प्रणाम उदंत मार्तंड- तीनों दिन की दैनंदिनी: स्मृतियां, सीख और संस्कार

08.05.2026
सुबह की शुरुआत उत्साह और उमंग से भरी थी। पाँच-साढ़े पाँच बजे नींद खुली, तैयारी शुरू की और ठीक साढ़े नौ बजे की बस पकड़ी। परिसर से निकलकर जब हम भारत भवन की ओर बढ़ रहे थे, तभी रास्ते में एक दुखद खबर मुझे मिली इंदौर क्षेत्र क्रमांक 3 से 15 साल लगातार विधायक रहे कांग्रेस के दबंग नेता अश्विन जोशी का निधन हो गया था। हमारे उनसे पारिवारिक संबंध थे, बुलावे पर वे कई कार्यक्रमों में आते थे। यह समाचार सुनकर अच्छा नहीं लगा। रास्ते भर यह खबर आगे फॉरवर्ड करता रहा। भारत भवन पहुँचने पर पता चला कि मुख्य अतिथि सीएम मोहन यादव किसी कारणवश नहीं आ सके। किंतु जो अतिथि उपस्थित थे, उन्हें सुनकर मन प्रसन्न हो गया एकदम उत्साह लौट आया। कार्यक्रम का संचालन विनय उपाध्याय जी ने अपनी मनमोहक शैली में किया। अयोध्या के आचार्य मिथिलेशनंदिनीशरण महाराज, भारत सरकार के पूर्व सूचना आयुक्त उदय माहुरकर, पाँडिचेरी से पधारे डॉ. सी जयशंकर बाबू का औपचारिक स्वागत हुआ।
कुलगुरु का उद्बोधन - कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी सर ने सभी को कार्यक्रम की पृष्ठभूमि बताते हुए कहा कि यह विचार पाँच महीने पहले आया था। और यह आयोजन कोलकाता में करने का मन था, लेकिन विधानसभा चुनाव की वजह से संभव नहीं हो सका। यह विचार विश्वविद्यालय महापरिषद के अध्यक्ष होने के नाते मुख्यमंत्री तक पहुँचा और फिर वीर भारत न्यास की ओर कदम बढ़े। उन्होंने कहा, "आप केवल विचार कीजिए, वह अपना आकार स्वयं ले लेता है।" पंडित युगल किशोर शुक्ल जी को याद करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय समाज की सामूहिक स्मृति में वे बसे हुए हैं। हमारे यहाँ यज्ञ-अनुष्ठान आचार्य की उपस्थिति में होते हैं तो फिर यह विचार मिथिलेशनंदिनी जी के पास गया, जो रामानंदाचार्य के संन्यास लेने से पहले हिंदी की अध्येता थे। उन्होंने बताया कि इन तीनों दिनों की हर चीज विजुअल, आवाज़, शब्द सबकुछ साक्षात रिकॉर्ड हो है। फिर उन्होंने एक बात कही जो मन में गहरी उतर गई उन्होंने अपना किस्सा साझा किया। जब वे ट्रेन में बैठकर जा रहे थे और फिर वापस लौट आते है। हर तरफ अनिश्चितताओं से भरी है मीडिया की दुनिया। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) जैसी मायावी तकनीक को उन्होंने "स्वर्ण मृग" की संज्ञा दी, "अगर आप उसके छल में पड़ेंगे तो 14 साल का संघर्ष ले जाता है, ये कलयुग है यहां 14 वर्ष आपके कोर्ट-कचहरी में रहेंगे अगर सावधानी से उपयोग नहीं किया तो।" उन्होंने पंडित युगल किशोर शुक्ल जी को नमन किया, जिन्होंने दुनिया के पहले हिंदी समाचार पत्र उदंत मार्तंड के फ्रंट पेज पर लिखा था, "हिंदुस्तानियों के हित के हेत।" यह एक नैरेटिव था, एक दिशा थी कि हमें क्यों छापना है। विनय उपाध्याय जी ने फिर मंच सँभाला और कहा, "हर आदमी में छिपे होते है 20 आदमी जब भी देखना, अच्छे से देखना।" उन्होंने संस्कृत श्लोक उद्धृत किया, "नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः" पुरुषार्थ से ही सब सम्भव होते हैं। इसके बाद "माखन के लाल" पुस्तक का विमोचन हुआ, जिसका संपादन विनयश्री नेमा सर ने किया था। इसमें हम विद्यार्थियों ने पूर्व छात्रों के द्वारा लिखी उनकी कॉपी को एडिट किया। इसमें मीडियागुरू संजय सलिल जी और गुल्लक वेबसीरीज के लेखक दुर्गेश सिंह भैया से मेरी फोन कॉल पर बात हुई। दोनों का लगभग एक- डेढ़ घंटे तक विस्तार से साक्षात्कार लिया। इनके अलावा ब्रॉडकास्टिंग की दुनिया की सशक्त आवाज़ पदम प्रसाद भंडारी जी के घर गांव मेंडोरी जाने का मुझे सुअवसर मिला। साथ ही इंडियन एक्सप्रेस के श्यामलाल यादव जी द्वारा भेजी गई ऑडियो को सुनकर मैंने उनके जीवन संघर्ष पर भी लेख लिखा। 1991 से 2023 तक के बैच के विद्यार्थियों पर केंद्रित यह पुस्तक पठनीय है क्योंकि सभी के अपने संघर्ष और शून्य से शिखर तक की यात्रा सरल शब्दों में पढ़ी जा सकती है। इस अवसर पर "प्रणाम उदंत मार्तंड" नाम से विश्वविद्यालय के उन छात्रों पर केंद्रित एक अखबार निकला जिन्होंने इस वर्ष कोई खास उपलब्धि हासिल की। और "अभ्युदय" कार्यक्रम पर पुस्तक का भी विमोचन हुआ। जनसंचार विभाग द्वारा उनके प्रायोगिक समाचार पत्र "पहल" जो इस बार ईरान इजरायल युद्ध पर केंद्रित था उसका भी लोकार्पण हुआ। इसके बाद उन सभी कार्टूनिस्टों का स्वागत-अभिनंदन हुआ, जो 5 दिसंबर 2025 के कार्टून शो में आए थे। इस बार खासतौर पर शेख सुभानी जी पधारे थे, जो पिछली बार ऑनलाइन ही उपस्थित हो सके थे। उन्होंने विशेष रूप से विश्वविद्यालय का कैरिकेचर बनाया।
भारत सरकार के पूर्व सूचना आयुक्त उदय माहुरकर जी ने मंच पर आते ही युगल किशोर शुक्ल जी और माखनलाल चतुर्वेदी जी को वंदन किया। उन्होंने कहा, "उदंत मार्तंड की स्थापना कोई छोटी-मोटी चीज नहीं थी। उसने 'इंडिया गज़ट' को चुनौती दी जो प्रो-ईस्ट इंडिया कंपनी था। वॉरेन हेस्टिंग्स के खिलाफ लिखने वाला हिकी का गजट था। हिंदी में उदंत मार्तंड छपा, उसके बाद अन्य भारतीय भाषाओं में भी अखबार निकले और फिर अंग्रेज़ों ने 'वर्नाकुलर प्रेस एक्ट' को लागू कर दिया। उन्होंने पत्रकारिता की यात्रा का ऐतिहासिक विवरण दिया जिसमें मिशनरी पत्रकारिता से लेकर बाद में विज्ञापन आधारित चलन तक सबकुछ विस्तार से बताया। आने वाले 25 वर्षों की पत्रकारिता पर उन्होंने चिंता जताई, "अभी कॉर्पोरेट पत्रकारिता चल रही है, बड़े उद्योगपति मीडिया हाउस को खरीद रहे हैं।" उन्होंने कहा, "हर एक पत्रकार को 'नेशन फर्स्ट' पहले रखना चाहिए। उदय माहुरकर जी की किताब 'माय आईडिया ऑफ़ नेशन फर्स्ट' जल्द ही आने वाली है उन्होंने कहा कि मैं वीर सावरकर को मानता हूं पर एज़ ए जर्नलिस्ट लिस्ट मेरा यह प्रयत्न यह था कि सत्य के साथ रहूं। उनका एक एनजीओ भी है जो बलात्कार के खिलाफ सामाजिक कार्य में संलग्न रहता है। जिसके सर्वे में यह साबित हो चुका है और जो नतीजा निकले हैं उसे सुनकर आपके कान फट जाएंगे जहां बाप ने बेटी से...जहां भाई ने बहन से...यहां तक की बेटे ने अपनी मां से रेप किया....वो भी पोर्नोग्राफी के बाद और इसका सबसे बड़ा कारण है - बॉलीवुड। "बॉलीवुड इसका मेन पर्याय है सनी लियोनी नाम की एक महिला जो पहले पोर्न एक्ट्रेस थी। उसको मेनस्ट्रीम एक्ट्रेस बना दिया गया। एकता कपूर जो बॉलीवुड में कई तरह से अश्लीलता परोसती है ऐसे तमाम लोगों की जगह नहीं है सभ्य समाज में और इन सब बातों पर मीडिया कुछ नहीं करता है...!? हर पत्रकार को नेशन फर्स्ट पहले रखना चाहिए। गांधी जी की दोनों साइड आपको दिखानी पड़ेगी उनका ग्राम स्वराज का सपना जहां उन्होंने बड़े-बड़े काम किए वह भी और हिंदू मुस्लिम एकता वो भी हिंदुओं के ही सैक्रिफाइस पर वह भी! मानव इतिहास में कोई व्यक्ति ऐसा नहीं है कि जिसने कहा हो कोई आपको मारे तो आप मार खाते जाओ। यहां तक की स्वयं गौतम बुद्ध और महावीर ने भी नहीं बोला। महापुरुष कभी गलती नहीं करते ऐसा नहीं होता है मैं सावरकर को फॉलो करता हूं सावरकर ने गलती नहीं कि ऐसा नहीं है उन्होंने गाय को एक प्राणी कहा यह उनकी गलती थी तो कोई अच्छा करें वह भी लिखो और कोई गलती भी करे तो वो भी लिखो।"
आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण जी का वक्तव्य - विनय उपाध्याय जी ने मंच सँभाला और आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण जी को आमंत्रित किया। आते ही उन्होंने "सर्वे भवंतु सुखिनः" श्लोक से शुरुआत की। उन्होंने कहा, "2 शताब्दी पहले एक मनीषी ने चिंता व्यक्त की फिर उसका परिणाम था उदंत मार्तंड। हमारा भाषिक अलगाव एक पर्याय है। जीवन वस्तुतः चक्रगति से चलता है। 200 साल बाद हमें सोचना चाहिए कि क्या पत्रकारिता वाकई राष्ट्रीय हित में हो रही है? आज सब कुछ पेशा हो गया है हंसने और रोने को भी नाटेपन को भी कैसे बदला जा सकता है उसका भी पेशा है।" पत्रकार की परिभाषा को समझाते हुए आचार्य ने कहा, "पत्रकार मुर्दाघर का डॉक्टर नहीं है, भविष्यवक्ता नहीं है। वह वास्तव में एक निष्प्रिय तत्त्वज्ञ वैद्य है जो समाज की नाड़ी का परीक्षण करता है।" उन्होंने अंत में कहा, "समाज देशकाल हमें पालता है जन्म देता है व्यवस्थाएँ आती-जाती हैं, सत बना रहता है। सत्ताएँ नहीं रहतीं। श्रीमान युगल किशोर शुक्ल जी स्मरणीय रहेंगे..." सत्र का आभार वीर भारत न्यास के सचिव श्रीराम तिवारी जी ने व्यक्त किया। श्रीराम तिवारी जी ने कहा "मैंने पहली बार आचार्य जी को सुना और मेरे अंदर से कुछ खिला है। हम आगे भी कोलकाता जाएँगे, बनारस जाने का प्रयास करेंगे।" सत्र समाप्ति के तुरंत बाद मैं जल्द ही बाहर गया और रिपोर्ट बनाकर लोकेंद्र सिंह सर को दे दी। इस तीन दिवसीय उत्सव की सोशल मीडिया टीम में मेरी भागीदारी रही तीनों दिन के प्रथम सत्र की रिपोर्ट यूनिवर्सिटी के फेसबुक पेज के लिए मैंने लिखी। इससे मेरा भी आधे घंटे के अंदर लाइव रिपोर्टिंग का अभ्यास बढ़ा।
द्वितीय सत्र: डिजिटल समय में टीवी पत्रकारिता - दोपहर के भोजन के दौरान वरिष्ठ पत्रकार जयराम शुक्ल जी से मुलाकात हुई। मैंने उनसे कहा कि वे सतना के पहले बड़े स्तर के कार्यक्रम "कजरौटा भारतीय कला महोत्सव" में नहीं आए थे। उन्होंने अपना व्यस्त होना स्वीकार किया। पहली बार उनसे हुई बातचीत में बहुत आत्मीयता रही। उन्होंने फोटो के लिए मेरा आग्रह स्वीकार किया। लंच के बाद के सत्र में सलमान रावी, अनुराग द्वारी, ब्रजेश राजपूत, दीप्ति चौरसिया, प्रवीण दुबे, शरद द्विवेदी और सुधीर दीक्षित थे।संचालन पत्रकार संयुक्ता बनर्जी ने किया। अनुराग द्वारी जी ने कहा, "लोकतंत्र का अर्थ है सत्ता को असहज बनाना। अगर वो सहज है तो कुछ गड़बड़ है। डिजिटल ने हमें जितना बेचैन किया, उतना लोकतांत्रिक भी बनाया। मेरे संपादक ने मुझे इजाज़त दे रखी थी एक किस्सा साझा करते हुए उन्होंने कहा 11 मिनट मुझे लाइव बोलने दिया था प्याज पर।" संयुक्ता बनर्जी ने "घंटाकांड" से संबंधित सवाल पूछा जिसका अनुराग जी ने बढ़िया जवाब दिया। दीप्ति चौरसिया जी ने कहा, "डिजिटल को पकड़ पाना बहुत कठिन है। सच यह है कि डिजिटल युग ने हमको 'ह्यूमन बीइंग' से 'यूज़र' बना दिया है। नेपाल में पूरी सरकार डिजिटल युग के आंदोलन से बनी इतना बड़ा असर है।" प्रवीण दुबे जी ने कहा, "टेस्ट मैच, वन डे, आईपीएल, टी-२० सब समान रूप से हैं। बरगी डैम का डूबता हुआ वीडियो किसी पत्रकार ने नहीं बनाया, इन्फ्लुएंसर ने बनाया। हमारे पास संसाधन है लेकिन डिजिटल ने अपने कान पर कनपटी भी रखी है।" सुधीर दीक्षित जी ने कहा, "विश्वसनीयता का संकट सबके पास है। टीवी और डिजिटल कहानियाँ चल रही हैं। लोगों को एंटरटेन करते चल रहे हैं। टेलीविजन उतना ही प्रासंगिक है।"
कुलगुरु ने बीच सत्र में पूछा एक सवाल, "अभी आप लोगों में से कौन व्यक्ति किस माध्यम में काम करना चाहोगे?" - अनुराग द्वारी ने कहा, "विश्वविद्यालय में आना चाहूँगा विद्यार्थी की तरह।" - ब्रजेश राजपूत ने कहा, "पढ़ने-लिखने का शौक है, TV में समय नहीं, तो अखबार जाऊँगा।" - दीप्ति चौरसिया ने कहा, "डिजिटल में।" - प्रवीण दुबे ने कहा, "अखबार में हिंदी सुधारने वाले संपादक के पास जाना चाहूंगा।" - शरद द्विवेदी ने कहा, "प्रेज़ेंट को एंजॉय किया। टीवी लोग देख रहे हैं पर सामने बैठकर रिमोट से नहीं देख रहे लेकिन मोबाइल से जरूर देख रहे है" अनुराग द्वारी ने कहा कि हम दर्शकों से दूर है इस बात की आप स्वीकारोक्ति कीजिए। दुनिया में 95% सब्सक्रिप्शन मॉडल पर मीडिया चलता है और हमारे यहां उल्टा है। टीवी की जो पट्टियां चलती है उसकी बड़ी ताकत है। बीबीसी के सलमान रावी ने अनुराग द्वारी की प्रशंसा की और कहा, "ये इस दौर में भी अपवाद हैं। न्यूज़रूम को जनसरोकार के नाम पर 'वॉर रूम' नाम दे दिया। शालीनता, गरिमा, सम्मान से बात करना चाहिए हम पत्रकार हैं इसीलिए सामाजिक ज़िम्मेदारी है। हम स्टेनोग्राफर नहीं हैं।" दीप्ति चौरसिया ने कहा, "हमारा प्रोफेशन ईमानदार है। 'गोदी मीडिया' कहते हैं तो दिखाते भी हैं।" प्रश्नोत्तरी सत्र में फिल्म-सिनेमा स्ट्डीज की शिवी सिंह ने एक सवाल पूछा। जवाब में अनुराग द्वारी ने कहा, "माँ का प्यार माँ का ही रहेगा, कभी बदलेगा नहीं। कोई एआई उसे नहीं ले सकता। उस दौर में भी हम लाइब्रेरी जाते थे, हमने लड़ाइयाँ लड़ीं आरती मैम से 24 घंटे लाइब्रेरी खुलवाने के लिए।"
सत्र समाप्ति के पश्चात मैं बाहर अनुराग द्वारी जी से मिलने गया वहां कुछ छात्र उनसे सवाल पूछ रहे थे। तब उन्होंने कहा, "मैं किसी इंटेंट के साथ नहीं करता। मुझे लिखना आता है। किसी के हिट्स कितने है, एल्गोरिथम क्या है यह नहीं सोचता।" वहां उनके साथ फोटो खिंचवाकर मैं लंच करने चले गया देखा तो बहुत भीड़ थी पर फिर लाइन में लगा और जो खाना था नर्मदा कैटरर्स का वाकई बहुत लाज़वाब था। मिठाई से लेकर सब चीज तीनों दिन बहुत अच्छी थी। फिर लंच के बाद वापस तृतीय सत्र में बैठने के लिए आ गया।
तृतीय सत्र: "उत्तिष्ठ भारत" - इसका संचालन शेफाली पाण्डेय ने किया। मुख्य वक्ता थे अयोध्या की हनुमंत निवास पीठ के पीठाधीश्वर आचार्य मिथिलेशनंदिनीशरण महाराज, स्वदेश ज्योति के प्रधान संपादक राजेंद्र शर्मा जी, और जागरण समूह के विष्णुशंकर त्रिपाठी। आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण जी ने कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी सर की प्रशंसा करते हुए कहा कि कक्षा के अतिरिक्त रचनात्मक कार्यक्रम, संवाद की भावना के साथ ऐसा आयोजन प्रशंसनीय है। उन्होंने "सेवाज्ञ संस्थानम" के बारे में बताया, जिसकी स्थापना आशीष आशु ने की। "जीवन का पाठ जो है जब तक परिवार नाम की संस्था थी, तब तक सीखने की ज़रूरत नहीं थी। मनुष्य नाम की संस्था के तंत्र शिथिल हुए हैं। हँसते हुए दिखाई देने वाले परिवार के बुज़ुर्ग अकेले पाए जाते हैं, क्योंकि हमने अपने लिए तो कुछ नहीं किया कभी तैयारी नहीं की।" "हमने सिद्धांतों का पत्थर फेंक देने से सफलता आती है इसको सच मान लिया है...जिन व्यवस्थाओं में हमें निर्मित किया उनके प्रति हमारा विश्वास कम हो रहा है और इस हानी से एक गैप आ गया है। जेनरेशन गैप कहां है कहीं कोई गड्ढा थोड़ी ना है...पिता से पुत्र है एक के बाद दूसरी जनरेशन है और कहीं कुछ है भी तो क्या इसे भरा नहीं जाना चाहिए...? एक परिवार अपना सर्वस्व लगा देता है किसी का बेटा किसी शहर में जाकर सिविल सर्विस की तैयारी करके टॉप रैंक पाता है और उसका सेलिब्रेशन हम एक सरनेम के आधार पर सेलिब्रेट करते हैं सोशल मीडिया पर....मार्केट में मनुष्य बनाने का संस्थान कहां है डॉक्टर बनाने की, इंजीनियर बनाने की, साधु बनाने की बहुत संस्थाएँ हैं लेकिन मनुष्य बनाने की संस्था कहाँ है...!? 'उत्तिष्ठ' का अर्थ है अपनी बोध में, अपनी संभावनाओं में जो खड़ा हो।" फिर संबोधन देने के लिए विष्णु प्रकाश त्रिपाठी जी को बुलाया गया उन्होंने कहा, "संत और असंत का भेद यही होता है। असंत असुविधा प्रदान करता है और संत सुविधा देता है। विवेक के आनंद का सफर है, यह वृत्ति से आ रहा है प्रवृत्ति से आ रहा है। अक्षर ब्रह्म होता है जो शब्द की साधना करता है वह महर्षि होता है। शब्द का जो सद्प्रयोग करते हैं वह तपस्वी होते है और एक साधक ही साधकों का निर्माण करता है। आखिर में जाते-जाते उन्होंने कुलगुरू के लिए कहा कि यह विजय मनोहर है। विजय के बाद अक्सर अहंकार आता है लेकिन मनोहरी भी हो सकते हैं यह उनसे सीखा जा सकता है। अंत में अपनी एक लाइन में उन्होंने पूरी बात रख दी कि मैंने आज शिकागो सम्मेलन की अनुभूति कर ली।"
इसके बाद मंच पर आमंत्रित हुए स्वदेश ज्योति के प्रधान संपादक राजेंद्र शर्मा जी। उन्होंने कहा "स्वामी विवेकानंद सोए हुए भारत को जगाना चाहते थे। उस समय लोग हिंदू कहलाने से भी कतराते थे। शिकागो में उन्होंने हिंदू धर्म का डंका बजाया उस वातावरण में जहां लोग कहते थे हमें गधा कह दो लेकिन हिन्दू नहीं। 'गर्व से कहो हम हिंदू हैं' का संदेश डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के रूप में समाज तक पहुँचाया। मनुष्य वही है जो प्राणी मात्र की सेवा के लिए संकल्प ले।" इसके बाद प्रश्नोत्तरी सत्र हुआ। नंबर की दौड़ में बच्चे पीछे भागते हैं और जब कोई बच्चा हार जाए तो यह उनके साथ खड़े रहने वाला उनका कोई नहीं है इस पर थोड़ा प्रकाश डालें। यह सवाल संचालन कर रही शेफाली पांडेय जी ने पूछा इस पर आचार्य ने कहा कि जिन्हें हम शिक्षण संस्थान कहते हैं वह आज 'अर्जन संस्थान' बन चुके हैं उनका चरित्र बदल गया है। शिक्षण संस्थान विद्यार्थियों को बैंक से लोन लेने तक के लिए कहते हैं। शुरुआत में धीरे-धीरे थोड़ा लेते हैं और फिर सर्वस्व लेने लग जाते हैं और ये संस्थान अपने लेने को जस्टिफाई करने के लिए क्लासरूम से बस तक सबकुछ लग्जरी करते है स्मार्ट क्लास बनाते है। भारतीय परंपरा में हमारे यहां गुरुकुल पद्धति है मध्यप्रदेश सरकार ने कुलगुरु शब्द को अंगीकार कर लिया है जैसे कुलगुरु हमें लौटाया वैसे गुरुकुल भी अब लौटाना है। माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद की कमी क्यों हो रही है इस पर उन्होंने कहा, "चित्त की दो अवस्थाएँ हैं प्रसन्न हुआ चित्त 'प्रसन्न' है, विषाद से हुआ 'विषण्ण'। प्रसन्न व्यक्ति फूलता-फलता है, कई लोगों को स्पर्श करता है। विषण्ण अपने अवचेतन में सिकुड़ने लगता है। अपने अवचेतन में संतान के मन में जब कुछ बातें वह शेयर नहीं कर सकते अपने माता-पिता को तो वह बाईपास करने लग जाते हैं। और वाचिक संवाद से ज्यादा अनुभूति महत्वपूर्ण है समीपता से संवाद बनाओ। एक दूसरे के पास होने की गर्माहट का जो संवाद था वह खत्म हो गया है। एक मां जितना अपने शिशु को समझती है उतना बोले हुए बच्चे को नहीं समझती। भगवान श्रीराम एक जगह कहते है जब मैं किसी को ऐसा देना चाहता हूं जिसके जीवन में ऐसा नहीं हो जिसको सर्वस्व देना पड़ता है तो वह 'आलिंगन' है। हमारे संबंधों में गर्माहट का एहसास है वह खत्म होने लगा है। बच्चों के आसपास की दुनिया नष्ट नहीं हुई है उनके अंदर का तंत्र खत्म हुआ है। मेरे जूनियर उद्यांश पांडेय ने प्रेम पर सवाल पूछा कि असल मायने में प्रेम क्या है। इस प्रश्न के उत्तर में आचार्य मिथिलेशनंदिनीशरण जी ने कहा, "माता-पिता जो अपनी संतान से प्रेम करते हैं गर्भ में आते ही उसे बिना देखे प्रेम करते हैं। बाहर आने के बाद अपनी औकात में सबसे बड़ा अस्पताल उसे ले जाते हैं। जो लोग कहते है कि माता-पिता प्रेम प्रसंग में बाधा बन रहे है असल में वे जानते हैं कि वह प्रेम के कवर में लपेटकर भोग मांग रहे है। तुम अभी 25 वर्ष के हो रहे हो शरीर के अंदर कितनी गर्माहट होती है कैसे किसलिए खौलता है शरीर सब समझते है। कई बार मां-बाप समझते हैं खूब समझते हैं पर बच्चे कहते है नहीं समझते आप तो वह प्रेम नहीं वह भोग है। कई बच्चे अपनी सीमा में रहते हैं तो वह प्रेम है। वह नहीं जो दौड़ता है भागता है तृप्त होता है। श्रीकृष्ण लाखों लाख सैनिक लेकर रुक्मणी को उठाकर उनसे विवाह कर लेते है। उनके लिए राधा से विवाह करने क्यों नहीं जाते हैं...? राधा जब एक बार उनसे मिलने जाती है। शादी के पहले जो प्रेमिका थी उसके लिए रुक्मणि से भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि कोई चूक नहीं हो जाए राधा के स्वागत में...! आपके पास विकल्प हो तो प्रेम के मार्ग पर आगे बढ़े। अच्छा लगना और अच्छा होना में एक अंतर है। जिसमें पाने की लालसा हो, वह प्रेम नहीं वह भोग है। युवा होना केवल मूँछें आ जाने का नाम नहीं अपनी आग को संभालना आ गया, यही युवा होना है।" मेरे एक और जूनियर आयुष सिंह ने सवाल पूछा कि आए दिन अखबारों में आता है मां ने बच्चों को या बच्चों ने मां-बाप को मार डाला तो ऐसा क्यों हो रहा है। इस पर आचार्य जी का कहना था आजकल एक चलन बढ़ चुका है कि विवाह करो लेकिन बच्चों को पैदा नहीं करेंगे, गोद ले लेंगे। कोई लड़की गलती से मां बन गई लेकिन उसमें मातृत्व तो है ही नहीं। मनुष्य निर्माण की प्रक्रिया में कहीं ना कहीं चूक हुई है हमारा समाज इस अर्थ में चूक गया है। श्रीराम ने पति दांपत्य किसे कहते हैं यह समझाया। दांपत्य का अर्थ साथ रहने की दृढ़ता लालसा रखना है। एक का विश्वास दूसरे के विरुद्ध नहीं हो सकता जिस दिन आपने अपना अकाउंट प्राइवेट किया उस दिन परिवार से दूर हो जाएंगे। संबंध बड़ा है कालिदास ने कहा है कि "सतां हि संदेहपदेषु वस्तुषु, प्रमाणमन्तःकरणप्रवृत्तयः।"अर्थ जब सज्जन या गुणी व्यक्तियों के जीवन में कोई द्वंद्व (संदेह/कन्फ्यूजन) उत्पन्न होता है, यानी जब उन्हें सही और गलत के बीच निर्णय लेना कठिन हो जाए, तो उनके अंतःकरण की प्रवृत्ति (आत्मा की आवाज) ही सर्वोच्च प्रमाण होती है। जो लोग कहते हैं माय बॉडी माय रूल्स उनका डीएनए किसी से मैच नहीं होता है। जो उत्पादक है वह स्वामित्व है माय बॉडी माय चॉइस का एक बदमाशी सोच है। दुनिया का एक लंपट पुरुष और जो लंपट महिलाएं है उनकी देन है। हमारा शरीर हमारे माता-पिता समाज की संपत्ति है। जिसे पितृऋण से अऋण होना पड़ता है आपका शरीर जो है वह कोई लैबोरेट्री नहीं है कि जिसको चाहिए उसको उपयोग करने दे, यह आपकी संपत्ति है !
हाई-टी और शाम का सिलसिला - कार्यक्रम स्थल से बाहर निकलते ही हमारे भिया पंकज क्षीरसागर मिल गए उनकी आत्मीयता ही अलग स्तर की है। उन्हें वीसी सर, आशीष जोशी सर, स्मृति जोशी मैम, ऋतु मिश्रा मैम से मिलना था। मैं उनकी मदद कर रहा था अपने शहर का व्यक्ति आता है तो एक आवभगत में कमी नहीं रहना चाहिए। अतिथियों और फैकल्टी के लिए आरक्षित हाई-टी एरिया में पंकज भिया की मुलाकात विजय सर से हो गई। वहाँ मेरे जूनियर आशीष प्रताप सिंह मावई, रूबी सरकार मैडम से बात कर रहे थे।
उसी वक्त नईदुनिया-नवदुनिया के स्टेट एडिटर सद्गुरु शरण अवस्थी जी, और जागरण समूह के संपादक विष्णुशंकर त्रिपाठी जी से भी मुलाकात हुई और फोटो खिंचवाया। आशीष को रूबी मैम गाइड कर रही थी कि अलीम बाज़मी जी से सवाल पूछो कि पत्रकारों के नाम पर भोपाल में इतने कम भवन या मार्ग क्यों हैं? वहां मैंने सुझाव दिया की इसमें ऐड करो इंदौर में मामाजी माणिकचन्द्र वाजपेयी के नाम से एक बड़ा मार्ग है, तो भोपाल में ऐसा क्यों नहीं हो सकता? हम दोनों फिर अलीम बाज़मी साहब के पास गए। उन्होंने बहुत अच्छे से जवाब दिया, "इंदौर की मीडिया ने वहाँ के पत्रकारों को, मीडिया मालिकों ने वहाँ की जनता से आम लोगों से बहुत अच्छे से कनेक्ट किया। वहाँ अपनापन पहले है यह चीज़ भोपाल में कमी है।"
अलीम जी से मेरी यह मुलाकात संयोग से हुई थी क्योंकि कुछ दिन पहले ही रमेश मिश्र जी ने अलीम बाज़मी साहब और आरिफ मिर्ज़ा जी का नंबर मेरी "दैनिक भास्कर इंदौर लॉन्चिंग टीम के गुमनाम नायक" सीरीज़ के लिए शेयर किया था। इन्दौर भास्कर को लेकर अलीम साहब ने बहुत कुछ बताया। उन्होंने घर आने का आमंत्रण दिया फिर उनके साथ फोटो खिंचवाया। तत्पश्चात् हाई-टी में आशीष और मैंने दो कचौड़ियाँ दबाईं। फिर डॉ. सी जयशंकर बाबू भी वहां खड़े थे उनसे परिचय हुआ, नंबर का आदान प्रदान हुआ सीखने को भी बहुत मिला।
वहां से भारत भवन के स्टेयर्स के ऊपर जाने पर वीसी सर, विकास नेमा जी, पंकज भिया, पुनीत पांडेय जी खड़े थे। वीसी सर ने "पहल" की टीम को बुलाकर उनके अखबार के साथ फोटो खिंचवाई। और मुझे दोनों पुस्तकें "माखन के लाल" और "कार्टून कथा" पंकज भिया और पुनीत जी को देने के लिए कहा। मैं हेल्पडेस्क से पुस्तकें लाया और वहां खुद के लिए भी दोनों पुस्तकें खरीद ली। वीसी सर ने "प्रणाम उदंत मार्तंड" अखबार भी उन सभी को दिखाया मुखपृष्ठ पर एमसीयू के "सौर मंडल के सितारे" थे और उसमें मेरा भी फोटो था! यह देख मन गर्व और कृतज्ञता से भर गया।
सांस्कृतिक संध्या: वंदे मातरम् की गूँज - रात सात बजे सांस्कृतिक प्रस्तुति की शुरुआत हुई। विनय उपाध्याय जी ने अपने अंदाज़ में संचालन किया। "वंदे मातरम्" की बहुभाषीय प्रस्तुति हुई हिंदी, तमिल और मलयालम में लगभग सभी और जब गूँजी तो पूरा सभागार अनेकता में एकता की अनुभूति से भर गया। अलग-अलग भाषाओं में एक ही मातृभूमि के प्रति यह प्रेम-स्वर दिल को छू गया। आखिर में सभी दर्शक खड़े हो गए, तालियों और जयघोष से सभागार गूँज उठा। यह प्रस्तुति हार्मनी ग्रुप उमेश तारकेश्वर और वीनस तारकेश्वर की टीम द्वारा थी। उमेश जी ने निर्देशन किया, वीनस जी ने बेहतरीन कंपोजिंग की। लाइटिंग की व्यवस्था अनूप जोशीबंटी ने की, साउंड विनोद जी ने संभाला और सारी क्रिएटिविटी राहुल रस्तोगी जी की थी। 2006 में श्रीराम तिवारी जी ने उमेश तारकेश्वर को 32 "वंदे मातरम्" का काम दिया था और आज वह संगीत इस मंच पर साकार हुआ। "माँ तुझे सलाम" की ओजस्वी प्रस्तुति ने माहौल को और ऊर्जावान बनाया। कार्यक्रम के समापन पर "वंदे मातरम्" और "भारत माता की जय" के नारों से सभागार गूँज उठा। वह क्षण हर उपस्थित व्यक्ति के लिए भावनात्मक और अविस्मरणीय था।
वापसी और मन की बात - रात साढ़े नौ बजे हॉस्टल के लिए बस रवाना हुई। रास्ते भर चैतन्य शाह, देवमाल्या बनर्जी, द्वीप दत्ता, भूमि सिंह, प्रशांत सिंह, रोशनी शर्मा और बाकी हम सब दोस्तों ने गाने गाते हुए जमकर मज़े किए। वह बस का सफर बहुत यादगार रहा। हॉस्टल पहुँचकर जब यह दैनंदिनी लिख रहा था तब रात के 11:30 बज रहे थे और बहुत अच्छा महसूस हो रहा था। मन में उत्सुकता थी अगले दो दिनों की। कल राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश जी के साथ कई गणमान्य लोग आने वाले थे। मंच पर अतिथियों का स्वागत करने की लिस्ट में मेरा भी नाम था इसलिए कल सुबह 10 बजे मुझे स्वागत करना था। रात में बिस्तर पर सोते वक्त मैं अपने आप को बहुत सौभाग्यशाली मान रहा था कि मैं माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय में इस वक्त आया, जब इस तरह के नए नवाचार हो रहे है, प्रयोग हो रहे हैं। गर्व से ताल ठोककर कहता हूँ कि मैं एमसीयू का छात्र हूँ, सही मायनों में "माखन के लाल"। बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है। स्वयं से बात करता हूँ तो दिल को बड़ी तसल्ली मिलती है। खुशी हूं कि यहां आया और आईआईएमसी जम्मू नहीं गया। जो चीज़ें यहाँ मिल रही हैं, वो वहाँ उस तरह नहीं मिल पातीं। इन विचारों के साथ मैं सो गया।
दूसरे दिन की डायरी - 09.05.2026 सुबह जागा तो नई ऊर्जा थी रात डायरी लिखकर सोया था उसी संतुष्टि के साथ जो किसी अच्छे दिन को शब्दों में सहेज लेने के बाद मिलती है। उठा, तैयार हुआ और आज का सफ़र थोड़ा अलग था क्योंकि मैं आर्या शर्मा, आस्था मिश्रा के साथ महक की एक्टिवा पर कार्यक्रम स्थल की ओर निकले। कारण यह था कि आज अतिथियों का स्वागत-सम्मान करने की जिम्मेदारी थी। बस थोड़ा लेट पहुंचाती इसीलिए पहले ही हम पहुंच गए। मेरे हिस्से में विष्णुशंकर त्रिपाठी जी का स्वागत लिखा था उन्हें अंगवस्त्र ओढ़ाकर पुस्तक भेंट कर स्वागत किया। स्वागत के बाद कार्तिका गोठवाल ने मुझे पहले ही बता रखा था कि वीर भारत न्यास के पॉडकास्ट के लिए मुझे जाना है। तो स्वागत के तुरंत बाद वहाँ चला गया साथ में रिकॉर्डिंग भी ऑन करके गया ताकि पहले सत्र की रिपोर्टिंग ठीक से चलती रहे कहीं कुछ छूट न जाए। वहां जाकर देखा तो पहले ही दूसरे अतिथियों का पॉडकास्ट चल रहा था इसमें मेरा नंबर पता नहीं कब आएगा। यह सोचकर मैं वापस सत्र अटैंड करने चला गया।
प्रथम सत्र: भारतीय पत्रकारिता का वैचारिक अधिष्ठान - सत्र का संचालन दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान के निदेशक डॉ मुकेश कुमार मिश्रा जी ने किया। प्रथम वक्ता थे ऑर्गनाइज़र के संपादक प्रफुल्ल केतकर जी। उन्होंने शुरू करते हुए कहा, "मैं अकादमिक जगत से शुरू हुआ और एक्सीडेंटली पत्रकार बन गया।" फिर एक बड़ी बात कही, "अंग्रेज़ी पत्रकारिता और भाषाई पत्रकारिता का भेद जान-बूझकर बनाया गया है। मुझे लगता है पत्रकारिता का विचार उसका होता है भाषा केवल उसका माध्यम है। अंग्रेज़ी में भी मैं इंडिया को भारत ही लिखता हूँ।" युवाओं से बात करते हुए उन्होंने कहा, "जेएनयू के दिनों में राष्ट्रीय विचारों की पत्रकारिता करना Am I left or right? नाम से उन्होंने एक लेख लिखा था। वो किस्सा साझा किया। फ्रेंच रिवोल्यूशन से आई लेफ्ट और राइट की अवधारणा भारत में अप्रासंगिक है।" उन्होंने गुटेनबर्ग की प्रेस और मोनालिसा की पेंटिंग का ऐतिहासिक संदर्भ दिया। "ये ऐतिहासिक क्यों हैं? क्योंकि इन्होंने यूरोप की पहली चर्च को चैलेंज किया। बाइबल की प्रिंटिंग प्रोटेस्ट का साधन बन गई। जो चैलेंज करता है वही पत्रकार है।" मीडिया की सबसे बड़ी बीमारी पर उन्होंने कहा, "मीडिया में सबसे बड़ी बीमारी यह है कि आप डिबेट मोदी भक्त और मोदी हेटर्स के बीच में करते हो। बीच में बहुत बड़ी दुनिया है। हर चीज़ के बारे में सेक्युलर या कम्युनल, नेशनल या एंटी नेशनल इस बाइनरी से बाहर निकलिए। मल्टीपल आईडेंटिटीज़ को-एक्सिस्ट कर सकती हैं। मैं मराठी भाषी हूँ, अंग्रेज़ी का पत्रकार हूँ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक रहा हूँ सब एक साथ।" उन्होंने नारद को भारत का स्वधर्म बताया, "नारद को हमने भारत का स्वधर्म माना। भारत का विचार में पत्रकारिता का स्वदेशी था स्वभाषा और स्वराष्ट्र।" नागरिक शब्द पर बोलते हुए उन्होंने कहा 'नगर में रहने वाले' को नागरिक कहा जाता था। भारतीय भाषाओं में शब्द था 'राष्ट्रवान'...हु इज़ ए सिटिज़न...?भारत को हम भारत की दृष्टि से परिभाषित करेंगे। प्रेस काउंसिल बनने के बाद पत्रकारिता के बारे में उन्होंने कहा, "जबसे प्रेस काउंसिल बनी, तबसे व्यावसायिकता आई और समाज के प्रति उत्तरदायित्व कम हुआ। आपातकाल में आघात लगा। 1949 में सेंसरशिप में ऑर्गनाइज़र पर था फ्रीडम ऑफ स्पीच का केस जीता। के आर मलकानी जी थे, 'द मदरलैंड' हमारा सिस्टर प्रकाशन था इमरजेंसी में सबसे पहले ताला हम पर लगा, सबसे पहले जिसकी बिजली काटी गई, अकाउंट सीज हुए। ऑर्गनाइजर को संघ का मुखपत्र को किसने कहा...? न ऑर्गनाइजर ने बोला और न राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कहा। फ्रंटलाइन नाम की मैगज़ीन ने कहा।" "फैक्ट्स आर सेक्रोसेंट कोई पत्रकारिता ऑब्जेक्टिव नहीं होती। स्वधर्म, स्वदेशी, स्वराष्ट्र की लड़ाई को हमने बैकवर्ड मान लिया। वंदे मातरम् ने बंगाल के विभाजन को टाल दिया था एक राष्ट्रजागरण था। सुब्रह्मण्यम भारती, तिलक, ब्राह्मणों के नेताओं के जाने के बाद लाल-बाल-पाल पूरे भारत का नेतृत्व करते थे। मैं मानता हूँ कि हम पत्रकारिता को 'स्व' के साथ फिर से जोड़ें, राष्ट्रीयता के साथ जोड़ें। हम उस दिशा में चल पड़े तो फिर हम नारद जी के कम्युनिकेशन के थ्योरीज़ को ज़रूर पाएँगे।"
विष्णुशंकर त्रिपाठी: स्वयंसेवक और संवादी - फिर विष्णुशंकर त्रिपाठी जी को बुलाया गया। उन्होंने कहा, "अब एकता का समय आ गया भारत का। सृष्टि में मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जिसका संवाद प्रत्यक्ष होता है। चिड़िया भी संवाद करती है लेकिन मनुष्य का संवाद समझ आता है। अभी इस कालखंड में ऐसे लोग हैं जो ना हम वाद है ना विवाद है क्योंकि हम तो संवाद में विश्वास करते हैं। मनुष्य का मनुष्यत्व उसके मुख से निकलता है उसके संवाद से निकलता है।" फिर उन्होंने प्रफुल्ल जी की बात पर कहा कि आपने कहा आप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक रहे है तो विष्णु जी ने जवाब दिया, "स्वयंसेवक तो सदैव रहता है। पत्रकार तो स्वयंसेवक ही होता है और स्वयंसेवक ही संवादी है। जो स्वयं से प्रेरित होकर, आत्मचित होकर काम करे वही स्वयंसेवक है, वही संवादी है। आध्यात्मिक शब्द का संकुचित अर्थ केवल पूजा-पाठ में नहीं है। यदि आप आध्यात्मिक हैं तो आप संवादी हैं। यहाँ मैं संवादी बोलूँ तो आप पत्रकार समझिए। हम सब आध्यात्मिक है जो ब्रह्म की सत्ता में विश्वास करता है वो ब्राह्मण है। यहां जितने भी लोग है सब ब्राह्मण है। जाति शब्द का अनुचित प्रयोग होता है। यह जाति तो वस्तुतः स्किल है, ज्ञाति का अपभ्रंश है।" "पत्रकार निष्पक्ष होता है यह उन लोगों ने सिखाया जो जीवनभर केवल पक्षपात करते रहे। निष्पक्षता और नपुंसकता एक-दूसरे के पर्याय हैं। मेरे पास यहाँ से ऑफर है वहां से ऑफर है, ये ऑफर क्या होता है? मुझे तो देश से ऑफर है। जो संवादी और स्वयंसेवक है उसे तो राष्ट्र के लिए जीना है। देश हमें सबकुछ देता है हम भी देना सीखें। यही स्वबोध है।" "युवा मन को युवा रहने दो अभी से वैराग्य और संन्यास का मत सोचो। युवा मन के दौरान वैचारिक अधिष्ठान बनाओ वह अगले जन्म में भी रहता है, इसकी गारंटी है। संस्कृत में एक नीति है ऋषिः श्वानो युवानश्च, मद्वान् च भटकाव। यह कहा जाता है:ऋषि (ऋषि), श्वान (कुत्ता), युवा (युवा) और मद्वान (मद/नशे में धुत व्यक्ति) - ये चारों भटकाव के शिकार होते हैं। युवा को चंचल मन दिया गया जो भटकेगा नहीं, वो नहीं बढ़ेगा। निदा फ़ाज़ली कहते हैं, "बरसात का बादल तो दीवाना है, क्या जाने किस राह से बचना है, किस छत को भिगोना है।" "आचार्य शंकर युवा होकर ही चले गए 52 शक्तिपीठ, अखंड भारत सब उनका हुआ। वात वृक्ष जितना ऊपर जाता है, उतना ही नीचे आता है। यह वैचारिक वृक्ष है, शाखा-पद्धति में विश्वास करता है। जो संवादी है आप पूर्ण रूप से अपने मूल रूप में रहो। भारत भवन का भारतीयकरण हो रहा है यह अद्भुत अनुष्ठान किया। आचार्य पंडित युगल किशोर शुक्ल को मोक्ष प्राप्त हुआ।" इतना कहकर उन्होंने अपनी वाणी को विराम दिया।
डॉ. सी जयशंकर बाबू का वक्तव्य: स्वभाषा, स्वबोध और समग्र भारत - फिर डॉ. जयशंकर बाबू को आमंत्रित किया गया। वे आए और उन्होंने कहा, "थोड़ी देर के लिए आप पत्रकार बन जाएँगे किसी भी मीडिया का। आप कहाँ जाकर पत्रकार बनना चाहेंगे हिंदी और अंग्रेज़ी। इसके अलावा दूसरी भाषा भी आपको पता होना चाहिए। स्वाधीनता की चेतना से भारतीय पत्रकारिता शुरू हुई। आज की स्थिति वो नहीं है। अखबार नहीं पढूँगा और 'हेलो गूगल' कहूँगा तो कोई बड़ी बात नहीं है। 1652+ भाषाएँ कह रहे है और कितनी ही ऐसी लिपियाँ हैं। ये लिपियाँ ही हमारी सांस्कृतिक प्रतीक हैं।" एक बेहद रोचक बात उन्होंने कही, "कोई भी बच्चा, किसी भी कोने का बच्चा उसे कागज़-कलम या स्लेट-पेन्सिल दे दीजिए वो बच्चा गोल-गोल लिखेगा। मेरे लिए लिपियाँ बिल्कुल वंदनीय नहीं है राष्ट्रीय शब्द सार्थक होगा, वो अपना ही लगेगा। आप पढ़ पाएंगे। स्वभाषा, भारतीय भाषा और पत्रकारिता के वैचारिक अधिष्ठान की बात कर रहे है तो हम किसी एक ही लिपि तक क्यों सीमित होते हैं...? जहाँ तमिल विरोध कहते हैं वहीं पर लाखों की संख्या में हिंदी पढ़ने वाले विद्यार्थी हैं। वहाँ स्पोकेन हिन्दी का कल्चर है। परहित धर्म सरस नहीं भाई! आप पूरे भारत के पत्रकार बनिए अपने अंदर 'स्व' की भावना लाए।" अपनी बात रखकर वे भी चले गए।
प्रोफेसर सोमा बंद्योपाध्याय का संबोधन: मातृभाषा, धात्री भाषा और स्वत्व - संचालन कर रहे डॉ मुकेश मिश्रा जी ने मंच सँभाला और फिर आग्रह किया कि कुलगुरु जी ये विषय लंबे चलते है अभी समय नहीं है तो इन पर मास्टरक्लास आगे भी करवाएँ। फिर प्रोफेसर सोमा बंद्योपाध्याय जी को बुलाया गया। वे आईं और आते ही तीन बातें कहीं, 1. "आज 9 मई है विश्वकवि रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती है।" 2. "दूसरी बात शुभेंदु अधिकारी सीएम बन रहे हैं बंगाल का काला अध्याय समाप्त हुआ।" 3. "तीसरी बात जो कार्यक्रम पश्चिम बंगाल की धरती पर होना था, वो यहाँ इतने भव्य स्तर पर हो रहा है।" उन्होंने कहा, "मैं पत्रकार नहीं हूँ एकेडमिया की हूँ। आचार्य विष्णुकांत शास्त्री जी की छात्रा रही हूँ और दूसरे कृष्ण बिहारी मिश्र जी की।" फिर उन्होंने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की एक प्रसिद्ध कविता गाई। उन्होंने एक बहुत सुंदर बात कही, "मेरी मातृभाषा बंगाली है, लेकिन धात्री भाषा हिंदी है जिसने मेरा पालन-पोषण किया।" अपने जीवन के बारे में बताते हुए कहा, "मेरे पिताजी सीमा संगठन में थे बीएसएफ में। जहाँ-जहाँ वे जाते, मुझे स्थानीय स्कूल में डाल देते। पहले कश्मीर गए, फिर पंजाब, फिर पूर्वोत्तर प्रदेश जहाँ भी जाती, तुरंत उनकी अपनी हो जाती थी। आइडेंटिटी क्राइसिस जान-बूझकर बताया जाता है।" मुझे मंच को देख कर सही लग रहा था मराठी, बंगाली, मद्रासी, हिंदी भाषी चारों मंच पर थे। जो 'स्व' का बोध है हमारे अंदर वो भारत का है। भाषा पर उन्होंने कहा कि अंग्रेज़ी के वर्चस्व से डरना नहीं चाहिए। अपनी भाषा को ताकतवर बनाओ। "मिशनरी स्कूल वालों ने दिमाग में भर दिया कि अंग्रेज़ी से ही आप प्रगति कर सकते हो। और पूर्वोत्तर का हिस्सा भारत का नहीं है ऐसा कहा जाता था जब मैं सातवीं में थी। वहां अब भारतवासी मानते हैं वो लोग, हिंदी भी कहते हैं। कोलकाता विश्वविद्यालय की पहली महिला रजिस्ट्रार बनने का सौभाग्य मिला कृष्णनाथ त्रिपाठी जी ने चुना था। 2 साल पहले जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा। वहाँ मुझे आईपीईपी लागू करने नहीं दिया गया। बांग्लादेश बॉर्डर से एक ट्रक भरकर विशेष समुदाय के लोगों को भरकर लाया गया मेरे विरोध में घेरा लगाया गया।" "मेरा एक ऐसा काम था तर्क शक्ति देना मिशन था, खासकर बड़े मीडिया हाउसेस को। यह मिशन और विजन में आ गया।" उन्होंने कहा, "इस कार्यक्रम का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा संचार और पत्रकारिता विभाग के बच्चों ने तय कर लिया है कि उन्हें क्या करना है।" "ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने बंगाल में 'सोमप्रकाश' पत्रिका निकाली। 1858 में पहली बार स्त्री के अधिकारों की बात की गई। उनके द्वारा स्थापित संस्कृत महाविद्यालय में अंतरिम वाइस चांसलर थी 30,000 मनुस्क्रिप्ट्स को डिजिटाइज करवाया। "एक स्त्री को केवल विवाहित और शिक्षित ही नहीं बल्कि आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना चाहिए। जब वह आर्थिक स्वावलंबन प्राप्त करेगी तब वो निर्णय लेने की अधिकारी होगी।"
डॉ मुकेश मिश्रा जी ने हृदय से आभार व्यक्त किया और इस तरह सत्र समाप्त हुआ। सत्र के बाद लाइव रिपोर्टिंग, पॉडकास्ट और नए परिचय पहले सत्र के बाद तुरंत अपने काम में लग गया। फेसबुक पेज के लिए एक बढ़िया रिपोर्ट बनाई, लोकेंद्र सर को भेज दी। इसी दौरान पॉडकास्ट के लिए गया जहाँ कार्तिका ने बुलाया था। पता चला कि और भी अन्य गेस्ट्स हैं उनका पहले होगा, हम विद्यार्थियों का बाद में। वहाँ से निकलकर दूसरे सत्र के लिए गया, "भूमंडलीकरण के बाद का भारत और मीडिया।" फेसबुक रिपोर्ट बनानी थी इसलिए भारत भवन के ऑडिटोरियम से बाहर जाना पड़ा क्योंकि वहाँ तो जैमर लग हुए थे इसलिए बाहर जाकर रिपोर्ट बनाई और सर को भेज दी। इसी दौरान मुलाकात हुई ईशा वान गोस्वामी से जिनके पिता आशीष वान गोस्वामी जी शासन द्वारा अधिमान्य पत्रकार है और मध्यप्रदेश जनसंदेश में कार्यरत है। ईशा और उनकी दोस्त मिले दोनों से बात हुई। दरअसल उन्हें एमईएससी स्टूडेंट एक्सचेंज प्रोग्राम के बारे में जानना था, तो मैं विस्तार से उन्हें बता रहा था अपने अनुभव।
एक छोटा-सा कार्य शेफाली जी का आग्रह - वहाँ से निकला तो शेफाली पांडे जी ने पूछा, "बेटा आचार्य जी का नंबर है तुम्हारे पास? वो निकल गए क्या?" मैंने कहा, "नंबर तो नहीं है, पूछकर बताता हूँ।" मेरा दोस्त शिवम तिवारी प्रोटोकॉल टीम में था उसने पूरी लिस्ट दे दी जिसमें सभी अतिथियों के साथ कौन स्वागत अधिकारी है, वो लिखा था। शेफाली जी ने कहा, "तुम स्मार्ट हो यार मैंने पहले एक बच्चे से कहा उसने मुझे बोल आप वीसी सर से पूछ लीजिए।" आचार्य जी के साथ लालबहादुर ओझा सर थे। जो नंबर लिखा था वो लगा नहीं ओझा सर के दूसरे नंबर पर लगाया। उस वक्त वो लंच कर रहे थे। मैंने शेफाली जी से कहा, "आप रुकिए, मैं आता हूँ उन्हें ढूंढकर।" वीआईपी लंच एरिया में गया तो ओझा सर ने कहा, "आचार्य जी का तो मैं स्वागत अधिकारी था, फिर मुझे विस्थापित कर दिया। वो तो कुलगुरु जी ही उनका सब देख रहे हैं।" यह बात आकर शेफाली जी को बताई और उनसे पूछा की आप बोलेंगे तो वीसी सर से पूछकर बताऊं क्या? उन्होंने कहा, "हाँ बेटा, प्लीज़ सर से पूछकर आ जाओ।" ऑडिटोरियम में गया, वीसी सर को सारी बात बताई उन्होंने कहा, "आचार्य जी वापस आएंगे, 3 बजे हरिवंश जी के सत्र के लिए।" यह बात आकर शेफाली जी को बता दी उन्होंने धन्यवाद कहा।
अमिताभ अग्निहोत्री जी से मुलाकात और एक यादगार पल - इतने में सत्र के सभी मुख्य वक्ता बाहर आ गए। अमिताभ अग्निहोत्री जी से बात की उन्हें बताया, "मेरा नाम नैवेद्य पुरोहित है। अभी नारद जयंती के दिन इंदौर प्रेस क्लब के कार्यक्रम में डॉ अर्पण जैन 'अविचल' भैया ने आपसे मुलाकात करवाई थी।" इतने में मयंक यदुवंशी ने आदित्य कुमार चौरसिया के डीएसएलआर कैमरा में अमिताभ जी की और मेरी बात करती हुई फोटो खींच ली। फिर वहाँ से बाहर निकला तो आदित्य कुमार चौरसिया से भी भेंट हो गई उनके साथ बातचीत हुई।
मुख्य द्वार पर डॉ. प्रकाश हिंदुस्तानी जी का आगमन - मेन गेट पर दोस्त निकिता धकाड़ खड़ी थी उसे घर जाना था, वह रैपिडो बुक कर रही थी। उससे बातचीत हो ही रही थी कि ऑटो रिक्शा से डॉ. प्रकाश हिंदुस्तानी जी स्वयं पधार गए। मैंने उनका स्वागत किया। वहाँ उनके स्वागत अधिकारी भी तैनात थे उन्हें रिसीव करने के लिए। प्रकाश जी के साथ बातचीत में मैंने कहा, "आप कैसे हैं? सफ़र में कोई तकलीफ तो नहीं रही?" उन्होंने हँसते हुए कहा — "इंदौर-भोपाल वालों के लिए क्या तकलीफ!" फिर हरिवंश जी का सत्र होने वाला था उन्होंने कहा कि वो धर्मयुग में साथ थे। मैंने उनसे कहा, "हाँ, मैंने वो लेख भी पढ़ा है आपका जिसमें राजीव शुक्ला जी वाला प्रसंग है जब आप और राजीव शुक्ला जी का एक ही दिन 'धर्मयुग' में इंटरव्यू था जिसे धर्मवीर भारती जी ने लिया था। संयोग से आपको चुन लिया गया था लेकिन राजीव शुक्ला जी को नहीं। बाद में वे अपने घर लौट गए और 'रविवार' में पत्रकारिता का परचम फहराया फिर सारी बातें, कहानियाँ सभी को पता हैं राज्यसभा में रहे, बीसीसीआई में चले गए।" डॉ प्रकाश हिन्दुस्तानी जी मेरी इस बात से इंप्रेस्ड थे कि मुझे उनके लेख की एक-एक चीज़ लाइन बाय लाइन याद थी। उन्होंने कहा, "आपकी यह मेमोरी बहुत शार्प है यह अच्छी भी बात है और डराने वाली भी।" फिर मैं उनके पीछे-पीछे कार्यालय गया। गेट खोलते ही प्रकाश जी ने कहा वहां मौजूद सभी से कहा, "मे आय कम इन, सर?" अंदर बैठे सभी लोग प्रफुल्ल केतकर जी, शेफाली पांडे जी, कुलगुरु सर यह सभी आपस में बड़ी आत्मीयता से मिले। थोड़ी देर वहाँ रहने के बाद मैं बाहर निकल गया। हरिवंश जी का आगमन एक ऐतिहासिक क्षण मेन गेट की तरफ गया आचार्य जी भी आ गए थे। उनके साथ प्रसिद्ध कवि रामायणधर द्विवेदी भैया भी थे। उनसे भेंट हुई। थोड़ी देर में ही सईद अंसारी जी और प्रत्युष रंजन जी भी आ गए। सभी गेट पर रुके थे। तभी सायरन बजाती हुई गाड़ियाँ आईं उनमें हरिवंश जी भी थे। कुलगुरु सहित तमाम लोग उन्हें रिसीव करने आए थे। फिर सभी कार्टून शो में गए। तब तक मैं बाहर ही घूमता रहा फिर अंदर गया और कार्यक्रम अटैंड किया।
तृतीय सत्र: नए भारत का निर्माण और हम भारत के लोग - इस सत्र के सूत्रधार गिरीश उपाध्याय सर थे। मुख्य वक्ता थे राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश जी, लोकमत समूह के विकास मिश्र, टीवी एंकर सईद अंसारी और अमर उजाला के उदय कुमार सिन्हा। हरिवंश जी ने कहा, "जो समाज अपना अतीत नहीं जानता, वह अपना भविष्य नहीं जानता। एजुकेट, इनफॉर्म और एंटरटेन पत्रकारिता में ये तीन तत्त्व हमें सिखाए जाते थे। पूरे इंग्लैंड के आधुनिकीकरण में भारत की पूँजी इस्तेमाल की गई।" "1990 में गलत आर्थिक नीतियों के कारण दिवालिया होने तक नौबत आ गई। नब्बे में जब सोना गिरवी रखने को कहा तब कॉन्फिस्केटेड स्मगलर से गोल्ड को गिरवी रखा। देश बनाना कठिन होता है, यह रातोंरात नहीं बनता।'" "3 लाख शैल कंपनीज़ थी पत्रकार रितु सरीन और जय मजूमदर की बुक है इस पर। लाल बाज़ार पुलिस थाना उसका पता लोग अपने घर के तौर पर देते थे। बेनामी कानून बनाने का काम 1988 में हुआ एक्ट को नोटिफाई नहीं किया गया। 2016 में 88 के कानून में 72 धाराएँ और जोड़ीं। कनविक्शन रेट 94% हो गया। 2025 में बेनामी संपत्तियाँ जब्त की गईं। 2012-13 में bomb विस्फोट हो रहे थे बगल का मुल्क यह सब कर रहा था तो यह हमारी सामूहिक विफलता थी। 2 मई 2025 को संसार का सबसे बड़ा कंटेनर जगह 4 फुटबॉल मैदान जितना बड़ा उसका प्रधानमंत्री जी ने लोकार्पण किया। 75 वर्ष बाद गहरे पानी वाला पहला ट्रांसपोर्ट बना।" "जो टेक्नोलॉजी नहीं सीखेगा, वो गुलाम बन जाएगा। एल्विन टॉफलर का कोट है,"The illiterate of the 21st century will not be those who cannot read and write, but those who cannot learn, unlearn and relearn।" अंत में उन्होंने क्षमा लेते हुए अपना वक्तव्य समाप्त किया।
इसके बाद विकास मिश्र जी आए उन्होंने कुलगुरु के लिए कहा, "प्रवीण शर्मा जी उन्हें दुर्वासा कहा करते थे क्योंकि ये बड़े तेवरों वाले व्यक्ति थे, एकदम व्यवस्था बदलने वाले थे। अगर हमारा चरित्र नहीं बदलता तो हिंदुस्तान प्रगति नहीं कर सकता। हेलमेट का नियम और ऑटो चालक ट्रैफिक रूल्स को कभी फॉलो नहीं करते। हिंदुस्तान तभी विकसित होगा जब लोगों का चरित्र बदलेगा। हम कहीं भी विदेश जाते हैं तो वहाँ थूकते हैं क्या? नहीं थूकते। हैरी पॉटर जो है, वो हनुमान जी से कैसे ताकतवर है...? हमें भारतीय परिवेश में विकसित करना होगा अपनी सोच को, हमारी आदतों को।" कम समय में विकास मिश्र जी ने अपनी बात रखी इस पर गिरीश उपाध्याय सर ने बीच में हँसाते हुए कहा, "इंदौर के लोग समय का भी सफाई से उपयोग करते हैं।" प्रत्युष रंजन जी ने कहा, "राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश जी की बात को दोहराऊँगा जो मुझे छू गई कि 'जो टेक्नोलॉजी नहीं सीखेगा, वो गुलाम बन जाएगा।' अगले 5 साल, 10 साल में समय कहाँ ले जाएगा यह नहीं पता।" "एआई का मतलब कोई एक टूल नहीं होता उसकी अलग-अलग चीज़ें हैं। हम बता नहीं रहे हैं कि हम उसे यूज़ कर रहे हैं। ट्रांसपेरेंसी एक बहुत ज़रूरी चीज़ है। लोग एआई का यूज़ कर रहे हैं पर बता नहीं रहे। डाटासेट अगर बायस हो तो पूरा सिस्टम बायस्ड होगा। हेलूसिनेशन है जवाब उसके पास नहीं होगा, फिर भी वह देगा। एक डायरेक्शन के तहत पढ़ना, फिर सोचना, फिर बोलना एक सतत प्रक्रिया। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को कंट्रोल करने के लिए ह्यूमन इंटेलिजेंस होना बहुत ज़रूरी है। डिक्टेट होना है या डिक्टेट करना है यह आप तय करो। सिस्टम में घुसिए। बहुत प्रेशर है ऐसे कहते है हम। आप थैंकफुल होइए कि प्रेशर है वरना लोग मारे फिर रहे हैं कि उनके पास प्रेशर नहीं मिल रहा। तभी आप ग्रो करेंगे।"
अंत में सईद अंसारी जी आए मंच पर और आते ही उन्होंने अपनी शैली में कहा, "नमस्कार, आप देख रहे हैं आजतक।" इस पर ठहाके लगे। उन्होंने अपने नोट्स दिखाए इस सत्र के और कहा, "हम यह भूल गए हैं, पत्रकार होना, नोट्स बनाना। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय मुझे हमेशा भावुक कर देता है। आज पत्रकारिता पर बहुत बड़ा संकट है हमारी साख पर संकट है। इसे बचाकर रखना है। पत्रकारों की इज्ज़त हरिवंश जी जैसे लोगों ने बचाकर रखी है। निर्विरोध चुने गए है ऐसे पद पर पहुँचने के लिए लोग पैसे देते हैं। क्या आपको मालूम है बच्चों कितने पैसे देते है?" इस पर एक विद्यार्थी ने 200 करोड़ बोला। तो सईद अंसारी का कहना था कि "बिना आग के धुआं होता है क्या..?" सईद गोल्ड को लेकर कुछ कह रहे थे कि हम हम भारतीय उस छुपे हुए सोने को क्यों नहीं निकालते है। इतने में एक छोटे से मासूम बच्चे ने बीच में तपाक कहा क्योंकि लोग लॉकर में रखते हैं उसे उसे यूज़ नहीं करते है। बड़ी भोली भाली प्यारी सी मासूम आवाज में उसने यह सब कहा जिस पर सभी हंस दिए। उससे जब पूछा गया कि बेटा आपकी मम्मी कहां है तो उसकी मम्मी खुद आगे रहकर कुछ कहने लगी। अब बच्चा नहीं कह रहा था अपनी मम्मी कहां है तो इस पर सईद अंसारी कह डालते है कि "उसे शक है कि आप ही उसकी मम्मी हो।" "राष्ट्रप्रेम, देशप्रेम यही मेरी दृष्टि में पत्रकारिता की परिभाषा है। पत्रकार वही है जो देश से प्रेम करता है और जो देश से प्रेम करता है तो हमारे देश के खिलाफ कभी फिर सुन भी नहीं सकता।" युवा पीढ़ी को समझाते हुए उन्होंने कहा कि, "आज की यह युवा पीढ़ी ने अपने चरित्र को चीनी की तरह चाय कॉफी में डालकर घोलकर पी चुके है। सभी जेन-ज़ी के लिए हैं आप यह कहते है कि दुनिया जमाना सब कुछ कर रहा है तो मैं क्यों नहीं..? विश्वास कीजिए अगर आप भारतीय सभ्यता से दूर होंगे तो जितना तेजी से मजा आएगा भागेंगे दौड़ेंगे आगे आएंगे लेकिन आप ज़रूर उतने ही औंधे मुंह से गिरेंगे! आज की युवा पीढ़ी को कोई नसीहत नहीं दे सकता, देना भी नहीं चाहिए क्योंकि आप हमसे कई गुना आगे है। जब नैतिकता की बात आती है चारित्रिक बल की बात आती है हम समाज में लिव-इन को मान्यता दे दे तो यह कतई मंजूर नहीं है। कोई चाहे कितनी ही कसम खा ले आपने अगर उस पर विश्वास किया है तो वह आपको धोखा देगा ही। हम भारतीय पुरुष है हमारी साख पर संकट है और हमारी इज्जत हरिवंश जी जैसे लोगों ने बचाई है। जब वह बोलते हैं तो फैक्ट्स एंड फिगर्स के साथ बोलते हैं और सशक्त विपक्ष ही भारत निर्माण में भूमिका निभा सकता है।" एक विद्यार्थी ने वहां जैमर की बात कह दी तो सईद अंसारी कुलगुरु को कहते है, "सर तानाशाह है आप तो तिवारी जी और संजय जी।" पढ़ाई लिखाई करिए चैटजीपीटी की बजाए लाइब्रेरी जाइए। जितना हो सके पढ़ सकते है पढ़िए। जब वीसी सर ने कहा कि 45000 किताबों से लाइब्रेरी भरी है तो सईद अंसारी ने कह दिया, "कद्दू भरी रहती है मजा तो तब आएगा जब लाइब्रेरी के बाहर अंदर बैठने के लिए भीड़ लग रही हो।"
इसके बाद गिरीश उपाध्याय सर आए और उन्होंने कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे उदय कुमार सिन्हा जी को आमंत्रित किया। उदय जी ने आते ही कहा कि, "हमको बुड्ढा बना दिया इतने बूढ़े भी नहीं हुए है हम मैं तो उस पुरानी नईदुनिया का एक छोटा सा व्यक्ति हूं जिसको राहुल बारपुते ने सींचा था।" हरिवंश जी को लेकर उन्होंने सबसे कहा, "आप में से धुरंधर मूवी किसने देखी है और कौन ऐसे हैं जिन्हें फिर से दिखाएंगे धुरंधर तो वह देखेंगे। धुरंधर नाम जो है आजकल फिल्मों चलन में है लेकिन हरिवंश जी उस जमाने के धुरंधर पत्रकार रहे हैं।" "गांधी जी ने यंग इंडिया में 1929 में लिखा कि भारत कैसा हो यह राम राज्य जैसा हो। इंडिपेंडेंस का आपका अर्थ क्या है? क्या वह रशिया वाला इंडिपेंडेंस? नहीं मुझे वह वाला इंडिपेंडेंस चाहिए जो राम राज्य की अवधारणा में हो। आप राम राज्य के शासन की पद्धति को समझिए। संविधान वो लाल किताब नहीं है जिसको जेब में लेकर घुमा जाए। जब हम कहते हैं कि हम भारत के लोग तो इसे अपने जीवन में अंगीकार करिए"। "क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो, उसको क्या जो दंतहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो।" अर्थ है कि क्षमा उसी साँप को शोभा देती है जिसके पास ज़हर हो।
इन पंक्तियों के साथ उन्होंने धन्यवाद कहा और चले गए। आभार प्रकट होने के बाद सत्र समाप्त हुआ उसके बाद फिर मैं अतिथियों के साथ फोटोज़ खिंचवाने के लिए जल्दी निकल आया। बीच में मित्र प्रशांत सिंह से सईद अंसारी के दिए गए वक्तव्य पर चर्चा हुई। वहां विकास मिश्र जी से मेरा मित्र अभिनय सवाल पूछ रहा था। उनका कोई शूट चल रहा था मैं भी वहां चला गया। शूट खत्म होने के बाद हम सभी इंदौरी एक हो गए। इंदौरियों के मिजाज़ पर बात हो रही थी इस पर विकास जी ने कहा कि जिस तरह बनारस के लिए कहा जाता है। वह एक एहसास है मिजाज़ है ठीक उसी तरह इंदौर भी एक मिजाज़ है। वहां खड़े हम चार लोग इंदौर से ताल्लुक रखते है। उनके साथ बातचीत, फोटो खिंचवाने के बाद मैं हरिवंश जी के पास चला गया वहां मेरा रूममेट विकास चौधरी खड़ा था।उसको कहा मैंने कि मैं पीछे खड़े रहूंगा तुम फोटो खींच लेना हरिवंश जी के साथ उसने फोटो खींच लिया।
आसपास बहुत ज्यादा भीड़ थी सब घेरे हुए थे वहां से मैं फिर पीछे पॉडकास्ट वाले एरिया में गया जहां वीर भारत न्यास पॉडकास्ट का स्टूडियो है उस वक्त सईद अंसारी का शूट चल रहा था। आगे सब लोग खड़े हुए थे खास तौर से लड़कियां उनकी दीवानी थी उनके साथ एक फोटो के लिए देर तक रुकी रही। सईद अंसारी ने अपने वक्तव्य में कहा था कि पूरा भारतीय पुरुष समाज किसी भरोसे के लायक नहीं है! ऐसी तमाम बातें उन्होंने कही मैं वहां थोड़ी देर खड़ा रहा अपनी दोस्त सलोनी सिंघई और जूनियर चंचल से बातें की। तत्पश्चात् मैं बाहर चले गया इधर कार्तिका गोठवाल के तीन मिस्ड कॉल पड़े हुए थे पॉडकास्ट के लिए वह मुझे कॉल करना चाह रही थी। चूंकि मैं अंदर ऑडिटोरियम में था मुझे हरिवंश जी का सत्र सुनना था इस वजह से फोन आउट ऑफ नेटवर्क बता रहा था। बाहर आते ही वह मिल गई मैंने उससे बात की और कल के लिए पॉडकास्ट शूट करने को कहा।
उस वक्त पीटीआई के प्रत्यूष रंजन जी से भी मुलाकात हुई उनके साथ फोटो खिंचवाया वह भी इंटरव्यू दे रहे थे। थोड़ी ही देर में वहां पीटीआई के ही गौरव ललित भैया भी आ गए। उनसे मुलाकात हुई उन्हें वॉशरूम का रास्ता नहीं पता था मैं वहां तक उन्हें लेकर गया। अभी तक भी सईद अंसारी के लिए काफी लोग इंतजार कर रहे थे। वापस बाहर आकर मेरे मित्र शिवम तिवारी, हर्ष कर्णवाल, दीपांशु पांडे सब खड़े थे।
हम सभी ने गौरव ललित भैया के साथ फोटो खिंचवाया और मैं फिर वहां से हाईटी एरिया में गया उधर प्रकाश हिंदुस्तानी जी से फिर मुलाकात हुई। वहीं पर उनके साथ संजीव गुप्ता सर थे और हमारी बातें हुई, शर्ट की ट्यूनिंग पर। संजीव सर और प्रकाश सर ने लाल कलर का शर्ट पहना था कलर पर संजीव सर बताने लग गए कि पहले उन्होंने तय कर रखे थे कौन से वार को कौन से रंग का कपड़ा पहनेंगे। साथ में मेरा दोस्त हर्ष कर्णवाल और उसकी एक दोस्त थी। हर्ष को मैंने कहा फोटो खींचने के लिए फिर संजीव सर और प्रकाश सर के साथ फोटो भी हो गया।
मैंने भी उसकी फोटो खींची और हमारी बात शर्ट के कलर से लेकर राजनीति तक फिर प्रेस क्लबों की, अलग-अलग संगठनों की राजनीति पर हुई। अब डॉ प्रकाश हिंदुस्तानी जी को चाय पीना थी और चाय खत्म हो चुकी थी। तो अलग से फिर संजीव सर उन्हें चाय पिलाने बाहर लेकर गए। मैं इधर वहां से वापस पानी पीने गया और उदय कुमार सिन्हा जी को ढूंढ रहा था। किस्मत से वह मिल भी गए और मेरे साथ मेरे रूममेट विकास चौधरी जूनियर अनंत वशिष्ठ थे। उनके साथ भी फोटो हो गया अपना परिचय दिया और वहां से फिर मैं निकल लिया अपने दोस्तों के पास। उनसे मिला-जुला सभी के साथ फोटो खिंचवाई थोड़ी बातें की।
दिनभर की भागदौड़ के बाद शांति से बैठकर पहले विकास जायसवाल और बाकी दोस्तों से थोड़ी देर गुफ्तगू की। फिर ऋषिका सिंह ने आवाज दी फोटो के लिए तो मैं वहां उधर फोटो खिंचवाने गया। वहां पर महक कुशवाहा और कीर्ति शर्मा भी थे। हम सभी ने फोटो खिंचवाई फिर वहां से मैं बाहर जा ही रहा था तब गोल घेरा बनाकर कुर्सियों पर सभी जूनियर्स बैठी थी। जो संजय बैरागी भैया एमए डिजिटल जर्नलिज्म के फाइनल ईयर के स्टूडेंट है उनसे बातें कर रही थी। सब बैठे थे मुझसे आग्रह किया मैं भी चला गया संजय भैया ने दैनिक भास्कर औरंगाबाद में सुनील हजारी जी के मार्गदर्शन में 3 महीने काम किया। अभी फिलहाल में स्वदेशी ज्योति में काम करते है। संजय भैया के साथ भी फोटो खिंचवाया उस वक्त मेरे साथ रोहित तिवारी और आराधना मौर्य थे। फिर जब मैं निकला बाहर तब मुझे मेरे दोस्त चंद्रभान हिरवानी मिले। उसको भी फोटो खिंचवाना था तो हमने नमिता मिश्रा के मोबाइल से फोटो खींचे। नमिता और मेरी कुछ देर बातें हुई वहां उसे लिंकडइन का अकाउंट बनवाना था। वह भी हाथों हाथ बना दिया फिर बात करते हुए हम अंदर सांस्कृतिक कार्यक्रम की तरफ बढ़े। क्योंकि आज की सांस्कृतिक संध्या 'अंतरवाणी' कथक प्रस्तुति थी। नई दिल्ली से अनुसुइया मजूमदार और सुदर्शी भट्टाचार्य आए थे। ऑडिटोरियम में जाते वक्त रास्ते में वीसी सर मिल गए। वह इंदौर से आए किसी मेहमान को विदा कर रहे थे। उन्हें वापस होटल जाना था और कल के लिए उन अतिथियों को आमंत्रण भी दे रहे थे। तभी मुझे पता चला कि कल के तृतीय दिवस के समापन पर मुख्यमंत्री आ सकते हैं। वहां से फिर मैं सीधे ऑडिटोरियम में बैठा सांस्कृतिक कार्यक्रम का आनंद लेते हुए कुछ पॉइंट्स नोट करने लग गया था। अनुसूया मजूमदार और सुदर्शी भट्टाचार्य ने अपनी अद्भुत कला का प्रदर्शन किया साथ ही उनके साथ जो तबला वादक मौजूद थे। उन्होंने बेहतरीन प्रदर्शन किया आनंद आ गया। उनके लिए विशेष तौर पर सभी ने बीच कार्यक्रम में तबला वादन से प्रसन्न होकर तालियों की गड़गड़ाहट से हॉल को गुंजा दिया।
इस सांस्कृतिक संध्या के बाद रात 9:15 बजे हम बस में बैठे उसके पहले एचओडी राखी तिवारी मैडम और मेरे क्लासमेट्स के साथ भी फोटो खिंचवा फिर हॉस्टल पहुंचकर मेरे दोस्त चैतन्य शाह के कमरे में हम दोस्त थे वहां एक सेल्फी ली। फिर कमलेश यादव के कमरे में दूसरे चार यार और बैठे थे। महफिल जमी हुई थी मैं भी शरीक हो लिया। इसके बाद कमरे में जाते ही नींद लग गई और सो गया।
प्रणाम उदंत मार्तंड मीडिया महाकुंभ का अंतिम दिन - 10.05.2026 रात से ही मन में एक अजीब सी हलचल थी। रमेश मिश्र जी को मेरी दैनिक भास्कर की "गुमनाम नायक" की अगली किस्त भेज दी थी, तब नींद आई। और सुबह जब आँख खुली तो घड़ी में साढ़े आठ बज रहे थे फटाफट तैयार हुआ, बस पकड़ी, और हम सब भारत भवन की ओर निकल पड़े। मन में यही था कि आज का दिन कुछ खास होगा। और सच में वह दिन खास ही निकला।
पहला सत्र: भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता का राष्ट्रीय स्वर - भारत भवन पहुंचकर सबसे पहले ऑडिटोरियम में दोस्त माही मिश्रा को बोल दिया रिकॉर्डिंग ऑन रखने के लिए क्योंकि इस सत्र की रिपोर्टिंग मेरे ही जिम्मे थी। मेरा पॉडकास्ट अच्छे से सम्पन्न हुआ जिसकी होस्ट कुंतल यादव थी। जब मैं पॉडकास्ट रिकॉर्ड करवा कर वापस ऑडिटोरियम में लौटा, तब प्रोफेसर कृपाशंकर चौबे जी अपनी बात कंप्लीट कर रहे थे। उनकी बात में एक गहराई थी जो मन को छू गई। उन्होंने कहा कि समाज सुधार की वही धारा जो दीनबंधु और मूकनायक जैसे अखबारों में बही, वही भारतीय भाषाई पत्रकारिता की केंद्रीय संवेदना रही है। चाहे कोई भी भाषा हो मूल एक है, विमर्श एक है, मुद्दा एक है। फिर सूत्रधार अनिल पांडे जी ने शैलेश पांडेय जी को मंच पर आमंत्रित किया। आते ही उन्होंने कहा, "चारों तरफ पांडे ही पांडे हैं...यहाँ के अखबारों में भी यही नाम है!" हँसी का एक ताजा झोंका आया सभागार में फिर उन्होंने कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी सर की फेसबुक पोस्ट का उल्लेख किया जिसमें उन्होंने लिखा था कि जिसे आज 'नैरेटिव सेट करना' कहते हैं, वह काम हिंदी के पहले अखबार ने अपनी पहली पंक्ति में ही 200 साल पहले 30 मई 1826 को कर दिया था। तिलक और आगरकर के मतभेद की बात चली पहले समाज सुधार या पहले राजनीतिक आज़ादी? यह बहस आज भी ताज़ी लगती है। डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर की पत्रकारिता पर बात हुई जो समाज को नए सांचे में ढालने की जुझारू चेष्टा थी। शैलेश जी ने जो बात सबसे गहरी कही वह यह थी कि, "व्यवस्था से असहमत होना पत्रकारिता का धर्म है। असहमति में ही भारतीय लोकतंत्र का सौंदर्य है।" और यह भी, "अगर सब ठीक चल रहा है, तो पत्रकार का होना किसलिए है?" वर्तमान मीडिया पर उनकी टिप्पणी तीखी थी, "राष्ट्रीय संवाद की जगह सिर्फ विवाद बचे हैं, असहमति का सौंदर्य खत्म होता जा रहा है। डिजिटल मीडिया ने एक नई उम्मीद जरूर जगाई है, पर मुख्यधारा के मीडिया को अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है।"
इसके बाद हर्षवर्धन त्रिपाठी जी को बुलाया गया उन्होंने आते ही कहा कि, "सबसे बढ़िया बात है कि यहां कोई भी मोबाइल नहीं देख रहा है। ऐसा आयोजनों में मोबाइल बंद ही होना चाहिए। हम पत्रकारों को गर्व होते-होते घमंड हो गया है। भारतीय भाषाओं के राष्ट्रीय स्वर की जब बात आती है तो यह समझने की जरूरत है कि इस देश में भाषाएं कभी मुद्दा ही नहीं है, भाव मुद्दा है! तथाकथित मठाधीश संपादकों ने बेड़ा गर्क कर दिया है। आज हर पत्रकार राज्यसभा की टकटकी लगाए हुए बैठा है। हमारी कोई गंगा जमुनी तहजीब नहीं है भारतीय परंपरा है हमारी। फ्रॉड सेकुलरिज्म कॉकटेल था क्या!? नेता आपको रोज लड़ाएगा और कब एक दूसरे से हाथ मिलाएगा पता भी नहीं चलेगा।" फिर कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही जयंती रंगनाथन जी को बुलाया गया। उन्होंने कहा कि मैं आप लोगों के साथ अपना अनुभव बताऊंगी। हिंदी पत्रकारिता में 1985 में धर्मयुग से शुरुआत की थी। उन्होंने यह हम विद्यार्थियों को देखकर कहा, "आप लोगों को देखकर मुझे रश्क हो रहा है। आई विश कि हमारे वक्त भी होता यह सब। आपको जिंदगी में बहुत काम आएगा यह, हमें दौड़ते हुए लाइब्रेरी में जाना पड़ता था। उनसे गाइडेंस देना पड़ता था। आज लोगों के पास रिसर्च करने में जो मदद मिल रही है। गूगल, चैटजीपीटी, जैमिनी आज मौजूद है तो उसका इस्तेमाल अच्छे से कीजिए। मैं रश्क करती हूं कि मैं आज पत्रकार क्यों नहीं हुई। 40 साल पहले क्यों रही, टेक्नोलॉजी आपकी उंगलियों पर नाचती है। आपको शत प्रतिशत अपने करियर से मोहब्बत करना चाहिए। पीछे मुड़कर मैं देखती हूं तो मुझे एक दिन भी ऐसा नहीं लगता कि मैंने ऐसा क्यों कर दिया। अंत में उन्होंने कहा कि आप सबसे यही गुजारिश है कि चाहे प्रिंट, इलेक्ट्रानिक या सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर या ऑनलाइन आप कहीं भी जाए। आज ही से तय कर ले कितने साल आपको काम करना है। और यदि आप अपने आप को देख पा रहे हैं तो किस तरह से देख पा रहे हैं। सबसे बड़ी चीज है धैर्य, आराम से धैर्य के साथ दिल से कार्य करें हो सकता है कि आने वाले सालों बाद हम आपको सुने और हम बैठे रहे आप बोले।" सत्र समाप्त होने के पश्चात अनिल पांडे जी ने मंच को प्रवीण शर्मा जी के हवाले कर दिया।
बाहर की दुनिया: रपट, मुलाकातें और मोबाइल - सत्र के बाद मित्र माही मिश्रा के मोबाइल से रिकॉर्डिंग ली और फटाफट रिपोर्ट बनाकर लोकेंद्र सर को भेज दी यह सब मैंने भारत भवन के बाहर खड़े-खड़े किया। तभी तरुण भारत के संपादक शैलेश पांडेय जी जा रहे थे उनसे मुलाकात हुई, फोटो खिंचाया, नंबर लिया। मित्र हर्ष कर्णवाल अपनी दोस्तों के साथ फोटो खिंचा रहे थे, हम भी शामिल हो गए। फिर मैंने हर्षवर्धन त्रिपाठी जी को खोजना शुरू किया। रास्ते में प्रोफेसर अभितोष दुबे सर मिल गए वे प्रो कृपाशंकर चौबेजी के साथ थे। सर ने मेरा परिचय दिया। मन में गर्व आया।
दूसरा सत्र: आत्मावलोकन और संकल्प - वापस जब ऑडिटोरियम में गया तो वहां "आत्मावलोकन और संकल्प" विषय पर सत्र चल रहा था। जिसमें न्यूज़ 18 के प्रतीक त्रिवेदी, शरद गुप्ता, राशिद किदवई, अनिल पांडे, अनुज खरे जैसे तमाम दिग्गज लोग अपनी बातें कह रहे थे। शरद गुप्ता जी ने अपनी कंपनी इंडियन मास्टरमाइंड के बारे में बताया और सभी से इंटर्नशिप के लिए भी बोला। प्रतीक त्रिवेदी ने कहा कि, "इस पेशे में खबर छापने की तनख्वाह भर है खबर न छापने के ज्यादा पैसे है।" उन्होंने कहा कि एक ही दिन में छलांग लगाओगे तो नहीं चलेगा। मैंने मौके तलाशें मौके बनाए। एक ही सूत्र है इसका सिर्फ 'ऑब्जरवेशन' अगर आपका अच्छा ऑब्जरवेशन है। तोकोई भी काम कैसा भी करोगे बस कर डालोगे। कंटेंट ही आपका बहुत महत्वपूर्ण है वही आपको आगे बचाएगा, प्रतीक्षा करना पड़ेगी धैर्य रखना पड़ेगा और भाषा आपकी संस्कार के साथ चलती है। फिर प्रवीण शर्मा जी ने राशिद किदवई जी से कहा बोलने के लिए तो राशिद साहब का कहना था कि टेक्नोलॉजी जो है एआई का बहुत महत्व है। परंतु जो चीज मौजूद नहीं है जो हुमन टच है वह हमेशा उससे ज्यादा महत्वपूर्ण रहेगा। वही अनुज खरे जी का कहना था कि 3000 करोड़ से ज्यादा की इंडस्ट्री है और अगर सिर्फ पैसे कमाने आओगे इसमें तो मत आओ। बाद में प्रश्नोत्तर सत्र हुआ जिसमें शिवम राय ने सवाल उठाया कि पॉलीटिकल प्रेशर से कैसे निपटते है। इसका जवाब राशिद किदवई जी ने दिया कि आपका स्वार्थ बढ़ेगा तो समस्या आएगी, पॉलीटिकल प्रेशर का और हमारा तो चोली दामन का साथ है। सत्र खत्म हो चुका था बाहर निकलते ही सत्र समाप्ति के बाद पहले प्रतीक त्रिवेदी के साथ फोटो खिंचवाना चाहा। पर उनको सब जगह से भीड़ घेरे हुए थी और उन्हें लंच करने भी जाना था।
राशिद किदवई जी फ्री दिख रहे थे मैंने राशिद जी के साथ बातें की और अपनी जूनियर सृष्टि सक्सेना को बोला कि फोटो खींच लेना। बाद में वापस अंदर आया तब शरद गुप्ता जी के साथ कुछ बातें की फोटो खिंचवाया परिचय दिया। वहां से हम अनुज खरे जी के पास गए उनके साथ भी फोटो खींच कर फिर बाहर आए तो मेरी दोस्त ऋषिका सिंह को अनुज जी के साथ एक बाइट लेना थी इंटरव्यू के लिए तो वह शूट मैंने किया और वह सवाल पूछ रही थी। वहां से निकलते ही मैं हर्षवर्धन त्रिपाठी जी को ढूंढने लग गया और ढूंढते-ढूंढते पहुंच गया वीर भारत पॉडकास्ट के स्टूडियो। जब मैं वहां पहुंचा तो जैसे ही वह बाहर निकल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया डिपार्टमेंट वाले बच्चों को टीवी बुलेटिन एमसीयू दर्शन के लिए उनसे इंटरव्यू करना था।
मैंने मेरे दोस्त विशाल मणि त्रिपाठी और रामकृष्ण शुक्ला जो वहां मौजूद थे उनसे आग्रह किया मेरा फोटो खींचने के लिए। फोटो खिंचवाकर फिर मैं वहां से बाहर आया तब अनिल पांडे जी एक व्यक्ति को इंटरव्यू दे रहे थे। उनका इंटरव्यू सुनकर मैंने भी वहां पर उनसे बात की और फिर इतने में प्रतीक त्रिवेदी जी आ गए थे। वहां एक ग्रुप फोटो हो गया उसके बाद सीधे खाना खाने गया क्योंकि इस चक्कर में मेरा लंच छूट रहा था। फिर लंच के दौरान शिवकुमार विवेक सर से बात हुई उनके साथ में सागनिक मजूमदार, भूमि सिंह और नमिता मिश्रा भी खड़े थे। हमारी बात हुई इंदौर भोपाल को लेकर सांस्कृतिक राजधानी सहित इंदौर के मिजाज़ पर बात हुई। फिर सर पूछ रहे थे हम सबसे कि तुम कितने लोगों से मिले फिर जब मैंने बताया कि हां सर मैं सबसे मिल लिया। तो सर का कहना था कि, "हां तुम तो जनसंपर्क अधिकारी हो सबसे मिल ही लिए होंगे" खाना खाने के बाद बढ़िया रसगुल्ला दबाएं, केरी का पना पिया।
बाहर आकर स्मृति मैम से आग्रह किया फोटो के लिए फोटो मेरे दोस्त शिवम तिवारी ने बढ़िया खींचा। मुझे रितु मैम के साथ भी फोटो खिंचवाने जाना था अंदर जब न्यूज़रूम में गया तो मैंने देखा की वहां अलग ही माहौल चल रहा था। सब लोग व्यस्त थे मैं वापस बाहर आ गया। बाहर आकर नमिता और भूमि के साथ फोटो खिंचवाया। फिर नमिता को डॉ जवाहर कर्णावट जी का इंटरव्यू चाहिए था। तो उसे जवाहर कर्णावट जी के पास लेकर गया। इंटरव्यू के बाद वहां उनके साथ भी फोटो खिंचवाकर हम बाहर आ गए। अब अगले सत्र की रिपोर्ट भी मुझे बनानी थी भारत स्वाभिमान नाम का विषय था। जिस पर हितेश शंकर बोलने वाले थे और उनके साथ पद्मश्री डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी। अंदर ऑडिटोरियम में जा ही रहा था कि बाहर फिर से प्रतीक त्रिवेदी जी मिल गए उनके साथ वापस से फोटो खिंचवाया और फिर अंदर चले गया।
तीसरा सत्र: स्वाभिमानी भारत - बंसल न्यूज के एडिटर इन चीफ शरद द्विवेदी जी सूत्रधार की भूमिका में थे। कोर हेरिटेज ग्रुप की ओर से शस्त्र एक भव्य प्रदर्शनी लगाई गई थी अतीत की गौरवमयी स्मृतियों का संग्रहण था। एक पुस्तक का विमोचन भी हुआ। चंद्रप्रकाश जी ने शुरुआत मजाकिया लहज़े में कहकर की, "मुझे खबर मिली है कि माखनलाल बंद होने वाला है।" फिर उन्होंने आज के भारत का चित्र खींचा जहां एक व्यक्ति अपनी पत्नी का शव लेकर चल रहा है व्यवस्था कह रही है कि उसने शराब पी रखी थी। वाल्मीकि रामायण, हर्षचरित, विदुर नीति, शतपथ के उद्धरण देते हुए उन्होंने पूछा, "भारत के स्वाभिमान से इसका क्या संबंध है?" और उत्तर भी दिया शासन की जवाबदेही ही स्वाभिमान की नींव है। भगवान श्रीराम के 88 सुशासन के सूत्र आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। "जल में चलने वाले जलचर अपने निशान नहीं छोड़ते। मनुष्य एकमात्र ऐसा प्राणी है जो अपने निशान छोड़ता है।" उन्होंने बहुत देर तक अपनी बात रखी। जब वे कुछ ज्यादा ही बह चले दोपहर के 3:56 बज गए थे और 4 बजे से नया सत्र था अभी तो पहले ही वक्ता ने अपनी बात रखी थी।
फिर शरद द्विवेदी जी आए और गौरव ललित भैया को बुलाया उनका सम्मान किया गया क्योंकि उन्होंने 'माखन के लाल' पुस्तक में समन्वयक की भूमिका निभाई थी। उनके बाद हितेश शंकर जी आएं जिन्होंने कहा, "चार वेदों में सबकुछ होता है लेकिन जब दो द्विवेदी बोल चुके हों, तो अपने आप में पूर्ण है। संपादन में ही संक्षेपण निहित होता है! और उन्होंने एक बात कही, "हम अतीत के दास नहीं हो सकते अतीत की प्रेरणा ही हमारी ऊर्जा हो सकती है। आलोचना को विरोध नहीं मानना चाहिए बहिष्कार, तिरस्कार और परिष्कार की परंपरा है हमारी।" शाम 4:20 पर यह सत्र समाप्त हुआ। अंत में आभार शरद द्विवेदी ने माना।
समापन सत्र: भारतीय पत्रकारिता के स्वर्णिम प्रष्ठ - मैं वहां से तुरंत निकला रिपोर्ट देने के लिए और फिर लोकेंद्र सर को रिपोर्ट भेज दी। शिवकुमार विवेक सर ने मंच संभाला। वरिष्ठ पत्रकार जयराम शुक्ल जी का एक वाक्य मन में घर कर गया, "पत्रकारिता सूरत से नहीं, सीरत से की जाती है।" उन्होंने यह भी कहा कि "अपना अतीत कभी नहीं भूलना चाहिए जो लोग अपना अतीत भूल जाते हैं वह मानसिक रूप से पीड़ित हो जाते हैं।" फिर डॉ. जवाहर कर्णावट जी आएं जिन्होंने मॉरीशियस, फिजी, न्यूजीलैंड की हिंदी पत्रकारिता पर प्रकाश डाला गिरमिटिया देशों में हिंदी ने जो जागरण किया, वह इतिहास का अनसुना अध्याय है। फिजी का शांति दूत अखबार 24 पृष्ठ साप्ताहिक, दिवाली विशेषांक 100 पृष्ठ का यह सुनकर रोमांचित हुआ। उन्होंने विदेशों में हिंदी पत्रकारिता पर विद्यार्थियों से शोध करने का आग्रह किया।
डॉ प्रकाश हिंदुस्तानी जी आए तो पहले सबको झिंझोड़ा और कहा, "इतनी सुस्ती क्यों है भाई?!" उन्होंने कहा कि हिंदी का यह पहला अखबार मात्र डेढ़ साल चला क्योंकि अंग्रेजों ने उसे बढ़ने नहीं दिया, हमें ताकतवर होना चाहिए हिंदी वालों को। फिर गर्व से बोले आज अमेरिकन एयरलाइंस में भी जगजीत सिंह की गजलें सुनाई देती हैं। जगदीश चंद्र बोस का रेडियो, तलपड़े का विमान, हमारे वैद्यों का चेचक का टीका इन सबका क्रेडिट किसी और ने लिया, पर शुरुआत करने वाले हम थे। अंत में उन्होंने कहा कि जिस शहर के पत्रकार जागरूक होते हैं वहां गुंडागर्दी नहीं होती है। हमारा लक्ष्य है अच्छा समाज बनाना, अच्छा देश बनाना। पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर जी ने संक्षेप में पर सारगर्भित बात कही, "हिंदी और भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता ही देश की एकता का सूत्र है।" लोगों को लगता है कि खोजी पत्रकारिता आपातकाल के बाद शुरू हुई तो यह भ्रम है आप प्रताप अखबार के पन्ने पलट जाएगा। हमारे भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता में हिंदी देश की एकात्म का सूत्र रखती है।
समापन और वे पल जो याद रहेंगे - फिर संजय द्विवेदी सर ने मंच संभाला। छात्रों को बुलाया अनुष्का सिंह, शिवी सिंह, महक पवानी, रामकृष्ण शुक्ला, उद्यांश पांडेय सबने अपने अनुभव साझा किए। सर ने टोका भी, "थोड़ा क्रिटिकल भी हो जाइए, स्क्रिप्टेड मत पढ़िए!" डॉ मुकेश मिश्रा जी ने कहा, "यह अमृत मंथन हुआ है इसे बाँटिए, फैलाइए, छिड़किए।" भारत भवन के प्रेमशंकर जी ने पाणिनि का श्लोक सुनाया भाषा संस्कार के साथ चलती है। फिर श्रीराम तिवारी जी को बुलाया गया उन्होंने आते ही कहा कि उदंत मार्तंड का सिलसिला आज खत्म नहीं होने वाला है। मैं कुछ और संकट में डालने वाला हूं विजय मनोहर तिवारी जी को! हिंदी शुरुआत से ही प्रतिरोध की भाषा रही है। उन्होंने कहा कि एक कमी जो मुझे खलती है वह भोपाल के पत्रकारिता के अन्य जो संस्थान है वहां से लोग कम आए थे यह खलता है। अंत में कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी सर जिनकी ऊर्जा और उत्साह ने इस पूरे आयोजन को संभव किया। उन्होंने कहा कि "शायद नियति को यह मंजूर था कि पहले बंगाल की भूमि का शुद्धिकरण हो फिर हम उसे प्रणाम करने जाएंगे। उदंत मार्तंड का सिलसिला यहीं खत्म नहीं होगा भारत की भूमि-भूमि को प्रणाम करते हुए यह यात्रा जारी रहेगी। कोलकाता से लेकर तक हिंदी पत्रकारिता के गढ़ तक यह यात्रा पहुँचेगी। जुलाई-अगस्त में नया सत्र, सारे भाषण, साक्षात्कार एक-एक शब्द यहां दर्ज होगा। माननीय मुख्यमंत्री जी के हाथों कल रात तक ये तय था कि वो आ सकते है। लेकिन किसी कारण से नहीं आ सके।" यह सुनकर थोड़ी उदासी हुई, पर आयोजन की भव्यता पर कोई असर नहीं पड़ा।
विदाई: समोसे, चाय, और यादें - हाइ-टी के वक्त समोसे खाए, दोस्तों से मिला। उस वक्त अंकित आनंद भैया और स्मृति श्रीवास्तव लोकेंद्र सर के साथ फोटो खिंचवा रहे थे। मैं भी वहां गया। फिर नमिता, भूमि, देवमाल्या, अंशिता हम सब एक साथ हो लिए और खूब तस्वीरें खिंचवाई। फिर हम सभी ने वहां टीचर्स के साथ आशीष जोशी सर गजेंद्र सर, लोकेंद्र सर और गिरीश जोशी सर के साथ भी बातें की फोटोज़ क्लिक करवाई। बाद में आशीष सर और लोकेंद्र सर के साथ लिव इन रिलेशनशिप और लव जिहाद जैसे विषय पर गंभीर विमर्श हुआ। वहीं पर मैंने मेल चेक किया तो मुझे पता चला कि कल कार्यक्रम का आमंत्रण आया है विश्व संवाद केंद्र की तरफ से सोमवार सुबह 11:00 बजे कुक्कुट भवन जाना है। बाद देव बनर्जी, मैं और आशीष सर हम बातचीत करते-करते वहां से नीचे उतर गए। बाहर आकर मैंने दोस्त लीज़ा के साथ फोटो खिंचवाया।
मेन गेट की तरफ बाहर गया तब वरिष्ठ पत्रकार जयराम शुक्ल जी मिल गए उनके साथ बातचीत हुई। उन्होंने बहुत अच्छे से समझाया उस वक्त मैं और माही मिश्रा साथ में थे। फिर जब मैं वापस नीचे आया तो मैंने देखा कि सीएम के सिक्योरिटी हेड आईपीएस समीर यादव जी अपने परिवार के साथ घूम रहे थे। मैंने उनको बताया कि हम सीहोर में शिवना साहित्य समागम में मिले थे आपका इंटरव्यू किया था।
वहां से हम वापस लौटे तब मुझे पुरातत्व विभाग के आयुक्त आईएएस अधिकारी मदन नागरगोजे मिल गए। उनके साथ मैंने फोटो क्लिक करवाया फिर रजिस्ट्रार पी शशिकला मैम, एचओडी राखी तिवारी मैम के साथ भी फोटो खिंचवाया। बाद में खासतौर पर रितु मिश्रा मैम के साथ फोटो खिंचवाने गया क्योंकि मैम बहुत बिज़ी थे अख़बार के लिए वही अधिकांश समय न्यूज़रूम में ही थे।
इस कारण उनके साथ फोटो खिंचवाने का मौका नहीं मिल पा रहा था। फिर मैंने अंदर जाकर उनके साथ भी फोटो खिंचवा लिया बाहर आकर दोस्त चैतन्य शाह मिला उसके साथ भी फोटो खिंचवाया। हम लोग अंदर ऑडिटोरियम में जा ही रहे थे कि पेड़ के वहां कुश्ती का छोटा सा अखाड़ा टाइप बना हुआ था। जहां कुछ मलखंब रखे हुए थे। मलखंभ उठाते हुए भी फोटो खींच लिए और अंदर ऑडिटोरियम में बैठ गए जहां सांस्कृतिक संध्या 'कबीर वाणी' चल रही थी। शास्त्रीय संगीत का आनंद लिया, कार्यक्रम समाप्ति के बाद विनय उपाध्याय जी ने आभार व्यक्त किया। तीन दिन का यह अनुष्ठान वाकई बेहतरीन रहा।
आखिर में डॉ मुकेश कुमार मिश्रा जी के साथ भी फोटो खिंचवाया वहां उनका बालक भी था। फिर मेरी क्लास वाले बच्चों ने हम सब ने मिलकर एचओडी मैम के साथ फोटो खींचवाया। बाहर आकर मित्र शिवम तिवारी ने संजय द्विवेदी सर के साथ भी फोटो खींचा। उनसे भी बड़ी आत्मीयता के साथ बातें हुई। फिर मैं वीसी सर को ढूंढने लग गया पर वह शायद निकल चुके थे। बाद में सीधे बस में बैठा और हम सब रास्तेभर गाना गाते हंसते मुस्कुराते कैंपस पहुंच गए।
आज 13 मई हो चुकी है दोपहर के 3:30 बज रहे है यह इतना लंबा अनुभव जो मेरी स्मृतियों में शब्दों में दर्ज हो गया है। इसे खत्म करते हुए मन में एक ही बात है सिर्फ, "प्रणाम उदंत मार्तंड!" इस कार्यक्रम में जो हमारी ऊर्जा रही उत्साह उमंग रहा वह आगे भी सदैव बना रहे। बीते 3 दिन में कई लोगों ने इस आयोजन के लिए तरह-तरह से विपरीत टिप्पणी की। मेरा उनसे निवेदन है कि यदि वे लोग भी बिना आमंत्रण की प्रतीक्षा किए भी अगर कार्यक्रम में शामिल होते तो सभी की तरह उनका अनुभव भी बहुत अच्छा रहता। धन्यवाद। ~ नैवेद्य पुरोहित #प्रणाम_उदंत_मार्तंड #मीडिया_महाकुंभ #माखनलाल_चतुर्वेदी_राष्ट्रीय_पत्रकारिता_एवं_संचार_विश्वविद्यालय #भोपाल #भारत_भवन

Comments

  1. बहुत बढ़िया लिखा, इतना सारा आज की जनरेशन में बहुत कम लिख पाते है, सब समझ आ गया ऐसा लगा जैसे कि मैं भी अटेंड कर रहा हूं प्रणाम उदंत मार्तंड।
    बहुत खूब,
    बहुत आशीर्वाद, आगे बढ़ो, तरक्की करो, खुश रहो,

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