राम के नवरस: एक अविस्मरणीय संध्या
(नैवेद्य पुरोहित)
कुछ शामें सिर्फ बीतती नहीं, आत्मा में उतर जाती हैं। 29 मार्च 2025 की रात भोपाल के समन्वय भवन में कुछ ऐसी ही थी। पंकज मुकाती जी के पॉलिटिक्सवाला मीडिया समूह के तत्वावधान में आयोजित "राम के नवरस" काव्य महोत्सव में जब एक-एक कवि मंच पर आया तो शब्दों ने ऐसा जादू किया कि हास्य के बाद भक्ति, भक्ति के बाद वेदना और वेदना के बाद फिर मुस्कुराहट। एक के बाद एक नौ रसों की यह यात्रा सच में पूरी हो गई। दावे के साथ कह सकता हूं कि वहां हॉल में बैठे हर शख़्स ने कल रात कुछ न कुछ ऐसा ज़रूर पाया होगा जो घर जाते वक़्त भी उसके साथ था।
मंच पर उपस्थित महानुभाव -
कल शाम मंच पर कई गणमान्य हस्तियाँ उपस्थित थीं। मुख्य अतिथि के रूप में मध्यप्रदेश शासन के कैबिनेट मंत्री विश्वास सारंग पधारे। उनके साथ पूर्व जनसम्पर्क मंत्री पी.सी. शर्मा, मध्यप्रदेश कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी, इंदौर के पूर्व कलेक्टर एवं वर्तमान में राज्य निर्वाचन आयुक्त मनोज श्रीवास्तव और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी सर भी मौजूद थे। कार्यक्रम का समग्र संचालन प्रोफेसर राम शर्मा ने किया जबकि कवियों का परिचय और काव्य-संचालन की ज़िम्मेदारी स्वयं शशिकांत यादव ने बड़े दिलचस्प अंदाज़ में निभाई।
जब राजनेता और कवि एक मंच पर मिले -
कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत माल्यार्पण और स्वागत से हुई। मुख्य अतिथि विश्वास सारंग को उसी शाम मथुरा-वृंदावन भी जाना था इसलिए आयोजकों ने सोचा कि पहले उन्हें मंच पर बुलाकर दो शब्द कहलवा दिए जाएँ। लेकिन विश्वास सारंग "दो शब्द" पर कहाँ रुकने वाले थे वो खूब कह गए। और कहते-कहते उन्होंने वहाँ मौजूद कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी पर भी तंज कस दिया। कुछ ऐसे कहा कि, "दिग्विजय सिंह तो कहीं और वहाँ हैं और आप यहाँ राम के मंच पर कैसे?" थोड़ी-बहुत छीछालेदारी करने की कोशिश की उन्होंने और फिर वे मथुरा की ओर प्रस्थान कर गए। अब बारी थी जीतू पटवारी की। जब वे मंच पर आए तो तरह-तरह के तंज उन्होंने भी कसे। इसमें दर्शकों का क्या बिगड़ रहा था उन्हें तो खूब मज़ा आ रहा था। सभी लोग हँस-हँसकर लोटपोट हो रहे थे। बड़े दमदार तरीके से कहा जा सकता है कि राऊ के बिजलपुर के इस छोरे ने लू उतार दी। जीतू पटवारी ने भी अपनी बात कही और फिर वे भी विदा हो गए।
जब काव्य-कार्यक्रम शुरू होने ही वाला था तब संचालक को अचानक याद आया कि कुलगुरु जी को अभी संबोधन के लिए आमंत्रित ही नहीं किया गया। आनन-फानन में उन्हें माइक पर कुछ कहने के लिए बुलाया गया। कुलगुरु आए पूरी शालीनता के साथ घड़ी में देखा कि 8 बजकर 50 मिनट हो चुके हैं, और बड़े विनम्र शब्दों में कह दिया, "कार्यक्रम 7 बजे से था समय का इतना अतिक्रमण हो चुका है तो जिन कवियों को सुनने हम यहां आए हैं, उन्हें सुनते हैं।" और इतना कहकर वे ख़ुद दर्शक दीर्घा में जाकर बैठ गए। इस त्याग को देखकर शशिकांत यादव ने मंच सँभाला और तुरंत कहा, "इसको कहते हैं त्याग रस! 😂 ऐसे ही थोड़े न कुलगुरु बनाया जाता है, छाँटकर बनाया जाता है!" इस वाक्य के साथ उस रात की असली काव्य-संध्या भी शुरू हो गई।
शशिकांत यादव: हास्य, व्यंग्य और भक्ति का अद्भुत संगम -
शशिकांत यादव कल शाम के सूत्रधार भी थे और कह सकते है कि सबसे पहले प्रस्तुति देने वाले भी। उन्होंने जब सभी कवियों का परिचय दिया, तो दर्शक हँस-हँसकर लोटपोट हो गए। परिचय के दौरान उन्होंने कहा, "जो आधे पागल होते हैं वो कवि होते हैं, और जो इन्हें बुलाकर सुनते हैं वो इनसे भी बड़े वाले होते हैं! 😂 तराज़ू के दो पलड़े होते हैं जो भारी होता है वो नीचे होता है।"
जब नेता-गण, मंत्री, पूर्व मंत्री सब जाने लगे, तो शशिकांत जी ने तंज कसा और कहा, "मंत्री, पूर्व मंत्री तो ऐसे भागे जैसे हम कवि काटते हों! जहाँ गए हैं वहाँ भगवान उनकी यात्रा को सद्गति दे 😂 हमको सुनने वाले विधायक सब मंत्री बने, जिन मंत्रियों ने सुना वो मुख्यमंत्री बने, जिन मुख्यमंत्री ने सरदार पटेल स्टेडियम में तीन-तीन बार नीचे बैठकर सुना वो आज प्रधानमंत्री बने। और राम के नाम पर कार्यक्रम है तो आनंद होना ही चाहिए क्योंकि आख़िर में कुछ भी नहीं होगा तो आख़िर में राम नाम सत्य तो होगा ही!" 😂
फिर उन्होंने एक पंक्ति कही जो पूरे हॉल में गूँज उठी, "वाल्मीकि के जाप का निकला ये परिणाम है, दोनों में सम्मान है मरा कहो या राम!"
एक व्यक्ति जब कार्यक्रम में से उठकर जाने लगा तो शशिकांत जी ने कहा, "यादव जी की ही सरकार है और यादव के सामने ही उठकर जा रहे हो।" पत्रकारों और साहित्यकारों की "एकता" पर उन्होंने जो चुटकी ली, वो बेमिसाल थी, "पत्रकार और साहित्यकार हम एक ही खानदान के लोग हैं। हम दोनों के पीछे 'कार' लगी हुई है। बस हमारी कार का स्टीयरिंग किधर घुस जाए, इसका कोई पता नहीं!" 😂
कार्यक्रम में मौजूद एक पंजाबी सरदार की तरफ देख कर उन्होंने कहा कि जो लोग कह रहे हैं संख्या कम है तो यहां एक सरदार ही सवा लाख के बराबर बैठा है, आया भी अपनी मैडम के साथ है और देखो हंस रहा है। इसके बाद एक राजनीतिक कटाक्ष भी उन्होंने बड़े मज़ेदार अंदाज़ में किया यह कहकर कि हमारे यहां 10 साल तक एक सरदार मैडम के साथ रहे थे तो साँस भी नहीं ले पाए। 😂
उस शाम युवा पीढ़ी के प्रेम पर उनकी जो कविता आई वो हॉल में मौजूद हर नौजवान के दिल को छू गई। हर कोई उसमें अपना अक्स देख रहा था, "मंडे को मन चला और मन चली का मेल हुआ, ट्यूज़डे को ट्यूनिंग में हुई तकरार है। वेडनेसडे को चैटिंग हुई, थर्सडे को डेटिंग हुई, फ्राइडे को माल-संस्कृति में खोया प्यार है। ना ही कोई नैन-लड़े, ना ही प्रेम-पत्र पढ़ें, ना ही इज़हार, इकरार, इनकार है। सैटरडे को रेकिंग हुई, संडे को ब्रेकिंग हुई, वीकेंड की क्लोजिंग में खत्म हुआ प्यार है!"
अंत में सभी कवियों के पढ़ने के बाद उन्होंने वे फिर मंच पर आए तो राष्ट्रीय एकता और सांप्रदायिक सौहार्द पर उनकी कविता ने माहौल को पूरी तरह बदल दिया, "फैसला तो हो चुका है, फासले मिटाइए। हाथ तो मिला चुके हो, अब तो दिल मिलाइए। राम राष्ट्र है हमारे, राष्ट्र ही तो राम है। ईसा, नानक और पैगंबर पंथ के इमाम हैं। एक माँ के दो हैं लाल, धमनियों में रक्त लाल,
दुश्मनी पे है बवाल, दोस्ती भी है कमाल। जब भी हम लड़े, हमारी मातृभूमि बंट गई...जाति, धर्म, पंथ पर अड़े तो साख घट गई।"
और जाते-जाते वे बोले,
"मुसाफिर हो तुम भी, मुसाफिर हैं हम भी फिर मुलाकात होगी!" पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।
अभय निर्भीक: वीर रस और करुणा का अनोखा मेल -
वीर रस के प्रसिद्ध कवि अभय निर्भीक ने अपने काव्यपाठ की शुरुआत देश के सैनिकों को नमन करते हुए की। फिर वे श्रीराम के उस प्रसंग पर आए जहाँ रघुनंदन ने युद्ध के बावजूद लंका की निर्दोष प्रजा के प्रति अपनी करुणा को बनाए रखा। उनकी पंक्तियों ने दर्शकों को सीधे रामायण के उस कालखंड में पहुँचा दिया,
"रघुभूषण ने मन में पुण्य विचार किया,
यदि राजा हो जाए निरंकुश उसको रहता होश नहीं,
रावण बहुत गलत है लेकिन यहाँ प्रजा का दोष नहीं।
राजधर्म के अमृत घट में यह विष नहीं भरेंगे हम,
लंका की निर्दोष प्रजा की हत्या नहीं करेंगे हम।"
"प्रभु ने बालिपुत्र के हाथों क्षमादान संदेश दिया,
शांतिदूत बनकर अंगद ने लंका मध्य प्रवेश किया।
भरी सभा में लंका के हित में कुछ शुद्ध सुझाव दिया,
रक्त बहे निर्दोषों का तो प्रभु मन होता भारी है,
रघुनंदन को अपनों के संग शत्रु प्रजा भी प्यारी है।
रघुभूषण के बाणों को किंचित ना क्रुद्ध करेंगे हम,
क्षमा सहित सिया लौटा दो, बिल्कुल ना युद्ध करेंगे हम।"
फिर रावण के अहंकार और उसके अंजाम पर उनकी पंक्तियाँ आईं,
"मूर्ख अधर्मी ने विनाश का खंजर खुद को घोंप दिया,
अहंकार के मद में निर्दोषों को रण में झोंक दिया।
एक तरफ रावण का छल था, दूजी ओर सत्य की आशा,
एक तरफ असुरों का बल था, दूसरी ओर तपस्वी भाषा।
एक तरफ भगवा ध्वज था, सेना थी रघुराई की,
और दूसरी ओर खड़ी थी केवल भीड़ बुराई की।"
और अंत में राम का वह संकल्प जो रणभूमि में गूँजा,
"जीत सत्य की हो असत्य पर, सत्य पुनः सत्यापित हो,
तीनों लोकों के कण-कण में पूर्ण धर्म स्थापित हो।
राक्षस कुल की परछाई भी समरभूमि में खोएगी,
पूरी लंका शांत दीप प्रज्वलन हेतु भी रोएगी।"
अभिसार शुक्ला जिन्होंने मंच लूट लिया -
युवा कवि अभिसार शुक्ला ने मंच लूटा यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है। उनकी कविताएँ आधुनिक ज़िंदगी की उन नसों को छूती थीं जिन पर हम सब चुपचाप हाथ धरे बैठे हैं। हर पंक्ति पर हॉल से "वाह-वाह" उठती रही,
"पतंगे चरखियाँ हैं पर उड़ाना भूल जाता हूँ,
मैं तुमसे इश्क करता हूँ बताना भूल जाता हूँ।
मिलकर मेरे बचपन के टीचर को बताना है,
अब अक्सर काम के चक्कर में खाना भूल जाता हूँ।
फ़र्क नहीं पड़ता इसको महलों से या छप्पर से,
शोहरत ज़्यादा बढ़ जाए तो खा जाती है भीतर से।
और आँच आने पर आ जाए तो,
क़द मत देख मुखालिफ का,
धनुष उठाकर तीर चढ़ाकर ऊँचा बोल समंदर से!
इक आदत को इतना ढोया, अब तो यह भी याद नहीं,
दफ़्तर जाता हूँ घर से, या घर जाता हूँ दफ़्तर से।
पिताजी बहुत सम्भलकर चलते हैं,
तो सोचता हूँ कितनी चोटें खाई होंगी,
कितनी दारी ठोकर से।
इश्तिहारों में नाम होते ही भूल जाता हूँ,
काम होते ही भूल जाता हूँ,
दस बरस पहले माँ से बोला था,
"लौट आऊँगा शाम होते ही।"
राम सत्य का एक नाम है, राम नाम को जपते-जपते राम नाम तक रह जाते हैं नाम बड़ा हो जाता है और राम अकेले रह जाते हैं।"
यह आख़िरी पंक्ति जब उन्होंने कही तो कुछ देर के लिए हॉल में खूब तालियाँ बजी।
राजीव राज: जब गीत ने सबको राममय कर दिया -
कवि राजीव राज ने मंच पर आते ही एक गहरी बात कही जो दिल में उतर गई उनका कहना था कि मंगल पर जीवन खोजते-खोजते हम अपने जीवन का मंगल खो बैठे है। और फिर उन्होंने राम के ऊपर ऐसा गीत छेड़ा कि पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट में डूब गया। जब तक वे गाते रहे, दर्शक झूमते रहे,
"राम नहीं तो सृष्टि नहीं, हम और आप नहीं।
यदि पूछ सको तो पूछो तुलसी से रघुवर की सच्चाई।
जन के मन के धूप राम,
मर्यादा के प्रतिरूप राम।
राम मलय की वह बयार,
हर तन को जो बाँटती प्राण है।
धरती और गगन की महासंधि में व्याप्त हुए पाँचों तत्व
आदि सनातन क्रम में जनम-मरण में बसते हैं,
पंचवटी के इस पावन प्रांगण में बसते हैं।
राम जगत के तारण और तरण में बसते हैं,
राम हमारे जीवन के क्षण-क्षण में बसते हैं।"
उन्होंने अपने प्रसिद्ध "यादें झीनी रे" गीत के माध्यम से गाँव की सादगी और आज के मशीनी जीवन के बीच की दूरी को बहुत मार्मिक ढंग से उकेरा,
"बिना पैसे का वो अख़बार, सादगी का मीना बाज़ार कहाँ है आज?
मशीनी हुआ आदमी, कहो सुनेगा कल किसका क्रंद।
आज हम पर किस्से तो हैं, कलेजे के हिस्से तो हैं,
कसक जिनमें, महक जिनमें बसी है धीमी-धीमी रे,
यादें झीनी रे, झीनी रे।"
गाँव से शहर, शहर से महानगर तक पहुँच गया जीवन,
सोचता हूँ अब आगे और कौन-सा होगा परिवर्तन
किसी के पास किसी के लिए वक़्त जब आज ही नहीं है।
ज़िंदगी की तलाश में हम आगे सड़क पर बढ़ते रहते हैं, लेकिन सच तो यह है कि सुख जो बीत गया है, उसी में था" यह संदेश भी उनके पूरे गीत में धड़कता रहा।
श्रद्धा शौर्य: शक्ति, भक्ति और स्वाभिमान की कवयित्री -
मंच पर उपस्थिति आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाली एकमात्र कवयित्री श्रद्धा शौर्य का मंच पर आना एक नई ऊर्जा लेकर आया। उन्होंने सबसे पहले अयोध्या और राम नाम की महिमा पर ऐसी पंक्तियाँ पढ़ीं कि मन भीग गया।
"अवध की धूल का ये कण-कण कहता है राम, राम, राम, राम जाके आज़माइए!
एक बार जाकर तो देखिए, अवध की होली का ये कण-कण कहता है राम, राम, राम, राम जाके आज़माइए।
नदिया भी कलकल राम-धुन में करे हैं,
अँजुरी में सरयू का नीर तो उठाइए।
डाल-डाल पे बसे हैं, पात-पात में खिले हैं,
चित्रकूट वाले जंगलों में आप जाइए।
अरे रोम-रोम कहने लगेगा राम, राम, राम!
एक बार राम से लगन तो लगाइए।"
फिर उन्होंने रामलला के स्वरूप का वर्णन किया,
"देख जिन्हें दिशा दस, अवनी-अनंत, तारिकाएँ, चंद्र क्या है सूर्य भी लजाते हैं।
आनंद के कंद रघुनंद का अनूप रूप, सुर-मुनि योग निज ध्यान में बसाते हैं।"
और राम के स्वरूप को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा,
"नर-नारायण के, कर्तव्यपरायण के,
सकल चराचर के भूप मेरे राम हैं।
शबरी के, केवट के, रीछ और मरकट के,
दीन-दुखी, दुष्ट-रण रूप मेरे राम हैं।
चंद्रमा की चाँदनी-सी, चंदन-शीतल भी,
साँवरी सलोनी सौंध धूप मेरे राम हैं।
धर्म-धर्म बोलते हो, धर्म-मर्म खोजते हो
साधुजन धर्म का जीवंत रूप मेरे राम हैं।
फिर उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई पर जो पंक्तियाँ कहीं, उस पर पूरा हॉल "वाह-वाह" कर उठा। उनका एक वाक्य इतना धारदार था कि मेरे मन में देर तक गूँजता रहा, "रानी लक्ष्मीबाई को 'मर्दानी' क्यों कहते हो? जब रानी स्वयं भवानी थीं!" मर्दानी शब्द से उन्हें आपत्ति थी रानी किसी से कम नहीं थीं, वे स्वयं शक्ति का स्वरूप थीं।
पंकज दीक्षित: राम-तत्व और सीता जी का मनोभाव -
पंकज दीक्षित ने मंच पर आते ही सभी के मन में बैठे राम-तत्व को नमन किया। शुरुआत में ही उन्होंने अज़हर इक़बाल को लेकर एक बात साझा की। जब वे दोनों मंच पर बैठे थे तब अज़हर भाई को चाय तलब लग रही थी तो उन्होंने दीक्षित जी के कान में कहा जितना दम हो उतनी ताकत से एक चाय मंगवा दो बस। इस पर शशिकांत यादव ने एक जोरदार राजनीतिक मसालेदार मज़ेदार टिप्पणी की और कहा, " 'अज़हर' भाई चाय माँग रहे हैं मतलब चायवाले का भविष्य बिल्कुल ठीक है!"
राम को लेकर पंकज दीक्षित की पंक्तियां कुछ इस प्रकार से थी,
"शाम जंगल के नाम होते हैं,
राह काँटे तमाम होते हैं।
त्याग की रीत को निभाते हुए,
त्याग की प्रीत को निभाते हुए
सच्चे लोगों में राम हैं।"
उन्होंने अयोध्या पर आए संकट का वर्णन किया तो पूरा हॉल उस दर्द में डूब गया,
"सुख से संचित सूर्यवंश पर सहसा एक संकट छाया है,
विवश व्यथित हो वर दशरथ का वज्रपात बनकर आया है।
सहम गई है आज अयोध्या इस विपदा के बोझ तले,
रघुकुल समूचा मुरझाया है इस विपदा के शोक तले।
राजतिलक होना है जिनका, निर्वासित हो जाएँगे,
रघुनंदन अब राज छोड़कर सीधे वन को जाएँगे।"
कैकई के पश्चाताप को भी उन्होंने बड़ी सूक्ष्मता से पकड़ा और कहा,
"कैकई माता की आँखों में असमंजस के भाव दिखे,
जो जिव्हा से छूट गए थे, उन तीरों के घाव दिखे।"
और माता सीता जी के अंतर्मन को जब उन्होंने शब्द दिए, तो वो पल बहुत ख़ास था,
"मैं एकाकी खड़ी, चकित नियति का लेखा सोच रही,
दिशाहीन चुप कोलाहल में मैं अपना पथ खोज रही।
रामायण की रचना में अपना मंचन पहचान लिया।
अनायास था नहीं राम का पुष्प वाटिका में आना,
महज नहीं था प्रेम जिव्हा पर राम-राम का रट जाना।
सारे दृश्य रचे नियति ने, मुझको मानस में रखकर
यानी मुझको धर्म निभाना है, सारे वैभव तक।"
अमन अक्षर: राम भक्ति के गायक -
अमन अक्षर ने मंच संभालते ही खूब दाद बटोरी। उन्होंने ज़ुबैर अली ताबिश के दो शेर सुनाए। राधा-कृष्ण पर उनका गीत था जिसमें हिंदुस्तान की उस ख़ूबसूरती की झलक थी जो हमें बाकी दुनिया से अलग बनाती है। हाल न पूछो मोहन का सबकुछ राधे-राधे है।
और फिर उन्होंने अपना चर्चित वह राम-गीत सुनाया जिसके बाद पूरा माहौल भक्तिमय हो गया। हर उपस्थित व्यक्ति राममय हो गया,
"सारा जग है प्रेरणा प्रभाव सिर्फ राम है, भाव सूचियां बहुत है भाव सिर्फ राम है।"
"कामनाएं त्याग पुण्य काम की तलाश में, राजपा त्याग पुण्य काम की तलाश में, तीर्थ खुद भटक रहे थे धाम की तलाश में, राम बन गए थे अपने राम की तलाश में।"
राम और जानकी के अटूट प्रेम पर उन्होंने कहा,
"योजनों की यात्रा थी राम पर थके नहीं, लाख बल भी जानकी का मन बदल सके नहीं। प्रीत का था वृक्ष जिस पे छल के फल पके नहीं, जानकी झुकी नहीं तो राम भी रुके नहीं।"
"खो गई थी जो विजय उसी का सार जानकी, ढूंढते थे जिनको राम द्वार-द्वार जानकी। एक जीत कम थी जिनको ऐसी हार जानकी, राम भी तो जीत लाए बार-बार जानकी।"
जाते-जाते उन्होंने जो पंक्ति कही, वो पूरे हॉल में देर तक गूँजती रही,
"दुश्मन की चलती तो मुझे भी डूब जाना था अमन अक्षर वो पत्थर है जिस पर राम लिखा है।"
अज़हर इकबाल: शाम के तुरुप का इक्का
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अज़हर इक़बाल वो नाम है जो अपनी मखमली आवाज और गहरे एहसासों से दुनिया भर के दिलों पर राज करने वाले विश्व प्रसिद्ध शायर है। अंत में वे आए और इन्हें सुनना सिर्फ उन्हीं लोगों के नसीब में था जो आखिर पौने बारह बजे तक टिके रहें। जब इक़बाल साहब मंच पर आए तो तालियों की जो गड़गड़ाहट हुई वो बता रही थी कि पूरा हॉल उनका इंतज़ार कर रहा था। जैसे किसी बड़े मैच में आख़िरी ओवर में असली बल्लेबाज़ उतरता है ठीक वैसे। और इस पारी में भी अज़हर इकबाल बाज़ी जीत जाते है। उन्होंने शुरुआत ही उस पंक्ति से की जो राम के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को एक शेर में समेट देती है,
"मानवता की देह का उन्नत माथा राम,
भारत के इतिहास की गौरव-गाथा राम।
दोनों के व्यक्तित्व में बस इतना था भेद
रावण विध्वंसक रहा और निर्माता राम।"
समंदर भी कहाँ देता है रास्ता
किसी को राम हो जाने से पहले।
दया अगर लिखने बैठूँ तो होते हैं अनुवादित राम,
रावण को भी नमन किया ऐसे थे मर्यादित राम।"
फिर उन्होंने दर्शकों को अपनी शायरी की गहराई में उतारा जहां प्रेम, विरह, इंतज़ार, बचपन की यादें, रिश्तों का खो जाना समेत तमाम एक के बाद एक ऐसे शेर आते गए और हर शेर पर तालियाँ बटोरी।
"मैं इंतज़ार में जर्जर हुई इमारत हूँ,
कोई छू न ले, मैं ध्वस्त हो न जाऊँ कहीं।
हमारी हार पे एक शख़्स मुस्कुरा उठा,
हम अपनी हार को भी जीत करके बैठे हैं।
न जाने कब से है वीरान मेरे मन का सदन
किसी को इसमें मनोनित करके देखते हैं।"
"तुझको पा लेने की ख्वाहिश करते हुए,
दामन करते हुए रात गुज़री है चिंतित करते हुए।
न जाने वो बच्चे किन रास्तों पर खो गए,
जो बड़े-बूढ़ों को जाते थे नमन करते हुए।
प्रेम, पूजा से भी बढ़कर है तो फिर ये जानलो,
ज़हर भी पीना पड़ेगा आचमन करते हुए।"
"हाँ वही, जिससे हमारा आत्मिक संबंध था
खो दिया एक दिन उसको हमने, बदन करते हुए।"
हर शेर पर हॉल झूमता रहा। अज़हर इकबाल की ख़ासियत यह है कि वो एक ही शाम में राम जैसे गहरे विषय से लेकर रोज़मर्रा की ज़िंदगी के दर्द तक सब कुछ इस तरह कह जाएंगे कि हर सुनने वाले को लगता है यह शेर उसी के लिए लिखा गया है। कल रात भी यही हुआ।
समापन: राम नाम में सब एक हो गए -
कार्यक्रम के समापन पर पंकज मुकाती जी ने सभी कवियों, अतिथियों और दर्शकों का आभार माना। कल भोपाल के समन्वय भवन में जो हुआ वो सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं था। वो एक अनुभव था। एक मंच पर सत्ताधारी और विपक्षी दोनों थे, हिंदू-मुस्लिम दोनों के कवि थे, हास्य था और वेदना थी, भक्ति थी और व्यंग्य था और फिर भी सब राम के नाम पर एक धागे में पिरोए हुए थे। यही तो राम का असली चमत्कार है।
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