इत्तेफाक: सिलाई मशीन से कंपोजिंग मशीन तक का सफर

(नैवेद्य पुरोहित)
मंज़िलें उन्हीं को मिलती हैं जो रास्तों की तलाश में निकलते हैं, लेकिन कभी-कभी रास्ते खुद चलकर आपके पास आ जाते हैं। वर्षा जोशी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। इंदौर की तपती दोपहरों में जब दैनिक भास्कर अपनी पहचान बना रहा था तब महू की एक साधारण सी युवती अपने हाथों में धागा और सुई थामे 'सिलाई' का डिप्लोमा कर रही थी। उनका सपना अखबार की दुनिया नहीं, बल्कि कपड़ों पर नक्काशी करना था। लेकिन नियति ने उनके लिए कुछ और ही 'डिज़ाइन' कर रखा था।
उस सिलाई सेंटर पर वर्षा की मुलाकात एक महिला से हुई, जो अक्सर वहां आया करती थीं। बातों-बातों में जिक्र छिड़ा कि वर्षा को काम की तलाश है वे कुछ करना चाहती हैं। वह महिला कोई और नहीं बल्कि दैनिक भास्कर में कार्यरत शेखर जैन की धर्मपत्नी थीं। उन्होंने वर्षा के उत्साह को देखा और सहज भाव से कहा, "मेरे हसबैंड भास्कर में हैं, वहां सबको जानते हैं, मैं उनसे बात करूँगी तो वो करवा देंगे।"
एक मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की के लिए यह किसी सपने जैसा था। वह शेखर जैन से मिलीं। यह दौर ऐसा था जब प्रेस की दुनिया में पैर रखने के लिए सिफारिश से ज्यादा भरोसे की जरूरत होती थी। शेखर ने वर्षा का जज़्बा देखा और महज तीन दिन के भीतर ही उनके हाथ सिलाई मशीन से हटकर कंपोजिंग मशीन पर आ टिके।
शेखर जैन के बारे में बात करते हुए वर्षा जोशी की आवाज़ में आज भी एक सम्मान झलकता है। वह कहती हैं, "3 दिन के अंदर उन्होंने मेरा जॉब लगा दिया था। बहुत अच्छे इंसान है वो। बस एक बार बात की और मुझे रास्ता मिल गया।"
सिलाई की बारीकी अब अक्षरों की बारीकी में बदलने वाली थी। वह युवती जो अब तक कपड़े के थान नापती थी अब अखबार के 'कॉलम' और 'पन्नों' को आकार देने के लिए तैयार थी। सिलाई मशीन की वह 'खट-खट' अब कंपोजिंग रूम की 'टक-टक' में तब्दील हो चुकी थी। एक नया अध्याय शुरू हो चुका था।
(अगली किस्त में पढ़िए: शेखर जैन जो किसी मददगार फरिश्ते से कम नहीं थे। जिन्होंने न सिर्फ वर्षा को मौका दिया, बल्कि उस दौर में नए लोगों के लिए एक मार्गदर्शक की भूमिका भी निभाई।) #दैनिक_भास्कर_इंदौर_लॉन्चिंग_टीम_के_गुमनाम_नायक #सीरीज_20 #डीबी_कॉर्प #गुमनाम_नायक #वर्षा_जोशी

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