बिना अर्जी की जॉइनिंग और 'कोरे कागज' वाला भरोसा
(नैवेद्य पुरोहित)
पिछले किस्से में आपने पढ़ा कि कैसे एक मुलाकात ने रमेश मिश्र के लिए भोपाल में दैनिक भास्कर के दरवाजे खोल दिए थे। लेकिन असली खेल तो अभी शुरू होना था। साल 1983 आ चुका था और इंदौर की जमीन पर दैनिक भास्कर अपनी जड़ें जमाने की तैयारी कर रहा था।
इंदौर में भास्कर की लॉन्चिंग का मतलब था पसीने और जुनून की एक नई इबारत। उस समय अखबार की कमान यतींद्र भटनागर जैसे दबंग संपादक के हाथों में थी। इंदौर की टीम लगभग तैयार हो चुकी थी, नामों की फेहरिस्त बन चुकी थी। एक दिन यतीन्द्र भटनागर जी संपादकीय मीटिंग ले रहे थे, अचानक उनकी नजर लिस्ट पर पड़ी और उन्होंने पूछा, "बाकी सब तो ठीक है, लेकिन ये रतलाम का कॉलम खाली क्यों है? वहां के लिए कोई नाम तय नहीं हुआ क्या?"
वहां मौजूद मनमोहन अग्रवाल मुस्कुराए और उन्होंने सीधे रमेशचंद्र अग्रवाल को इशारा किया। बस फिर क्या था, रमेश जी का फोन सीधे रतलाम में खनखनाया और बोले, "अरे रमेश भाई साहब! आप आए नहीं इंदौर? सब याद कर रहे हैं।"
रमेश मिश्र ने सहजता से जवाब दिया, "भाईसाहब, आपने बुलाया ही नहीं, तो आता कैसे?" सेठ जी बोले, "बुलाने की क्या बात है, आपको ही तो देखना है सब। कल सुबह की गाड़ी पकड़ो और इंदौर आ जाओ।"
मिश्र जी अगले दिन इंदौर पहुंचे। न कोई अपॉइंटमेंट लेटर, न कोई इंटरव्यू। यतींद्र भटनागर के सामने खड़े हुए, दो-तीन खबरें तुरंत बनाकर दीं और उसी दिन से इंदौर में दैनिक भास्कर की टीम का अटूट हिस्सा बन गए।
भरोसा इस कदर था कि रमेशचंद्र अग्रवाल ने एक बार मिश्र के हाथ में 'अधिमान्यता कार्ड' का बिल्कुल कोरा फॉर्म थमा दिया और नीचे अपने दस्तखत कर दिए। बोले, "ये पकड़ो, तुम्हारा रतलाम कलेक्टर रहे श्री सुदीप बनर्जी जो तब जनसंपर्क संचालक है, उन्हीं को बोल कर ये फॉर्म भरवा लेना और कार्ड बनवा लेना।"
आज के कॉर्पोरेट दौर में कोई मालिक किसी कर्मचारी को अपने साइन किया हुआ कोरा कागज थमा दे, ये सोचना भी नामुमकिन है! लेकिन तब रमेश मिश्र और रमेशचंद्र अग्रवाल के बीच ये 'साइन' नहीं, एक 'ब्राह्मण' और एक 'बनिए' के बीच का वो पक्का रिश्ता था, जिसने भास्कर को नई ऊंचाइयां दीं।
मगर साहब, ये तो सिर्फ दफ्तर की बातें थीं। असली मुकाबला तो तब हुआ जब मार्केट में पैर जमाने के लिए रमेशचंद्र अग्रवाल और रमेश मिश्र के बीच एक ऐसी शर्त लगी, जिसने रेलवे स्टेशन पर हंगामा खड़ा कर दिया।
(अगली किस्त में पढ़िएगा: जब 1985 की एक सर्द रात में मालिक और रिपोर्टर के बीच 10 हजार की शर्त लगी। क्या भास्कर के मालिक रमेशचंद्र अग्रवाल वाकई खुद अखबार के बंडल उठाने के लिए तैयार हो गए थे? अगली किस्त में जानिएगा स्टेशन की वो 'ऐतिहासिक रात'!)
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