बेगमपुल से दरियागंज : लुगदी साहित्य के गौरवशाली पन्नों की खोज

(नैवेद्य पुरोहित)
हिंदी साहित्य के परिदृश्य में ‘बेगमपुल से दरियागंज’ जैसी किताब बहुत कम आती है जो न केवल एक भूले हुए दौर का दस्तावेज़ बन जाए, बल्कि हमारी सांस्कृतिक स्मृति को भी झकझोर दे। यशवंत व्यास की यह पुस्तक उसी विलक्षण श्रेणी में आती है। यह मात्र एक साहित्यिक यात्रा नहीं, बल्कि हिंदी पल्‍प या लुगदी साहित्य के इतिहास, उसकी समाजशास्त्रीय पृष्ठभूमि, उसकी लोकप्रियता और उसके गौरवशाली अवदान का गहन अध्ययन है। व्यास ने इस किताब में उस युग की धड़कन को शब्दों में बाँधा है, जब मेरठ का बेगमपुल सिर्फ एक स्थान नहीं था बल्कि एक सांस्कृतिक प्रतीक था। वहीं से वह लहर उठी थी जिसने हिंदी के लाखों-करोड़ों पाठकों को रहस्य, रोमांच, जासूसी और प्रेमकथाओं की दुनिया से जोड़ा। मेरठ से चलकर दिल्ली के दरियागंज तक पहुँची यह साहित्यिक धारा आम पाठक के जीवन का हिस्सा बन गई थी सस्ते कागज़ पर छपने वाली वे कहानियाँ, जो किसी रेल के डिब्बे, गलियों की दुकानों या स्कूल की किताबों के बीच छिपकर पढ़ी जाती थीं। यशवंत व्यास की दृष्टि सिर्फ साहित्यिक नहीं, शोधपरक और सांस्कृतिक भी है। उन्होंने लुगदी साहित्य के इतिहास की तहों को खोलने के लिए पुराने लेखकों, प्रकाशकों, पाठकों और पत्रिकाओं की दुनिया में गहराई तक उतरकर अध्ययन किया है। यह किताब बताती है कि “सस्ता साहित्य” दरअसल कितना अमूल्य था क्योंकि उसी ने हिंदी को जनभाषा बनाया, आम आदमी के भीतर पढ़ने की भूख जगाई और भाषा को घर-घर तक पहुँचाया। लेखक की भाषा में पत्रकारिता की तीक्ष्णता और साहित्य की संवेदना का अद्भुत मेल है। वे जहाँ शोध की ठोस ज़मीन पर खड़े हैं, वहीं लेखन में वह सहजता और जीवंतता है जो पाठक को बाँधे रखती है। हर पृष्ठ पर एक ऐसा किस्सा, प्रसंग या संवाद है जो उस युग को आँखों के सामने जीवंत कर देता है जैसे पाठक खुद बेगमपुल की गलियों या दरियागंज की किताबों की दुकानों में घूम रहा हो।
यह पुस्तक सिर्फ साहित्यिक इतिहास नहीं, बल्कि लोकप्रिय संस्कृति के समाजशास्त्र को समझने की कुंजी है। यह उस मानसिकता पर भी प्रश्न उठाती है जिसने पल्‍प साहित्य को “नीचा” कहा, जबकि वह साहित्य जनता की धड़कन था। व्यास ने यह स्पष्ट किया है कि गंभीर साहित्य और लोकप्रिय साहित्य के बीच की दीवार कृत्रिम है दोनों ही समाज की संवेदनाओं के अलग-अलग रूप हैं। ‘बेगमपुल से दरियागंज’ एक खोई हुई दुनिया का पता देती है वह दुनिया जो अब स्मार्टफोन की स्क्रीन में गुम हो चुकी है, पर जिसने कभी हिंदी पाठक की कल्पनाशक्ति को आकार दिया था। यह किताब उस परंपरा को पुनर्जीवित करती है, जो मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक चेतना का भी माध्यम थी। यशवंत व्यास की यह कृति सिर्फ लुगदी साहित्य की कहानी नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक धारा का पुनर्पाठ है जिसे हमने कभी गंभीरता से नहीं देखा। गहन शोध, संवेदनशील भाषा और प्रभावशाली प्रस्तुति के कारण ‘बेगमपुल से दरियागंज’ हिंदी की उन दुर्लभ पुस्तकों में से है जो मनोरंजन के साथ-साथ बौद्धिक तृप्ति भी देती हैं। यह पुस्तक यह प्रमाणित करती है कि साहित्य की कोई श्रेणी ऊँची या नीची नहीं होती सच्चा साहित्य वही है जो जन-मन की धड़कनों में बस जाए। #यशवंत_व्यास #लुगदी_साहित्य #बेगमपुल_से_दरियागंज

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