वो 10 हजार की शर्त: जब मालिक ने खुद 'दैनिक भास्कर' के बंडल उठाए!
(नैवेद्य पुरोहित)
ये बात साल 1985 के आसपास की है। इंदौर से दैनिक भास्कर निकल तो चुका था, लेकिन उस समय के दिग्गज अखबार 'नई दुनिया' से टक्कर लेना लोहे के चने चबाने जैसा था। खासतौर पर रतलाम जैसे इलाकों में, जहाँ सुबह-सुबह स्टेशन पर अखबारों की जंग छिड़ती थी।
एक शाम दफ्तर में गपशप चल रही थी। रमेशचंद्र अग्रवाल मालिक थोड़े फिक्रमंद थे। उन्होंने रमेश मिश्र से कहा, "भाई साहब, खबरें आ रही हैं कि रतलाम में अपनी कॉपियां कम जा रही हैं और नई दुनिया की ज्यादा।"
रमेश मिश्र 'चंचल' ठहरे बेबाक आदमी। उन्होंने तपाक से कहा, "साहब, ये जानकारी गलत है। रतलाम में भास्कर का डंका बज रहा है। शर्त लगा लीजिए!"
बातों-बातों में बात बढ़ गई और शर्त तय हुई 10 हजार रुपये की। उस जमाने में 10 हजार बहुत बड़ी रकम थी। सेठ जी बोले, "ठीक है, कल सुबह मैं खुद रतलाम स्टेशन पर मिलूंगा और हम खुद अपनी आंखों से बंडल गिनेंगे।"
रात के 12 बजे जैसे ही इंदौर के भास्कर प्रेस कॉम्प्लेक्स से अखबारों से लदी मेटाडोर चली, रमेशचंद्र अग्रवाल और मनमोहन अग्रवाल अपनी गाड़ी से पीछे-पीछे हो लिए। उधर मिश्र जी रातभर से रतलाम स्टेशन पर डटे हुए थे। सुबह के करीब 4:30 या 5:00 बज रहे होंगे, ठंड का मौसम था। जैसे ही मेटाडोर स्टेशन पहुंची, रमेशचंद्र अग्रवाल गाड़ी से उतरे।
मिश्र जी ने कहा, "आ गए अब चलिए, दूध का दूध और पानी का पानी हो जाए।" स्टेशन पर नई दुनिया के बंडल भी पड़े थे और भास्कर के भी। सेठ जी ने आव देखा न ताव, खुद झुककर अखबारों के बंडल गिनना शुरू कर दिए। ड्राइवर से बोले, "तू भी गिन, एक भी कम नहीं होना चाहिए।"
जब गिनती पूरी हुई, तो साहब...भास्कर की 4200 कॉपियां थीं और नई दुनिया की 3600!
रमेशचंद्र अग्रवाल जी की खुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने अपनी शर्त हारी जरूर, लेकिन उनका अखबार जीत गया था। उन्होंने तुरंत जेब से 10 हजार रुपये निकाले और मिश्र जी के हाथ में रख दिए। इतना ही नहीं, स्टेशन पर मौजूद 40-42 हॉकरों और लड़कों को जमा किया और बोले, "आज इन सबको मेरी तरफ से गरम-गरम पोहे, कचोरी और जलेबी खिलाओ!"
उस सुबह रतलाम स्टेशन पर सिर्फ अखबार नहीं बंट रहे थे, बल्कि एक 'मालिक' अपने 'सिपाही' की जीत का जश्न मना रहा था। रमेश मिश्र के लिए वो 10 हजार रुपये सिर्फ इनाम नहीं थे बल्कि उस भरोसे की मोहर थे जो उन्होंने अपनी मेहनत से कमाया था।
लेकिन साहब, ये तो सिर्फ मार्केटिंग की बात थी। असली पत्रकारिता तो न्यूज़ रूम के उन गलियारों में होती थी जहाँ बड़े-बड़े कांडों की खबरें दबाई या उभारी जाती थीं।
(अगली किस्त में पढ़िएगा: जब गांधीनगर की नाव दुर्घटना और रतलाम के रेल हादसे ने प्रशासन की नींद उड़ा दी। रमेश मिश्र की वो रिपोर्टिंग जिसने माधवराव सिंधिया तक को रतलाम दौड़ने पर मजबूर कर दिया!)
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