धरोहर की दहलीज़ पर एक रिपोर्ट
डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर स्मृति व्याख्यानमाला
(नैवेद्य पुरोहित)
मध्यप्रदेश के पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय संचालनालय के अधीन स्थापित डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर पुरातत्व शोध संस्थान ने अपने यशस्वी संस्थापक की पुण्यतिथि के अवसर पर दिनांक 02 अप्रैल 2026 को एक व्याख्यानमाला का आयोजन किया। यह कोई साधारण सभा न थी यह उस मिट्टी की याद थी जिसने एक अनथक अन्वेषी को जन्म दिया। उस लौ की याद थी जो दशकों तक इस देश की धरोहरों को रोशन करती रही।
कार्यक्रम का शुभारम्भ दीप प्रज्ज्वलन और माँ सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष पुष्पार्पण से हुआ। डॉ. वाकणकर जी के चित्र के आगे जब अतिथियों ने श्रद्धासुमन अर्पित किए तब भोपाल के उस सभागार में मुझे एक अदृश्य उपस्थिति महसूस हुई जैसे वह फक्कड़ पुरातत्ववेत्ता स्वयं वहाँ बैठा हो। खादी का कुर्ता-पाजामा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की टोपी पहने हुए किसी खुदाई की रिपोर्ट के पन्ने पलटता हुआ।
कार्यक्रम की अध्यक्षता आयुक्त पुरातत्व मदन नागरगोजे आईएएस ने की। मुख्य अतिथि के रूप में पद्मश्री डॉ. नारायण व्यास और वरिष्ठ पुरातत्वविद् कैलाशचन्द्र पाण्डे उपस्थित थे। ये लोग वाकणकर जी के उन शिष्यों में से है जिन्होंने अपने गुरु की विरासत को अपने जीवन का केन्द्र बना लिया। साथ में थे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीक्षण पुरातत्वविद् डॉ. मनोज कुमार कुमरी और डॉ. सुरेश कुमार दुबे। मंच संचालन का दायित्व डॉ. ध्रुवेन्द्र सिंह जोधा ने निभाया।
मूर्तियों की तस्करी में शासकीय हाथ -
व्याख्यानमाला का आरम्भ मंदसौर निवासी कैलाशचन्द्र पाण्डे के वक्तव्य से हुआ। उनकी बात सुनना जैसे किसी जीती-जागती पुरातत्व की पाठशाला में बैठना था। न किताबी, न औपचारिक बल्कि एकदम ज़मीनी और सच्ची। उन्होंने बताया कि जब वे पुरातत्व विभाग में आए तो दैनिक वेतन भोगी मज़दूर की तरह काम किया। तीन रुपये रोज़ की मज़दूरी। काम था मिट्टी के टुकड़ों को धोना और रोज़ाना रिपोर्ट को प्रेस जाकर देना फिर वहां से अगले दिन अख़बार लाना। तीन रुपये रोज़ की मजदूरी हुआ करती थी। उन्होंने गर्व के साथ कहा, "मैं तो उनका (वाकणकर जी) नीजी नौकर था लेकिन ज्ञान चुराने की आवश्यकता होती है।" यह पंक्ति सुनकर समझ में आया कि सच्चा शिष्यत्व क्या होता है गुरु के साथ रहकर, देखकर, अनुभव करके सीखना। वाकणकर जी ने कभी नहीं कहा होगा आओ आज मैं तुम्हें पुरातत्व सिखाऊँगा। वे बस काम करते रहे और जो उनके साथ रहे, वे सीखते रहे।
के.सी पाण्डे ने दंगवाड़ा और रुनिजा के उत्खनन का ज़िक्र किया। रुनिजा उत्खनन गुप्तकाल के अनेक सिक्कों का खज़ाना साबित हुआ। इस उत्खनन के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री पी.सी. सेठी ने मात्र चार हज़ार रुपये स्वीकृत किए थे और इन्हीं चार हज़ार रुपयों में इतिहास की परतें उघाड़ी गईं। उन्होंने मंदसौर ज़िले के पुरातत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। निम्बार ज़िले और मंदसौर के इतिहास की यात्रा के साथ-साथ उन्होंने भारत में सहस्रलिंग की परम्परा का भी उल्लेख किया। पाँच राज्यों में इक्कीस सहस्रलिंग प्राप्त हुए हैं एक सहस्रलिंग स्वयं वाकणकर जी ने अपने कार्यकाल के दौरान खोजा। सहस्रलिंग का पहला उल्लेख महाभारत में मिलता है, और महर्षि तांडि ने इसके एक हज़ार आठ नामों का स्तोत्र रचा है। भारत में सहस्रलिंग का पहला मंदिर ओडिशा में बनाया गया था।
मंदसौर की उस अफीम की चर्चा भी उन्होंने बड़ी बेबाकी से की। वह ज़माना जब अफीम केवल ब्राह्मण छू सकते थे, भेली बनती थी, फिर चेष्ट बनता था, फिर रतलाम होते हुए बम्बई पहुंचता था वहां ब्रिटिश दलाल अफीम की नीलामी करते थे और फिर जाकर चीन पहुँचता था। इस विवरण में एक औपनिवेशिक भारत की झाँकी थी और उस पृष्ठभूमि में पुरातत्व का काम कितना उपेक्षित रहा, यह भी स्पष्ट था। पाण्डे जी ने मोढी लिपि के पठन में पारंगत होने का भी ज़िक्र किया। वाकणकर जी के मार्गदर्शन में उन्होंने इस दुरूह लिपि को पढ़ना सीखा। आज उन्होंने मोढी लिपि के लगभग तीन हज़ार पत्रों का सम्पादन किया है। फिर उन्होंने एक ऐसी बात कही जो सीधे व्यवस्था पर करारा प्रहार था, "आज दस-दस संग्रहालयों का एक प्रभारी है, आठ संग्रहालयों का एक अधिकारी है जो इन्दौर में बैठता है यह तो है मध्यप्रदेश के पुरातत्व की हालत।" यह वाक्य किसी आरोप की तरह नहीं, एक दर्द की तरह निकला उस इंसान का दर्द जिसने अपनी पूरी उम्र इस विरासत को सँजोने में लगाई। सरकार के कार्यक्रम में शासन को आईना दिखाने का काम उन्होंने किया।
उन्होंने यह भी संकोच नहीं किया कि मध्यप्रदेश में मूर्तियों की सरकारी तस्करी में शासकीय हाथ था। पाण्डे जी के अनुसार वाकणकर जी, "संस्कृति और संघ के सच्चे स्वयंसेवक थे इसीलिए उन्हें प्रताड़ित किया गया।" यह बात गले में कड़वे घूँट की तरह उतरी जो सच के लिए लड़े, उन्हें ही कोसा गया। अपने वक्तव्य के अंत में उन्होंने उन पूजनीय गुरु को प्रणाम किया जिन्होंने अपना पूरा जीवन इस राष्ट्र को समर्पित कर दिया।
पद्मश्री नारायण व्यास: गुरु की छाया में पला एक शिष्य -
इसके बाद मंच पर पद्मश्री डॉ. नारायण व्यास जी आए। उनकी बात में एक मिठास थी, एक गहराई थी जैसे कोई पुराना दरख्त अपनी जड़ों की कहानी सुना रहा हो। उन्होंने बताया कि वे वाकणकर जी के साथ बचपन से रहे हैं। सन् 1963-64 की बात है जब वे नौवीं-दसवीं में थे और चित्रकारी करते थे। उनके पिता वाकणकर जी को जानते थे और एक दिन उनसे मिलाने ले गए। वहीं से एक जीवनव्यापी गुरु-शिष्य सम्बन्ध की नींव पड़ी। उन्होंने बताया कि वाकणकर जी के पिता श्रीधर जी ने ग्वालियर में अनेक मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया था उसी संस्कारों का प्रभाव वाकणकर जी पर पड़ा। वे अपनी जेब से पैसा लगाकर काम करवा देते थे। कभी नहीं कहा कि "मेरे पास संसाधन नहीं हैं।" यह समर्पण था शुद्ध, निस्वार्थ, अटूट।
डॉ. व्यास ने उस ऐतिहासिक क्षण का भी ज़िक्र किया जब वाकणकर जी ने 23 मार्च 1957 को यात्रा के दौरान भीमबैठका की शैलचित्रों की खोज की और उस खोज के आधार पर उन्हें 1975 में पद्मश्री मिली। आज भीमबेटका यूनेस्को विश्व धरोहर है। एक अकेले मनुष्य की जिज्ञासा ने पूरी दुनिया को मध्यभारत की प्राचीन सभ्यता से परिचित कराया। उन्होंने आयुक्त महोदय से आग्रह किया कि महाविद्यालयों के छात्रों के लिए समय-समय पर कार्यशालाएँ लगाई जाएँ। एक मोबाइल वैन हो जो गाँव-गाँव जाए, चौपाल पर बैठकर पुरातत्व की सरल कहानियाँ सुनाए। उनका कहना था कि "पुरातत्व जटिल-सा विषय है, उसे समझाना सरल होना चाहिए। हम सबके विषय भले कोई भी हो पर धरोहर हमारी सबकी है।"
आयुक्त का उद्बोधन नई उम्मीद की किरण -
इस अवसर पर आयुक्त पुरातत्व मदन नागरगोजे ने जो उद्बोधन दिया वह इस कार्यक्रम का शायद सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा था और इसलिए भी क्योंकि यह उनका पहला चार्ज लेने के बाद आधिकारिक कार्यक्रम था।
उन्होंने डॉ. नारायण व्यास और कैलाशचन्द्र पाण्डे को "Monument Men" की संज्ञा दी उस अमेरिकी फ़िल्म के नायकों की तरह जो युद्ध के बीच कला और सांस्कृतिक धरोहर को बचाने निकले थे। उन्होंने दोनों को संबोधित करते हुए कहा, "आप पर भी एक फ़िल्म बनेगी।" मध्यप्रदेश की भूवैज्ञानिक प्राचीनता का उल्लेख किया कि यह प्रदेश गोंडवाना लैंड का हिस्सा है, जो पृथ्वी की सबसे पुरानी भूमियों में से एक है। नर्मदा नदी गंगा से भी अधिक प्राचीन नदी है। डिंडौरी और उमरिया ज़िलों की शैलगुहाओं, डायनासोर के जीवाश्मों और घुघुआ फॉसिल पार्क का ज़िक्र करते हुए उन्होंने इस भूमि की अपार ऐतिहासिक सम्पदा को रेखांकित किया। उन्होंने कई महत्त्वाकांक्षी योजनाओं की घोषणा की इस संस्थान में एक इन्क्यूबेशन सेल स्थापित होगा। यूनेस्को के सहयोग से एक AR/VR प्रोजेक्ट चालू किया जाएगा। एक "UNESCO World Heritage Madhyapradesh Cultural Trail" बनाया जाएगा जिसमें प्रदेश की सभी धरोहर स्थलों को एक ही मोबाइल एप्लीकेशन से जोड़ा जाएगा "युगे-युगे मध्यप्रदेश" के नाम से उनका दृष्टिकोण स्पष्ट था, "कोई भी ज्ञान एक पीढ़ी से दूसरे के पास न रहे तो वह लुप्त हो जाता है।"
सम्मान और विरासत -
इस अवसर पर पद्मश्री प्राप्त होने पर डॉ. नारायण व्यास का सम्मान किया गया। वाकणकर जी की शिष्य परम्परा में राजेन्द्र नागदेव और डॉ. रेखा भटनागर का भी स्वागत-सम्मान हुआ। मंच संचालन डॉ. ध्रुवेन्द्र सिंह जोधा ने किया। अतिथियों का स्वागत उपसंचालक संग्रहालय नीलेश लोखंडे ने किया। कार्यक्रम के अंत में सहायक यंत्री संतोष नामदेव ने आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में विभाग के अधिकारी-कर्मचारी, टेंपल सर्वे भोपाल से सुश्री एम. विक्रम, एएसआई भोपाल के अधीक्षण पुरातत्वविद् डॉ. रमेश यादव तथा कैरियर कॉलेज, सरोजनी नायडू कॉलेज और एमएलबी कॉलेज के प्राध्यापक एवं छात्र उपस्थित रहे।
मध्यप्रदेश में पुरातत्व की दशा और दिशा -
इस पूरे कार्यक्रम को यदि एक एंगल से देखा जाए, तो एक बड़ी विडम्बना उभरकर सामने आती है। मध्यप्रदेश जो गोंडवाना की प्राचीन भूमि है, जिसकी नर्मदा नदी गंगा से भी पुरानी है, जहाँ भीमबेटका के शैलचित्र 30,000 वर्ष पुरानी मानव सभ्यता की गवाही देते हैं, जहाँ साँची का स्तूप, खजुराहो के मंदिर, माण्डू के महल, उज्जैन की धार्मिक परम्परा और विदिशा की पुरातात्त्विक सम्पदा है उस प्रदेश में आज आठ-आठ, दस-दस संग्रहालयों के बीच एक अधिकारी है। यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं है यह एक सांस्कृतिक अपराध है। जब कैलाशचन्द्र पाण्डे जैसे व्यक्ति तीन रुपये रोज़ की मज़दूरी पर मिट्टी के टुकड़े धोते हैं और उसी मिट्टी से इतिहास की परतें निकालते हैं और दूसरी तरफ़ उसी विभाग में मूर्तियों की सरकारी तस्करी होती है तब समझ आता है कि समस्या सिर्फ बजट की नहीं, नियत की भी है। वाकणकर जी ने स्वयं अपनी जेब से पैसे लगाकर पुरातात्त्विक कार्य करवाए। पी.सी. सेठी ने रुनिजा उत्खनन के लिए मात्र चार हज़ार रुपये दिए। और आज जब नए आयुक्त AR/VR और UNESCO Cultural Trail की बात करते हैं, तो एक उम्मीद जगती है पर यह भी सच है कि नीतियाँ कागज़ पर अच्छी होती हैं, ज़मीन पर उतरने में वक्त लगता है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वाकणकर जी जैसे लोग अब नहीं आते वह पीढ़ी थी जो बिना वेतन के, बिना मान्यता के, बिना संसाधन के काम करती थी। आज का युवा पुरातत्व को कैरियर के रूप में क्यों चुने, जब सरकारी ढाँचा उसे इतना हतोत्साहित करता हो..? डॉ. नारायण व्यास का वह सुझाव बहुत व्यावहारिक था एक मोबाइल वैन हो जो गाँव-गाँव जाए, चौपाल पर पुरातत्व की कहानियाँ सुनाए, छात्रों को खुदाई स्थलों पर ले जाए। पुरातत्व को प्रयोगशाला से बाहर निकालकर आम जन तक पहुँचाना होगा। जब तक धरोहर जनमानस की अपनी नहीं लगेगी, वह सुरक्षित नहीं रहेगी। और शायद यही वाकणकर जी का सबसे बड़ा सन्देश था धरोहर किसी एक विभाग की जागीर नहीं होती। वह पूरे समाज की साझी विरासत होती है। जो इसे समझ लेता है, वह उसे बचा लेता है।
अंत में -
वाकणकर जी नहीं हैं, पर उनके शिष्य हैं। और जब तक एक भी शिष्य उनके नाम की लौ थामे है एक गुरु की विरासत ज़िन्दा है। "ज्ञान को चुराने की आवश्यकता होती है" कैलाशचन्द्र पाण्डे का यह वाक्य इस पूरे कार्यक्रम का सार है। पुरातत्व कोई नौकरी नहीं है यह एक साधना है, एक जुनून है, एक तरह का प्रेम है। उस प्रेम को जीवित रखना ही वाकणकर जी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
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