अभ्युदय 2025 : एक अविस्मरणीय आरंभ!
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में आयोजित ‘अभ्युदय-2025’ न केवल एक कार्यक्रम था बल्कि यह हम सभी नवागंतुक विद्यार्थियों के लिए एक नई यात्रा का शुभारंभ था।
अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं – “तुम दिल्ली छोड़कर भोपाल क्यों चले आए?” पर आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मुझे अपने फैसले पर गर्व होता है। नियति ने जो तय किया, वही हुआ और सच कहूँ तो जो अनुभव और अवसर यहाँ मिल रहे हैं, वे शायद कहीं और संभव नहीं थे।
एक भव्य शुरुआत
20 अगस्त 2025 को जब विश्वविद्यालय परिसर में मुख्यमंत्री श्री मोहन यादव और लोकप्रिय कवि डॉ. कुमार विश्वास ने दादा माखनलाल चतुर्वेदी की 12 फीट ऊँची प्रतिमा का अनावरण किया। इस प्रतिमा के चारों ओर कोई ‘उद्घाटनकर्ता’ या ‘मुख्य अतिथि’ का नाम नहीं था। इसके बजाय तीन ओर महात्मा गांधी, फ़िराक गोरखपुरी और मैथिलीशरण गुप्त द्वारा दादा के लिए कहे गए उद्गार अंकित थे। चौथी ओर ‘कर्मवीर’ नामक समाचार पत्र की प्रतीकात्मक प्रति अंकित थी, जो कभी उन्हीं के द्वारा प्रकाशित किया जाता था। हमारे कुलगुरु आदरणीय विजय मनोहर तिवारी सर का यह विचार इस बात का प्रमाण है कि यह विश्वविद्यालय दिखावे से नहीं, बल्कि आज भी विचार और सार से चलता है। कई विश्वविद्यालयों के कुलगुरु ऐसे हैं जो अपना नाम हर जगह छपवाना चाहते है। लेकिन विजय सर की सरलता, विनम्रता और गहन दृष्टि हमें प्रेरणा देती है।
कुलगुरु के शब्दों की गूंज!
पहले ही दिन कुलगुरु ने बेहद सटीक बात की। उन्होंने कहा – “हमारे आसपास बहुत लोग हैं जो कारतूस लेकर घूमते हैं, उनके पास बंदूक नहीं है। किसी के पास बंदूक है वो दोनों मिल जाते हैं अब वे दोनों मिलकर किसी और के कंधे की तलाश करते हैं। उसपे चलाने के लिए कोई चौथा दिमाग निशाने ढूंढता है। मैं आपसे अपेक्षा करता हूं कि यहां से निकलने के बाद अपने पूरे पत्रकारीय करियर में कंधा भी आपका हो, कारतूस भी आपका हो, बंदूक भी आपकी हो और अपने बुद्धि विवेक से निशाना भी आप लगाएंगे। हमारे कंधे उधार के लिए नहीं है हम किराए पर कंधे किसी को नहीं देंगे। हम न इस पक्ष में हैं, न उस पक्ष में हम राष्ट्र के पक्ष में हैं।” यह कथन हम सभी के लिए मार्गदर्शन है कि पत्रकारिता या संचार में सबसे बड़ा धर्म राष्ट्रहित है।
पहला दिन – प्रेरणाओं से भरा
पहले दिन का सबसे विशेष क्षण था डॉ. कुमार विश्वास का संबोधन। उन्होंने स्पष्ट कहा – “तटस्थ होकर लिखना ही पत्रकारिता का धर्म है। किसी वैचारिकी से प्रेरित होने के बावजूद साहस से सवाल पूछना ही पत्रकार का कर्तव्य है। उनकी यह बात हर विद्यार्थी के लिए संदेश थी कि पत्रकारिता सिर्फ़ ‘सूचना देने’ का माध्यम नहीं बल्कि समाज के सामने सत्य रखने का दायित्व है।
उसी दिन दैनिक भास्कर के प्रख्यात स्तंभकार "मैनेजमेंट गुरु" एन. रघुरामन का सत्र हुआ। उनका सेशन सबसे अधिक इंटरैक्टिव और मज़ेदार था। उन्होंने पाँच ‘बास्केट’ की बात की :
1. Goodness Basket – आपको बड़ा आदमी बनकर मानवता दिखाने की ज़रूरत नहीं है, आप गरीब रहकर छोटे होकर मानवता दिखाओगे अपने आप बड़े आदमी बन जाओगे।
2. Opinion-less Basket – दूसरों के प्रति पूर्वधारणा मत बनाओ, अपनी जानकारी को ज्ञान में बदलो।
3. Simplicity Basket – सादगी लंबे समय तक जीवित रहती है।
4. Anger-less Basket – गुस्से पर नियंत्रण रखो इससे प्राकृतिक नेतृत्व क्षमता बढ़ेगी। दूसरों के प्रति सहानुभूति रखना और समाधान पर बात करना सबसे महत्वपूर्ण हैं।
5. Clean Soul Basket – Accept, Adjust और Appreciate – यही जीवन के तीन A हैं।
मुझे उनसे प्रश्न पूछने का भी अवसर मिला और सच कहूँ तो वह मेरे लिए बेहद यादगार रहा।
दूसरा दिन – ज्ञान और दृष्टि का विस्तार
दूसरे दिन के सत्र में अमर उजाला के समूह सलाहकार संपादक जाने-माने लेखक श्री यशवंत व्यास ने एआई के दौर में प्रिंट मीडिया के महत्व पर अपनी बात रखी। उनका कहना था – “अगर प्रिंट मीडिया को मरना होगा तो वह मर जाएगा, लेकिन अपडेट नहीं होगा तो मरेगा ही। एआई का भी एक बाज़ार है जो रोज़गार पैदा कर रहा है। उसका इस्तेमाल नौकर की तरह करना होगा।"
इसके बाद विविध भारती के वरिष्ठ उद्घोषक श्री कमल शर्मा ने आवाज़ की दुनिया में भाषा की शक्ति पर बोला। उनका कहना था कि “शब्द को ब्रह्म का स्थान दिया गया है। इसी से अग्नि, जल और पृथ्वी की उत्पत्ति हुई। लेकिन आज ‘भाषा के सरलीकरण’ के नाम पर भाषा की हत्या हो रही है।”
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी जी ने पत्रकारिता, साहित्य और संस्कृति पर अपनी बात रखी। विश्वविद्यालय के लोगो "आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः" का अर्थ है समझाते हुए उन्होंने बताया कि हम ज्ञान सभी दिशाओं से प्राप्त करें और आगे उसे प्रस्फुटित करें।
पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर जी ने पत्रकारिता में भाषा की सरलता पर ज़ोर देते हुए कहा
“लेख उतना ही रोचक होना चाहिए जितना भोजन में चटनी का अनुपात। भाषा बनावटी नहीं होना चाहिए और ना ही क्लिष्ट। जैसे कारीगर का औजार होता है वैसे भाषा पत्रकार का औजार है।
अंतिम सत्र में भारत की सबसे बड़ी पीआर एजेंसी "एडफैक्टर्स पीआर" के निदेशक समीर कपूर जी ने पीआर और एडवरटाइजिंग की नई रणनीतियों पर विचार रखे और कहा– “पीआर की भूमिका अब मीडिया संबंधों से आगे बढ़कर कंपनियों की विश्वसनीयता और ब्रांड की प्रतिष्ठा को मजबूत करने में है, जबकि एडवरटाइजिंग का मुख्य उद्देश्य दृश्यता और बिक्री बढ़ाना है।"
तीसरा दिन – भावनाओं और सिनेमा का संगम
तीसरे दिन का सबसे प्रभावशाली सत्र था दैनिक जागरण के वरिष्ठ फिल्म पत्रकार और लेखक अनंत विजय जी का व्याख्यान। उन्होंने कहा – “फिल्में पूरी तरह इमोशंस है। सिनेमा भावनाएँ बेचता है।” उन्होंने कई फिल्मों का उदाहरण देते हुए बताया कि किस प्रकार राजनीति और विचारधारा भी फिल्मों के पीछे छिपी होती है। फिल्म बनाने की मंशा और उसके पीछे की राजनीति कैसी होती है। मदर इंडिया, चक दे इंडिया और फना जैसी फिल्मों के उदाहरण से उन्होंने समझाया कि दर्शकों तक पहुँचने वाली भावनाओं के पीछे कौनसी सोच और रणनीति काम करती है। जो गाने अश्लीलता का बोध कराते है उस पर भी उन्होंने अपनी बात रखी और बताया कि 1970 में आई जॉनी मेरा नाम मूवी का गाना, "हुस्न के लाखों रंग कौन सा रंग देखोगे, आग है ये बदन कौन सा अंग देखोगे"। उसी तरह एक और गाना "चल संन्यासी मंदिर में तेरा चिमटा मेरी चूड़ियां दोनों साथ बजाएंगे।" यह गाने उन्हें अश्लीलता का बोध कराते है। इसके बाद इकबाल, रुस्तम जैसी मूवी के लेखक विपुल रावल ने कहा -
“अगर किसी को गानों से अश्लीलता का बोध हो रहा है तो यह उसकी मानसिकता है। सोचने का तरीका है। आजकल लेखक मार्केट में जो चल रहा है वही लिखते हैं, लेकिन हमें ट्रेंड फॉलोवर नहीं बल्कि ट्रेंड सेटर बनना चाहिए।”
अंतिम सत्र में श्री बृजेश कुमार सिंह (ग्रुप एडिटर, नेटवर्क 18) ने प्रिंट, टीवी, डिजिटल मीडिया के कन्वर्जेंस दौर पर और श्री बालकृष्ण (कार्यकारी संपादक फैक्ट चेक, इंडिया टुडे ग्रुप) ने डिजिटल फ्रॉड इन इंडिया और प्रोजेक्ट शील्ड पर महत्वपूर्ण चर्चा की।
मेरा व्यक्तिगत अनुभव
इन तीन दिनों में मुझे सबसे यादगार अनुभव तब हुआ जब मेरे विभाग की ओर से मुझे अमर उजाला के समूह सलाहकार संपादक यशवंत व्यास जी और जिस्ट न्यूज़ व लल्लनटॉप की रिपोर्टर सोनल पटेरिया मैम को एयरपोर्ट जाकर रिसीव करने का अवसर मिला। भोपाल एयरपोर्ट से होटल पलाश तक की यात्रा में उनसे लंबी बातचीत हुई। मैंने जितना संभव था, उनसे सीखा और अपने बारे में बताया। यह मेरे लिए सौभाग्य की बात रही।
हमारे परिसर की इमारतें भी अद्भुत हैं। सामान्यतः कॉलेजों में A ब्लॉक, B ब्लॉक जैसे नाम होते हैं, पर यहाँ की इमारतें तक्षशिला, विक्रमशिला, नालंदा, चाणक्य भवन, शारदा पीठ जैसे नामों से जानी जाती हैं। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि ज्ञान की यह परंपरा यहीं जीवित है। बस हमें अपने भीतर के ‘चंद्रगुप्त’ को जगाना है।
सच कहूँ तो ‘अभ्युदय 2025’ मेरे जीवन का एक अविस्मरणीय अनुभव रहा। यह सिर्फ़ एक ओरिएंटेशन नहीं था बल्कि एक प्रचंड आरंभ था, जिसने हम सभी के भीतर नई ऊर्जा भर दी।
आज जब मैं इन तीन दिनों को याद करता हूँ तो मन गर्व और कृतज्ञता से भर जाता है। मैं अपनी विभागाध्यक्ष डॉ. राखी तिवारी मैम, कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी सर और पूरे विश्वविद्यालय परिवार का हृदय से आभारी हूँ, जिन्होंने हमें ऐसा मंच दिया। मैं मानता हूँ कि यह तो बस शुरुआत है। आगे की यात्रा और भी अधिक ज्ञान, अनुभव और अवसरों से भरी होगी।
~ नैवेद्य पुरोहित
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