गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड और 61 की उम्र में अनस्टॉपेबल जुनून
(नैवेद्य पुरोहित)
किसी ने सच कहा है कि रिटायरमेंट सिर्फ कागजों पर होता है, रगों में दौड़ते जुनून का कभी अंत नहीं होता। धर्मेश यशलहा की कहानी इसका सबसे बड़ा सबूत है। दैनिक भास्कर इंदौर की लॉन्चिंग टीम से शुरू हुआ यह सफर आज 43 साल बाद भी उसी रफ़्तार से जारी है।
धर्मेश के नाम गिनीज़ वर्ल्ड बुक में एक रिकॉर्ड भी दर्ज है। एक मैच के दौरान सबसे ज्यादा 'शटल' इस्तेमाल होने की सटीक गिनती करना और उसे आधिकारिक रूप से दर्ज कराना कोई मामूली बात नहीं थी। उनकी इस उपलब्धि का लोहा प्रतिष्ठित मैगज़ीन 'बैडमिंटन इंग्लैंड' ने भी माना और वहीं से यह जानकारी 'गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड' तक पहुँची। एक रेफरी के रूप में उनकी एकाग्रता और खेल के प्रति समर्पण ने इंदौर का नाम दुनिया के नक्शे पर चमका दिया।
इस साल वे 62 साल के हो जायेंगे लेकिन उनकी सक्रियता किसी 21 साल के नौजवान को भी मात दे दे। वे आज भी 'नेशनल स्पोर्ट्स टाइम्स' के लिए निरंतर लिख रहे हैं। तकनीक बदली, अखबारों के पन्ने बदले, लेकिन उन्होंने खुद को वक्त के साथ ढाला। आज वे फेसबुक और व्हाट्सएप के माध्यम से अपनी बेबाक टिप्पणियां, खेल समीक्षाएं और दुर्लभ तस्वीरें साझा करते हैं। उनके लिए पत्रकारिता कोई 'नौकरी' नहीं, बल्कि समाज और खेल को दिया गया एक वचन है। यह पूरा जीवन एक ही सीख देता है, "काम की कद्र करो, पर स्वाभिमान की कीमत पर नहीं!" चाहे वह भास्कर का ₹200 का विवाद हो या बाद में पारिश्रमिक बंद होने पर लिखना छोड़ना, उन्होंने हमेशा अपने सिद्धांतों को ऊपर रखा। आज उन्हें हम इंदौर की खेल पत्रकारिता के 'भीष्म पितामह' भी कह सकते हैं, जिनके पास यादों का खजाना और अनुभवों का समंदर है। दैनिक भास्कर में उनकी ये 'गुमनाम' नहीं, बल्कि 'मिसाल' बनने वाली कहानी हमेशा प्रेरित करती रहेगी।
(अगली किस्त में पढ़िए: कल से एक नया अध्याय। नारी शक्ति की एक अनकही दास्तां जहां में आपको ले चलूँगा उस दौर में जब प्रेस की दुनिया में महिलाओं की मौजूदगी भी एक दुर्लभ बात थी। कैसे एक युवती दैनिक भास्कर इंदौर की लॉन्चिंग टीम का हिस्सा बनी। 'महू वाली मैडम' की इस दिलचस्प कहानी के लिए तैयार रहिए कल से!)
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