'साभार दर्शन', सांध्य रतलाम दर्शन और त्रैमासिक पर्यावरण विमर्श दिल्ली का सफर: अपना आसमान, अपनी उड़ान

(नैवेद्य पुरोहित)
भास्कर, आलोकन से विदा लेकर जब रमेश मिश्रा 'चंचल' बाहर निकले, तो उनके हाथ खाली थे, पर हौसला पहाड़ जैसा। जिसके पास खबरों की परख हो और लोगों से जुड़ने का हुनर, वो भला कब तक खामोश बैठता? साल 1991 में उन्होंने अपनी कर्मभूमि रतलाम को चुना और नींव रखी अपने खुद के अखबार 'साभार दर्शन'और सांध्य रतलाम दर्शन की।
एक दौर वो था जब वो दूसरों के अखबार के बंडल गिना करते थे, और अब एक दौर ये आया जब ऑफसेट मशीन से निकलने वाली हर कॉपी पर उनका अपना नाम था। इस अवसर पर उन्हें रक्षा मंत्री NDA के संयोजक जार्ज फर्नांडिस जी ने 18 अक्टूबर 1998 को साभार काम्प्लेक्स का भूमि पूजन किया था और शाम को सांध्य रतलाम दर्शन का विमोचन किया था,जिस कार्यक्रम का संचालन RSS,VHP के शिक्षाविद श्री भंवरलाल भाटी जी ने किया था, मुख्य अतिथि तो रक्षा मंत्री स्वयं जॉर्ज फर्नांडिस जी थे, अध्यक्षता उद्योगपति श्री चेतन्य काश्यप जी, विधायक शिवकुमार झालानी कांग्रेस , पूर्व विधायक कोमल सिंह राठौड़ उपाध्यक्ष मध्य प्रदेश समता पार्टी ने की थी, ऑफसेट मशीन की बटन दबा कर जॉर्ज फर्नांडिस साहब ने मनोबल बढ़ाने का काम किया था ।'साभार दर्शन' सिर्फ एक अखबार नहीं, बल्कि मिश्र जी की उस खुद्दारी का जवाब था जो उन्होंने इस्तीफा देते वक्त दिखाई थी।
करीब 26-27 सालों तक उन्होंने इसे पूरी शिद्दत से चलाया। दोपहर में 'रतलाम दर्शन' और सुबह 'साभार दर्शन' से रतलाम की गलियों में रमेश मिश्र की कलम का सिक्का जमने लगा। लेकिन साहब, मिश्र जी का मन तो हमेशा से 'चंचल' रहा है और कुछ बड़ा कुछ अलग करने को लालायित रहते थे। साल 1999 में उन्होंने रतलाम की सीमाओं को लांघा और रुख किया देश की राजधानी दिल्ली का। दिल्ली, जहाँ सत्ता के गलियारे बड़े-बड़ों को छोटा महसूस करा देते हैं, वहाँ रमेश मिश्र ने 'पर्यावरण विमर्श' जैसी गंभीर और जरूरी मैगजीन की शुरुआत की। दिल्ली में रहकर उन्होंने सिर्फ पत्रकारिता नहीं की, बल्कि राजनीति और विज्ञापन की उन बारीक कड़ियों को समझा जिनसे मीडिया का पूरा ताना-बाना बुना जाता है। दिल्ली में बैठकर वो विज्ञापन की प्लानिंग करते, बड़े-बड़े राजनेताओं के इंटरव्यू प्लान करते और वहीं से रतलाम के अपने अखबार की डोर भी थामे रखते। वह दौर उनके जीवन का वो पड़ाव था जहाँ उन्होंने साबित किया कि एक छोटे शहर का पत्रकार अगर ठान ले, तो दिल्ली के दरबार में भी अपनी जगह बना सकता है।
2016 तक आते-आते उन्होंने अपने इस लंबे और थका देने वाले, मगर बेहद संतोषजनक सफर को विराम देने का फैसला किया। 'साभार दर्शन' और 'पर्यावरण विमर्श' की मशाल को उन्होंने तब शांत किया जब उन्हें लगा कि उन्होंने अपना हिस्सा जी लिया है। लेकिन क्या एक पत्रकार कभी वाकई रिटायर होता है? कलम भले ही रुक जाए, पर यादें और किस्से तो हमेशा बहते रहते हैं। आज वो कहाँ हैं और अपनी उन पुरानी फाइलों के बीच क्या ढूंढ रहे हैं...? (इस किरदार की अगली और अंतिम किस्त में पढ़िएगा: आज कहाँ हैं पत्रकारिता का ये 'चंचल' सिपाही? इंदौर के वो शामें और वो पुरानी फाइलें जिनमें दबे पड़े हैं ,दैनिक भास्कर के स्वर्णिम इतिहास के सबूत। पढ़िए रमेश मिश्र 'चंचल' के किरदार का भावुक समापन, अगली किस्त में!) #दैनिक_भास्कर_इंदौर_लॉन्चिंग_टीम_के_गुमनाम_नायक #सीरीज_38 #डीबी_कॉर्प #गुमनाम_नायक #रमेश_मिश्र_चंचल

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