दिल्ली-कलकत्ता के नोटिस और भटनागर जी का 'ब्रह्मास्त्र'
(नैवेद्य पुरोहित)
साहब, जब हाथी चलता है तो धूल तो उड़ती ही है। भास्कर में खेतान ग्रुप वाली खबर क्या छपी, मानो पूरे देश के औद्योगिक घरानों में भूचाल आ गया। खबर की गूँज इतनी तेज थी कि सीधे पीएमओ (PMO) से जांच के आदेश हो गए और करोड़ों का प्रोजेक्ट रातों-रात धराशायी हो गया। लेकिन इतने बड़े रसूखदार लोग खामोश बैठने वालों में से नहीं थे।
कुछ ही दिनों में दैनिक भास्कर के इंदौर दफ्तर में नोटिसों की झड़ी लग गई। कोई छोटा-मोटा नोटिस नहीं, कलकत्ता और नई दिल्ली के उन वकीलों के लेटरहेड पर नोटिस आए थे जिनकी एक पेशी की फीस हजारों-लाखों में होती थी। दफ्तर में हड़कंप मच गया। तब इंदौर भास्कर के कानूनी सलाहकार और वकील खुश हो रहे थे, कहने लगे, "अरे भाई, ये तो बहुत बढ़िया मौका है। इसी बहाने कलकत्ता और दिल्ली की सैर होगी, बड़े होटलों में रुकेंगे और केस लड़ेंगे।"
लेकिन न्यूज़रूम का मिजाज वकीलों जैसा नहीं होता। तब इन्दौर भास्कर के प्रधान संपादक यतीन्द्र भटनागर थे। जिनकी रगों में पत्रकारिता का उसूल कूट-कूट कर भरा था। उन्होंने जब वकीलों की 'पिकनिक' वाली बातें सुनीं, तो उनके माथे पर बल पड़ गए। उन्होंने सीधे रमेश मिश्र 'चंचल' को रतलाम से इंदौर तलब किया।
इंदौर दफ्तर के उस बंद कमरे में सन्नाटा था। एक तरफ भटनागर जी बैठे थे और सामने खड़े थे हमारे बेबाक 'चंचल' जी। भटनागर जी ने मिश्र जी की आँखों में झाँककर पूछा,"मिश्रा, जो लिखा है उस पर टिके रहोगे? कोर्ट-कचहरी से डर तो नहीं लगेगा?"
मिश्र जी ने उसी बिंदास अंदाज़ में कहा, "साहब, कागज़ पक्के हैं और इरादे उससे भी ज्यादा। आप हुक्म करो।"
बस फिर क्या था! भटनागर जी ने वकीलों को कमरे से बाहर कर दिया। उस दिन न कोई कानून की भारी-भरकम किताबें खुलीं, न कोई कानूनी दांव-पेंच लड़ाए गए। भटनागर जी ने भास्कर को मिले *लीगल नोटिस पैड* अपने सामने रखा और मिश्र जी से एक-एक तथ्य पूछना शुरू किए। जैसे-जैसे रमेश मिश्र बिन्दुसार सारी हकीकत बताते गए, भटनागर जी की कलमबद्ध कर यह 'ब्रह्मास्त्र' तैयार करते गए।
भटनागर जी ने अपने हाथों से बिंदुवार वो जवाब लिखा। उसमें कानून से ज्यादा 'तथ्यों की सच्चाई' और 'जनहित की ताकत' थी। उन्होंने नीचे अपने दस्तखत किए और उसे रजिस्टर्ड डाक से दिल्ली-कलकत्ता रवाना कर दिया।
साहब, वो दिन है और आज का दिन उन बड़े वकीलों और खेतान ग्रुप की तरफ से दोबारा कोई कागज दैनिक भास्कर की दहरी तक नहीं पहुँचा। ये थी।
भटनागर जी की दूरदर्शिता और मिश्र जी की रिपोर्टिंग का वो मेल जिसने साबित कर दिया कि अगर रिपोर्टर निडर हो और उसका संपादक उसके साथ खड़ा हो, तो दुनिया की कोई भी ताकत कलम को झुका नहीं सकती। परंतु पत्रकारिता की ये चमक हमेशा एक जैसी नहीं रहती। वक्त का पहिया घूमा और दफ्तर के अंदर मालिको में एक ऐसी दरार आई जिसने सालों की दोस्ती और वफादारी को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया।
(अगली किस्त में पढ़िएगा: जब भास्कर के आंगन में बंटवारे की लकीरें खिंचीं। अग्रवाल भाइयों के बीच जब दो फाड़ हुए, तो रमेश मिश्र चंचल ने आत्मसम्मान के लिए कौन सा बड़ा कदम उठाया? पढ़िए उस भावुक विदाई की कहानी अगली कड़ी में!)
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