जड़ों से जुड़ाव की पुकार: एक बार फिर कुलदेवता के दरबार में!
हर साल की तरह इस साल भी जब मैं इंदौर पहुँचा, तो सबसे पहले मेरे दिल की पुकार राजस्थान के राजसमंद जिले स्थित अपने पैतृक गाँव धनवल की ओर रही। वहां जाकर कुलदेवता श्री धर्मराज जी भैरूजी बावजी के दर्शन किए, उनका आशीर्वाद लिया। ये परंपरा सिर्फ़ एक रिवाज़ नहीं, बल्कि मेरे परिवार की आत्मा है एक ऐसा रिश्ता है, जो पीढ़ियों से हमारे दिलों में बसता आया है।
क़रीब 150-160 साल पहले, लगभग 1857 की क्रांति के आसपास, मुझसे पहले की 6वीं पीढ़ी के पूर्वज स्वर्गीय श्री लालाजी पुरोहित, जो मेरे परदादाजी स्वर्गीय श्री गणेशचन्द्र जी पुरोहित के दादाजी थे इसी गांव धनवल से निकलकर इंदौर आकर बस गए थे। चूंकि वे ब्राह्मण थे, इसलिए इंदौर के तत्कालीन होलकर महाराज ने उन्हें अपने दरबार "राजबाड़ा" में नौकरी दे दी थी। उनके उस एक क़दम ने हमारे परिवार को एक नई दिशा दी, और तभी से हम सब बाद की पीढ़ियां इंदौर में ही बस गई।
आज भी, मेरे घर में पुरोहित परिवार धनवल वालों की वंशावली जिसमें हमारी 16 पीढ़ियों का इतिहास, उनके नामों सहित संजोकर रखा है। हर व्यक्ति के परिवार में उसकी वंशावली ही एक जीवंत दस्तावेज़ है जो हमें हमारी जड़ों की याद दिलाता है।
एक परंपरा जो आज भी जीवित है!
मेरे परिवार में एक सख़्त नियम है, जो मेरे दादाजी-दादीजी ने 1975 में उनकी शादी के बाद से तय किया था कि चाहे कुछ भी हो, साल में कम से कम एक बार कुलदेवता के दर्शन करने अवश्य जाना है। आप चाहे कितने भी व्यस्त हो, ज़रूरी काम हो, कितना भी खराब मौसम हो ठंड, गर्मी, बरसात, आँधी-तूफ़ान आ जाए...सालभर में एक बार अपने कुलदेवता के दर्शन करने जाना ही है! मैं गर्व से कह सकता हूँ कि आज तक यह परंपरा कायम है और आगे भी सदैव रहेगी।
इस बार मेरे साथ मेरे अंकल देवेश पुरोहित भी थे। हमने नाथद्वारा के श्रीनाथजी मंदिर के दर्शन किए, और फिर मेरी बुआजी के बेटे वरुण जोशी (विन्नी) के साथ उनके कुलदेवता शिशोदा भेरूजी के दर्शन करने उनके गाँव दड़वल भी गए। यह जगह हाल ही में सुर्खियों में थी क्योंकि वहाँ के दो भाइयों ने मिलकर 15 करोड़ रुपये खर्च करके जिस सरकारी स्कूल में वो पढ़े थे उसे किसी पाँच सितारा लग्जरी होटल जैसा भव्य और आधुनिक बना दिया। यह एक प्रेरणादायक कार्य है जो पूरे राजस्थान के लिए मिसाल है। वहीं दूसरी ओर, यह भी एक सच्चाई है कि आज भी राजस्थान के कई गाँवों में ख़ासतौर पर हम पालीवाल ब्राह्मणों के गाँवों में मूलभूत सुविधाओं की भारी कमी है। कई जगह न अस्पताल हैं, न कॉलेज और न ही उच्च शिक्षा के लिए पर्याप्त संसाधन। इन इलाकों में शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत संरचना की ज़रूरत अब भी बहुत बड़ी है।
प्रभु श्री चारभुजानाथ के चरणों में!
इस यात्रा के दौरान हमें जिला गढ़बोर स्थित श्री चारभुजानाथ मंदिर के भी दर्शन करने का सौभाग्य मिला। हे कुलदेवता, हे प्रभु श्री चारभुजानाथ आप सबकी कृपा हमारे परिवार पर सदैव बनी रहे। हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखें और इस देश, इस समाज के लिए कुछ बेहतर करने की प्रेरणा मिलती रहें।
आप लोगों से भी विनम्र निवेदन है सभी अपने कुलदेवता के यहां अपने गांव में साल में एक बार ज़रूर जाए। क्या फायदा इतने बड़े-बड़े ओहदों का, इतनी पढ़ाई-लिखाई का अगर आप अपने स्वयं के गाँव अपने कुलदेवता के यहां ही नहीं जा सकते! क्या सालभर में इतना भी वक्त नहीं? जहां से आप निकले है उन जड़ों को कभी मत भूलिए। जो वृक्ष अपनी जड़ों पर ध्यान नहीं देता उसके पत्ते कभी हरेभरे नहीं होते उसकी छांव कभी छायादार नहीं होती उसके फल कभी मीठे नहीं होते कई बार तो फल आते ही नहीं! अपनी जड़ों से ज़रूर जुड़े और उस एहसास को ज़रूर जिएं! ये सिर्फ़ एक यात्रा नहीं होगी बल्कि आपकी मानसिक स्थिति और अंतरात्मा की शांति का भी एक माध्यम होता है!
~ नैवेद्य पुरोहित
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नई जेनरेशन नेक्स्ट जिसको जेन जी बोलते हैं,आजकल की पीढ़ी अपनी जड़ो की तरफ लौट रही हैं, या जड़ों से जुड़ाव के महत्व को समझती है, देखकर सुकून मिलता हैं, बेटा जी।
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