पुरुष प्रधान क्षेत्र में 'नारी शक्ति' तीन लड़कियों का वह हौसला

(नैवेद्य पुरोहित)
अस्सी का वह दशक जब महिलाओं के लिए घर की दहलीज पार करना ही बड़ी बात मानी जाती थी, तब अखबार के दफ्तर और खासकर प्रेस (छापेखाने) को पूरी तरह 'मर्दों का इलाका' समझा जाता था। मशीनों का भारी शोर, स्याही के दाग, रात-बेरात का काम और पुरुषों की भीड़ ऐसे माहौल में किसी महिला का काम करना आज जितना सहज नहीं था।
लेकिन दैनिक भास्कर की उस शुरुआती टीम में वर्षा जोशी और उनकी सखियों ने इस मिथक को तोड़ा। वर्षा याद करती हैं कि कंपोजिंग विभाग, जो कि अखबार की रीढ़ होता था, वहां वे केवल तीन लड़कियां थीं वर्षा जोशी, सुधा साकल्ले और सुनीता तिवारी। इन तीनों ने साबित किया कि महिलाएं इस तकनीकी और थका देने वाले काम में पुरुषों से कम नहीं हैं। वर्षा बताती हैं, "उस समय प्रेस का काम अक्सर पुरुषों का ही माना जाता था, लेकिन हमने वहां भी अपनी जगह बनाई।"
वे तीन लड़कियां उस पुरुष प्रधान माहौल में एक-दूसरे का संबल थीं। जब काम का दबाव बढ़ता या कोई तकनीकी खराबी आती, तो ये तीनों कंधे से कंधा मिलाकर डटी रहतीं। बाहर की दुनिया में भले ही लोग अखबार पढ़ते थे, लेकिन अंदर ये 'नारी शक्ति' खामोशी से कलम के सिपाही बनकर पन्ने दर पन्ने इतिहास रच रही थी।
वहां उनके काम को सिर्फ 'महिला होने' के नाते नहीं, बल्कि उनकी 'काबिलियत' के नाते सम्मान मिला। उस दौर में इन तीनों का साथ काम करना इंदौर की पत्रकारिता में महिला सशक्तिकरण का एक ऐसा अध्याय था, जिसकी चर्चा आज की चकाचौंध में कहीं खो गई है।
(अगली किस्त में पढ़िए: काम के उस तनावपूर्ण माहौल में क्या कोई ऐसी दोस्ती हो सकती है जो थकान मिटा दे? अगली किस्त में हम मिलेंगे वर्षा जी की सबसे प्रिय सखी 'सुधा' से, जो सुबह 7:00 बजे ही ऑफिस पहुँचकर उनका इंतज़ार करती थीं।) #दैनिक_भास्कर_इंदौर_लॉन्चिंग_टीम_के_गुमनाम_नायक #सीरीज_24 #डीबी_कॉर्प #गुमनाम_नायक #वर्षा_जोशी

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