एक नई शुरुआत का आगाज़ जब इतिहास का हिस्सा बनीं 'महू वाली मैडम'

(नैवेद्य पुरोहित)
मार्च 1983 का वह महीना इंदौर की पत्रकारिता के लिए किसी उत्सव से कम नहीं था। शहर की आबोहवा में एक नई हलचल थी, एक नया अखबार आकार ले रहा था और प्रेस की मशीनों की गूँज में एक नए युग की आहट सुनाई दे रही थी। 5 मार्च 1983 को जब 'दैनिक भास्कर' का पहला अंक इंदौर की सड़कों पर पहुँचा, तो यह एक सपने की उड़ान थी।
लेकिन इस बड़े धमाके और चकाचौंध से दूर, महू की शांत गलियों में रहने वाली एक युवती, वर्षा जोशी अपनी ही दुनिया में मगन थीं। उन्हें तब अंदाज़ा भी नहीं था कि आने वाले कुछ ही दिन उनकी ज़िंदगी की पटरी को हमेशा के लिए बदलने वाले हैं।
अखबार को लॉन्च हुए अभी मात्र 15 दिन ही बीते थे। दफ्तर में अभी भी लॉन्चिंग की थकान और काम के नए रूटीन का तालमेल बिठाया जा रहा था। ठीक इसी समय वर्षा जोशी दैनिक भास्कर की देहलीज़ पर अपना पहला कदम रखती है। वह तारीख और वह पल, वर्षा के लिए सिर्फ एक नौकरी की शुरुआत नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक सफर में उनकी भागीदारी का पहला दिन था।
उस समय प्रेस का माहौल आज जैसा डिजिटल नहीं था चारों तरफ कागजों का ढेर, स्याही की महक और मशीनों का शोर था। इन सबके बीच एक युवती का आना और खुद को इस मेहनत भरे काम के लिए तैयार करना वाकई साहस का काम था। वर्षा का वहां पहुंचना कोई सोची-समझी योजना नहीं थी, बल्कि यह तो वक्त का एक ऐसा इत्तेफाक था जिसने उन्हें इस मीडिया साम्राज्य की नींव की एक मज़बूत ईंट बना दिया। जब उन्होंने पहली बार उस दफ्तर की मशीनों को देखा, तो शायद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि आने वाले तीन सालों तक उनकी सुबह और शाम इसी शोर के बीच बीतेगी और वह 'महू वाली मैडम' के रूप में अपनी एक ऐसी पहचान बना लेंगी जिसे सहकर्मी बरसों तक याद रखेंगे।
(अगली किस्त में पढ़िए: सिलाई मशीन से कंपोजिंग मशीन तक जब वर्षा ने बदला अपनी किस्मत का रास्ता। कैसे सिलाई करते-करते वर्षा की मुलाकात एक 'फरिश्ते' से हुई और वह सीधे प्रेस की दुनिया में पहुँच गईं।) #दैनिक_भास्कर_इंदौर_लॉन्चिंग_टीम_के_गुमनाम_नायक #सीरीज_19 #डीबी_कॉर्प #गुमनाम_नायक #वर्षा_जोशी

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