापी? पहले संपादक थे मौलाना बरकत अली, दूसरे वेदा बख्श। अंत में बादल साहब ने कहा, "मुझे शर्म है कि ये कहानियाँ हमारे पत्रकारिता के पाठ्यक्रमों में नहीं हैं।"
विदेशों में हिंदी पत्रकारिता -
कार्यक्रम के अंत में डॉ. जवाहर कर्णावट ने संक्षेप में बताया कि हिंदुस्तान में हिंदी पत्रकारिता के 200 साल होने के साथ ही विदेश में भी हिंदी पत्रकारिता के अभी 182 साल पूरे हुए हैं। 4 जून 1903 को महात्मा गांधी ने इंडियन ओपिनियन निकाला चार अलग-अलग भाषाओं में और सत्याग्रह शब्द का आविष्कार भी उसी अखबार ने किया था। गांधीजी की पत्रकारिता पर एक पूरा शोध-कार्य हो सकता है।
चिंतित -
दोनों सत्रों का संचालन अरविंद श्रीधर ने बड़े सलीके से किया। उन्होंने आभार प्रकट किया और कार्यक्रम विधिवत समाप्त हुआ। उदन्त मार्तण्ड ने 1826 में लिखा था "हिंदुस्तानियों के हित का हेत।" दो सौ साल बाद हम उसी वाक्य को फिर दोहरा रहे थे। फर्क सिर्फ इतना था 1826 में वह एक संकल्प था और 2026 में वह एक याद बनकर रह गया है बस और शायद एक चेतावनी भी...।
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