न्यूज़ रूम का 'नकली डायरेक्टर' और वो 'तोतल' का किस्सा
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(नैवेद्य पुरोहित)
अखबार के दफ्तर में कई ऐसे किरदार होते हैं जो अपनी हरकतों से इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं। रमेश मिश्र जब इंदौर के न्यूज़ रूम की यादें ताज़ा करते हैं, तो एक नाम पर आकर उनकी हंसी छूट जाती है शांति कुमार अग्रवाल।
ये वो साहब थे जिन्हें न्यूज़ रूम में सब 'तोतल' के नाम से पुकारते थे। शांतिकुमार जी खुद को अखबार का 'नकली डायरेक्टर' समझते थे। असल में वो रमेशचंद्र अग्रवाल जी के दोस्त थे और रेडियो कॉलोनी में रहा करते थे। उनका काम था मालिक के शौक पूरे करना और पसंद-नापसंद का ख्याल रखना।
लेकिन साहब, रसूख का चश्मा ऐसा चढ़ा था कि शांति कुमार जी खुद को मालिक से कम नहीं समझते थे। दफ्तर में जिसे चाहे नियुक्त कर देना, जहां चाहे विज्ञापन का सौदा कर लेना ये उनका 'विशेष अधिकार' बन गया था। न्यूज़ रूम में उनकी तूती बोलती थी क्योंकि सब जानते थे कि इनके तार सीधे 'ऊपर' जुड़े हैं।
मिश्र बताते हैं कि शांति कुमार जी अपनी इस 'नकली डायरेक्टरी' के नशे में अक्सर मर्यादा भूल जाते थे। लेकिन रमेश मिश्र 'चंचल' जैसा बेबाक आदमी इसे कब तक सहता? एक बार रतलाम में जब शांति कुमार ने अपनी हद पार करने की कोशिश की, तो मिश्र जी ने उन्हें ऐसा 'ठोका' (आड़े हाथों लिया) कि उन्हें अपनी असली हैसियत याद आ गई। मिश्र जी का मानना था कि अखबार वफादारी और काम से चलता है, किसी की चाटुकारिता से नहीं। संपादकीय के सभी लोग इस बात कर चटकारे लेके मजे लिया करते थे।
न्यूज़ रूम के ये छोटे-मोटे झगड़े और 'नकली डायरेक्टरों' की मनमानी के बीच ही दैनिक भास्कर अपनी पहचान बना रहा था। लेकिन इसी बीच रतलाम की धरती पर एक ऐसा औद्योगिक युद्ध छिड़ा, जिसने देश के सबसे बड़े घरानों और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) तक को हिलाकर रख दिया।
(अगली किस्त में पढ़िएगा: ये कहानी थी बिड़ला परिवार के दामाद शैलेश खेतान के करोड़ों के प्रोजेक्ट और रमेश मिश्र जी की उस 'एक' खबर की जिसने नईदुनिया के हाथ से बाजी छीन ली थी।)
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