विदेशों में हिंदी पत्रकारिता: इतिहास, संघर्ष और भविष्य
(नैवेद्य पुरोहित)
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के पत्रकारिता विभाग में शुक्रवार, 29 अगस्त को “विदेशों में हिंदी पत्रकारिता” विषय पर एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का संचालन आत्मीयता और ऊर्जा के साथ प्रो. शिवकुमार विवेक ने किया। मुख्य वक्ता डॉ. जवाहर कर्नावट (निदेशक, टैगोर अंतर्राष्ट्रीय हिंदी केंद्र) का परिचय कराते हुए उन्होंने कहा कि बैंक सेवा से सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने अभूतपूर्व कार्य किया है। संसाधनों के अभाव में भी उन्होंने विदेशों में हिंदी पत्रकारिता के 120 वर्षों से अधिक के इतिहास को संकलित किया और 25 देशों से प्रकाशित 150 से अधिक पत्र–पत्रिकाओं को एकत्रित कर नई पीढ़ी के सामने रखा।
मुख्य वक्ता डॉ. कर्नावट ने आते ही चुटकी लेकर कहा, “घर की मुर्गी दाल बराबर! जब मैं विदेशों में हर जगह व्याख्यान दे चुका, उसके बाद भोपाल वालों को याद आई।” उन्होंने विस्तार से विभिन्न महाद्वीपों में हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत, उसके स्वरूप और संघर्षों की चर्चा की। उल्लेखनीय है कि भारत में हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष होने वाले हैं, जबकि भारत के बाहर हिंदी पत्रकारिता के 142 वर्ष पूरे हो चुके हैं।
दक्षिण अफ्रीका: इंडियन ओपिनियन और सत्याग्रह की भूमि:-
डॉ. कर्णावत ने बताया कि 4 जून 1903 को दक्षिण अफ्रीका से ‘इंडियन ओपिनियन’ निकलना शुरू हुआ। यह पत्र अंग्रेज़ी, हिंदी, तमिल और गुजराती चार भाषाओं में छपता था, और बाद में महात्मा गांधी ने 1904 में इसका कार्यभार संभाला। यह बहुभाषिक समाचार पत्र था एक ही अंक में चारों भाषा का इस्तेमाल होता था। इसी पत्र ने भारतीय समुदाय को संगठित किया और नस्लभेद के खिलाफ़ आवाज़ दी। उन्होंने यह भी बताया कि यहीं से “सत्याग्रह” शब्द का जन्म हुआ। 12 सितंबर 1906 को वहां की संसद में एशियाई संशोधन अधिनियम (एशियाटिक अमेंडमेंट एक्ट) पारित हुआ। गांधी ने इसके विरोध में उनके अख़बार में अपील की और पाठकों से हिंदी में उपयुक्त शब्द सुझाने का आग्रह किया। एक पाठक ने ‘सत्य + आग्रह’ का प्रयोग सुझाया और गांधी ने इसे अपनाकर सत्याग्रह को विश्व इतिहास का अमर मंत्र बना दिया।
मॉरीशस: 'हिंदुस्तानी', 'धर्मवीर' और 'हिंदी' का स्वर:-
मॉरीशस की पत्रकारिता का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यहाँ भारतीयों ने बेहद कठिन परिस्थितियों में हिंदी की लौ जलाए रखी। मणिलाल डॉक्टर ने 1909 में ‘हिंदुस्तानी’ नाम से अख़बार निकालकर प्रवासी अधिकार चेतना को आवाज़ दी। भवानी दयाल सन्यासी ने 1922 में ‘धर्मवीर’और ‘हिंदी’ पत्र निकाले। सन्यासीजी ने अपने विशेषांकों में अंग्रेज़ी शासन की तीखी आलोचना की। विजयादशमी अंक में लिखा, “रावण रूपी अंग्रेज़ों का प्रताप चमक रहा है, पहले उसे हराना होगा उस पर पहले विजय प्राप्त करना होगा तभी असली विजयादशमी मानी जाएगी।” दीवाली विशेषांक में उन्होंने सवाल उठाया कि “क्या सचमुच आज दीवाली है? जब अंग्रेज़ों से आज देश का दिवाला निकल रहा है, तो यह कैसी दीवाली?” इन्हीं पत्रों ने मॉरीशस के प्रवासी भारतीयों को जाग्रत किया।
फ़िजी: ‘शांति दूत’ और हिंदी का संवैधानिक दर्जा:-
फ़िजी में 1913 में मणिलाल डॉक्टर पहुँचे और प्रवासी अधिकारों के लिए काम किया। वहीं 1935 में हिंदी साप्ताहिक ‘शांति दूत’ निकला, जो दशकों तक चलता रहा और हाल ही में 2020 में बंद हुआ। सबसे अहम तथ्य यह है कि भारत के बाद दुनिया का केवल एक ही देश है जहाँ हिंदी को संवैधानिक रूप से राजभाषा का दर्जा प्राप्त है और वह देश है फ़िजी!
कैरेबियन देश: त्रिनिदाद, टोबैगो, सूरीनाम:-
डॉ. कर्नावट ने बताया कि त्रिनिदाद में 1898 से ‘इंडियन कोहिनूर’ जैसे अख़बार निकलने लगे। इन पत्रों ने वहाँ के भारतीय मूल के लोगों को अपनी पहचान बचाने और अंग्रेज़ी शासन से लड़ने की चेतना दी।
अमेरिका और ग़दर आंदोलन:-
अमेरिका में 1913 से निकलने वाला ‘ग़दर’ अख़बार पाँच भाषाओं हिंदी, पंजाबी, उर्दू, बांग्ला और पश्तो में छपता था। इसे लाला हरदयाल और क्रांतिकारियों ने अंग्रेज़ों के खिलाफ़ प्रचार का औज़ार बनाया। इसी आंदोलन से जुड़े बरकतुल्लाह भोपाली जापान पहुँचे और वहाँ से भी आज़ादी की लड़ाई को नया आयाम दिया।
ब्रिटेन और यूरोप :-
ब्रिटेन से लंबे समय तक ‘अमरदीप’ नामक अख़बार निकलता रहा। इसके अलावा ‘पुरवाई’ जैसी सांस्कृतिक पत्रिकाएँ भारतीय प्रवासियों के साहित्य और संस्कृति का मंच बनीं।
रूस में भी ‘सोवियत दर्पण’ और ‘नई दिशा’ जैसी पत्रिकाएँ निकलती रहीं। जापान में 1960 के दशक से ‘सर्वोदय’ और ‘ज्वालामुखी’ जैसी पत्रिकाएँ प्रकाशित हुईं, जिनमें जापानी लेखकों के लेख हिंदी में छपते थे।
ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड:-
ऑस्ट्रेलिया में हिंदी पत्रकारिता का आरंभ ‘हिंदी पुष्प’ पत्रिका से हुआ जो बीस वर्षों तक नियमित निकली। न्यूज़ीलैंड से ‘द इंडियन टाइम्स’ निकलता था। 1996 में यहाँ से हिंदी की पहली ऑनलाइन पत्रिका ‘भारत दर्शन’ शुरू हुई, जिसने हिंदी पत्रकारिता को डिजिटल दिशा दी।
खाड़ी देश: दुबई और अबूधाबी की मिसाल:-
यूएई में अदालतों ने प्रवासी भारतीयों को राहत देने के लिए हिंदी भाषा में सेवाएँ उपलब्ध कराई हैं। 2000 के दशक में यहाँ से ‘अभ्युदय’ और ‘अनुभूति’ नाम की पत्रिकाएँ भी प्रकाशित हुईं।
डॉ. जवाहर कर्नावट के कथन:-
डॉ. कर्णावत ने जोर देकर कहा, “मीडिया में जो शोध कार्य होते हैं, वे बहुत घिसे-पिटे होते हैं। अब हमें नए क्षेत्रों पर काम करना चाहिए।” उन्होंने कहा “गूगल सहायक है, पुस्तकें नायक हैं।” “सीढ़ियों की ज़रूरत होने होती है जिन्हें छत तक जाना होता है, मेरी मंज़िल तो आसमान है रास्ता भी खुद ही बनाना है!”
अंत में पत्रकारिता विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. राखी तिवारी ने आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा,
“एक घंटे में विस्तृत रूप से पूरे विश्व की हिंदी पत्रकारिता का परिदृश्य हमारे सामने रखा गया। डॉ. कर्णावत का जीवन संघर्ष और निरंतर साधना हम सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है।"
इस अवसर पर पत्रकारिता विभाग के प्राध्यापकगण और बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित थे। इस व्याख्यान ने न केवल हिंदी पत्रकारिता के इतिहास से परिचित कराया, बल्कि यह भी दिखाया कि कैसे प्रवासी भारतीयों ने कठिन परिस्थितियों में भी अपनी भाषा, संस्कृति और पहचान को बचाए रखा।
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सीढ़ियों की जरूरत उन्हें होती हैं जिन्हें छत पर जाना है, मेरी मंज़िल तो आसमान है, रास्ता खुद ही बनाना होगा।
ReplyDeleteबात बहुत गहरी है...... और तुम समझदार हो..... डॉ जवाहर कर्णावत सर ने बहुत अच्छी जानकारी दी है ।नि संदेह तुम्हारे काम आएगी।