सदी साक्षी है: राष्ट्रधर्म की रोशनी में सौ साल का सफरनामा!

(नैवेद्य पुरोहित)
सौ साल का सफर, हज़ारों सुर्खियों की गवाही और एक ऐसा इतिहास जो कागज़ के पन्नों पर दर्ज होकर राष्ट्र की धड़कन बन गया। जब आज़ादी की लड़ाई लड़ी जा रही थी, जब देश टुकड़ों में बंट रहा था, जब युद्ध की आग में जवान शहीद हो रहे थे, जब आपातकाल ने लोकतंत्र का गला घोंटा, जब आतंकवाद ने मासूमों को निशाना बनाया उन सभी कठिन घड़ियों में एक चीज़ अडिग खड़ी रही: अख़बार। और उन्हीं अखबारों की पत्रकारिता के सौ साल के सफरनामे को समेटे हुए है "सदी साक्षी है" प्रदर्शनी, जो इन दिनों भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के चाणक्य भवन में सजी हुई है। यह महज़ पुराने अखबारों का जखीरा नहीं है यह राष्ट्रधर्म का जीवंत दस्तावेज़ है। 1920 से लेकर 2024 तक, पूरे सौ साल की यात्रा में जब भी देश के सामने संकट आया, जब भी इतिहास ने करवट बदली, तब-तब समाचार पत्रों ने उस पल को दर्ज किया, सच को बेबाकी से कहा और राष्ट्रीय चेतना की मशाल को जलाए रखा। तीन-तीन फुट के बड़े फ्रेम में सजे ये फ्रंट पेज बता रहे हैं कि कैसे पत्रकारिता ने राष्ट्रधर्म को निभाया बिना डरे, बिना झुके, बिना बिके। "खींचो न कमानों को न तलवार निकालो, जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो!" यह पंक्ति सिर्फ शब्द नहीं, उस युग का नारा थी जब कलम ही सबसे बड़ा हथियार थी। और आज, जब हम "राष्ट्रधर्म" की बात करते हैं, तो यह प्रदर्शनी हमें याद दिला रही है कि राष्ट्र के प्रति हमारा कर्तव्य क्या है, और पत्रकारिता ने उस कर्तव्य को किस तरह निभाया है।
राष्ट्रधर्म और पत्रकारिता का अटूट रिश्ता - जब हम राष्ट्रधर्म की बात करते हैं तो हमारा मतलब होता है देश के प्रति हमारा कर्तव्य, हमारी जिम्मेदारी और हमारा फ़र्ज़। हर नागरिक का यह राष्ट्रधर्म है कि वो अपने देश की रक्षा करे, उसकी प्रगति में योगदान दें और समाज में सच्चाई का दीपक जलाए रखे। पत्रकारिता इसी राष्ट्रधर्म की सबसे बड़ी वाहक रही है। जब-जब देश पर संकट आया, तब-तब पत्रकारों ने अपनी कलम से, अपने कैमरे से और अपनी आवाज़ से राष्ट्र की सेवा की है। "सदी साक्षी है" प्रदर्शनी में जो अखबार सजे हुए हैं वे महज एक फ्रेम नहीं बल्कि राष्ट्रधर्म के उन योद्धाओं के संघर्ष की गवाही हैं जिन्होंने सत्य को उजागर करने के लिए अपनी जान की बाज़ी तक लगा दी। जब अंग्रेजों की हुकूमत थी और देश पर गुलामी की बेड़ियाँ जकड़ी हुई थीं, तब पत्रकारों ने अपने राष्ट्रधर्म का पालन करते हुए आज़ादी की अलख जगाए रखी। उन्होंने अपने अखबारों को हथियार बनाया और अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ़ मोर्चा खोल दिया। इसी वजह से मशहूर पंक्ति उद्धरित हुई, "खींचो न कमानो को न तलवार निकालों जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालों!"
आजादी की लड़ाई में पत्रकारिता का राष्ट्रीय योगदान - इस प्रदर्शनी में 1920 के दशक से लेकर 1947 तक के जो अखबार हैं, वे राष्ट्रधर्म की सबसे बड़ी मिसाल हैं। उस दौर में पत्रकारिता करना किसी जंग लड़ने से कम नहीं था। गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे पत्रकार, जिन्होंने "प्रताप" अखबार निकाला, उन्होंने अपने राष्ट्रधर्म के लिए शहादत तक दे दी। महावीर प्रसाद द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी, रामवृक्ष बेनीपुरी जैसे तमाम पत्रकारों ने अपनी लेखनी से अंग्रेजों की नींद हराम कर दी थी। जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन चलाया, तो अखबारों ने जनता को जागृत करने में अहम भूमिका निभाई। "करो या मरो", "अंग्रेजों भारत छोड़ो" जैसी सुर्खियों ने करोड़ों भारतीयों के दिलों में देशभक्ति की आग सुलगा दी। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों की शहादत को अखबारों ने इतनी शिद्दत से कवर किया कि पूरा देश उबल पड़ा। यह था राष्ट्रधर्म का सच्चा निर्वहन। इस प्रदर्शनी में जलियांवाला बाग हत्याकांड की कवरेज देखकर रूह काँप जाती है। अखबारों ने उस नरसंहार की इतनी मार्मिक रिपोर्टिंग की कि अंग्रेजी सरकार की क्रूरता पूरी दुनिया के सामने आ गई। यह राष्ट्रधर्म की पराकाष्ठा थी कि खतरों से भरे माहौल में भी पत्रकारों ने सच्चाई को छुपने नहीं दिया।
आजादी का दिन: जब अखबारों ने राष्ट्रीय खुशी को दर्ज किया - 15 अगस्त 1947 का दिन "वीर अर्जुन" नाम का एक अख़बार सबसे अलग हटके हेडलाइन लगाता है कि, "एक हज़ार वर्षों बाद भारत फिर से स्वाधीन हो गया"। "द लीडर" ने अपने फ्रंट पेज पर हेडिंग लगाई, "INDIA IS FREE TODAY"। "आज" अखबार ने छापा "15 अगस्त के मंगलमय महापर्व का अभिनंदन"। उस दिन हर अखबार ने अपने-अपने तरीके से देश की खुशी को बयान किया। कुछ अखबारों ने तिरंगा छापा, कुछ ने नेहरू जी के "ट्रिस्ट विद डेस्टिनी" भाषण को मुख्य खबर बनाया। लेकिन सबका मकसद एक था राष्ट्र की खुशी को जन-जन तक पहुँचाना। पत्रकारों ने अपने राष्ट्रीय कर्तव्य को पूरी ईमानदारी से निभाया था। आजादी के बाद देश को नए सिरे से खड़ा करना था। यह राष्ट्रधर्म का नया अध्याय था। पंडित नेहरू के नेतृत्व में देश ने विकास की राह पकड़ी। बड़े-बड़े बाँध बने, कारखाने लगे, पंचवर्षीय योजनाएँ लागू हुईं। पत्रकारों ने इन सब विकास कार्यों को कवर किया और जनता को देश की प्रगति से अवगत कराया। भाखड़ा नांगल बाँध का निर्माण, बोकारो स्टील प्लांट की स्थापना, भिलाई, दुर्गापुर, राउरकेला जैसे इस्पात संयंत्रों का निर्माण इन सब ऐतिहासिक घटनाओं को अखबारों ने बड़े गर्व से कवर किया। यह राष्ट्रनिर्माण की खबरें थीं और पत्रकारों ने अपने राष्ट्रधर्म का पालन करते हुए इन खबरों को जनता तक पहुँचाया। इस प्रदर्शनी में उस दौर की तस्वीरें और खबरें देखकर लगता है कि कैसे पूरा देश एक सपना देख रहा था एक समृद्ध, शक्तिशाली और आत्मनिर्भर भारत का सपना। पत्रकारों ने इस सपने को साकार करने में अपना योगदान दिया।
युद्धों में राष्ट्रीय भावना को जगाती पत्रकारिता - 1962 में चीन ने भारत पर हमला किया। यह देश के लिए बड़ा झटका था। लेकिन उस कठिन समय में पत्रकारों ने राष्ट्रधर्म का अद्भुत परिचय दिया। अखबारों ने जवानों के शौर्य की कहानियाँ छापीं, देशवासियों से सहयोग की अपील की और राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया। 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों के दौरान भी पत्रकारों ने अपनी जान की परवाह न करते हुए सीमा से रिपोर्टिंग की। उन्होंने जवानों की वीरता की कहानियाँ लिखीं, युद्ध की हकीकत जनता तक पहुँचाई और राष्ट्रीय भावना को जागृत रखा। यह राष्ट्रधर्म की सच्ची सेवा थी। इस प्रदर्शनी में 1971 के बांग्लादेश युद्ध की कवरेज अद्भुत है। जब भारतीय सेना ने पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी और बांग्लादेश का निर्माण हुआ, तब अखबारों ने कई शानदार सुर्खियाँ लगाईं। यह राष्ट्रीय गौरव का क्षण था और पत्रकारों ने इसे पूरी शान से दर्ज किया।
आपातकाल: कभी न मिटने वाली कालिख - 1975 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया, तो यह लोकतंत्र के लिए सबसे काला दौर था। प्रेस की आजादी छीन ली गई, सेंसरशिप लगा दी गई, पत्रकारों को जेल में डाल दिया गया। लेकिन इस कठिन समय में भी कुछ बहादुर पत्रकार अपने राष्ट्रधर्म को नहीं भूले। उन्होंने अपने तरीके से विरोध दर्ज किया। इंडियन एक्सप्रेस और नईदुनिया ने अपना संपादकीय कॉलम खाली छोड़कर सरकार का विरोध किया। कुछ अखबारों ने सरकारी विज्ञापन छापने से इनकार कर दिया। यह राष्ट्रधर्म का सर्वोच्च उदाहरण था। पत्रकारों ने तानाशाही के सामने घुटने नहीं टेके और लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष किया। चाणक्य भवन में लगी इस प्रदर्शनी को अब तक देश के कई प्रख्यात पत्रकारों, कार्टूनिस्टों और महान विभूतियां देख चुकी है। जो भी अतिथि परिसर में आता है वह इस अद्भुत प्रदर्शनी को देखे बिना नहीं जाता। इंदौर से प्रकाशित नईदुनिया के अस्सी के दशक के फ्रंट पेज देखकर वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल भावुक हो गए थे। अप्रैल 1984 में राकेश शर्मा के अंतरिक्ष में जाने की खबर, पंजाब में आतंकवाद की कवरेज इन सब पेजों को उन्होंने खुद बनाया था। यह उनके राष्ट्रधर्म निर्वहन का हिस्सा था। आज की पत्रकारिता में राष्ट्रधर्म की भावना कमजोर हो रही है। आज के कई पत्रकार सनसनी के पीछे भाग रहे हैं, टीआरपी के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। लेकिन असली पत्रकारिता तो राष्ट्रधर्म की सेवा है।
संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मृत्यु - दैनिक जागरण का संजय गांधी की विमान दुर्घटना से जुड़ा फ्रंट पेज उस दौर की राजनीतिक अनिश्चितता और सत्ता-संतुलन की नाज़ुकता को सामने लाता है। एक उभरते युवा नेता की अचानक हुई मृत्यु केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं थी, बल्कि उसने राष्ट्रीय राजनीति की दिशा को भी प्रभावित किया। अखबार का यह पन्ना बताता है कि पत्रकारिता का राष्ट्रधर्म केवल सूचना देना नहीं, अपितु इतिहास के निर्णायक क्षणों को बिना अलंकरण, बिना भय दर्ज करना भी है। इस फ्रंट पेज ने सोचने पर मजबूर किया कि सत्ता और व्यक्तित्व दोनों क्षणभंगुर हैं, लेकिन सत्य का दस्तावेज स्थायी ही रहेगा।
इंदिरा गांधी की हत्या- इंदिरा गांधी की हत्या से जुड़ा अमर उजाला का फ्रंट पेज राष्ट्र के सामूहिक आघात का प्रतीक है। एक सशक्त प्रधानमंत्री की हत्या ने देश की राजनीतिक संरचना को झकझोर दिया था। प्रदर्शनी में यह अखबारी साक्ष्य पत्रकारिता के उस राष्ट्रधर्म को रेखांकित करता है, जहाँ शोक, आक्रोश और जिम्मेदारी तीनों को संतुलन के साथ प्रस्तुत किया गया।
भोपाल गैस कांड - भोपाल गैस त्रासदी में स्वदेश अखबार की कवरेज वाकई अलग हटके है। "भोपाल लाशों का शहर बन गया", "भोपाल में मौत का तांडव" नाम से शीर्षक वाले स्वदेश के वो फ्रंट पेज भारतीय औद्योगिक इतिहास का सबसे भयावह अध्याय खोलता है। हजारों मौतें, लाखों ज़िंदगियाँ प्रभावित और एक शहर का भविष्य जहरीली गैस में घुल गया। इस समाचार को सामने लाने में पत्रकारिता ने सत्ता, प्रशासन और बहुराष्ट्रीय कंपनियों से सवाल पूछने का साहस दिखाया। प्रदर्शनी में यह पृष्ठ राष्ट्रधर्म का एक कठोर लेकिन आवश्यक पक्ष दर्शाता है कि जब व्यवस्था विफल हो जाए, तब पत्रकारिता ही पीड़ितों की आवाज़ बनती है और इतिहास को चुपचाप दफन होने से बचाती है।
राजीव गांधी की हत्या - राजीव गांधी की हत्या से संबंधित प्रभात खबर का फ्रंट पेज आधुनिक भारत के सबसे चौंकाने वाले राजनीतिक हादसों में से एक का दस्तावेज है। एक युवा काबिल प्रधानमंत्री की बॉम्ब ब्लास्ट में मृत्यु ने देश को हिला कर रख दिया था। यह अखबारी साक्ष्य राष्ट्रधर्म की उस जिम्मेदारी को रेखांकित करता है, जिसमें पत्रकारिता भावनाओं में बहने के बजाय तथ्यों के साथ राष्ट्र को सच्चाई से रूबरू कराती है।
बाबरी मस्जिद विध्वंस - बाबरी मस्जिद विध्वंस से जुड़े अमर उजाला के फ्रंट पेज ने भारतीय लोकतंत्र के सबसे संवेदनशील और विवादास्पद क्षणों में से एक को दर्ज किया। यह घटना केवल एक ढांचे के गिरने की नहीं, बल्कि संविधानिक मूल्यों, सामाजिक सौहार्द और कानून-व्यवस्था की परीक्षा थी। प्रदर्शनी में मौजूद यह अखबारी पन्ना बताता है कि पत्रकारिता का राष्ट्रधर्म सत्ता या भीड़ के साथ खड़ा होना नहीं, बल्कि इतिहास के सामने ईमानदारी से सच रखना है चाहे वह सच कितना ही असहज क्यों न हो।
संसद पर आतंकी हमला - अमर उजाला का ही संसद पर आतंकी हमले का फ्रंट पेज भारतीय लोकतंत्र के हृदय पर किए गए हमले का साक्ष्य है। ऐसे क्षण में पत्रकारिता ने संयम, जिम्मेदारी और राष्ट्रीय एकता का परिचय देते हुए खबर को प्रस्तुत किया। प्रदर्शनी में यह पृष्ठ राष्ट्रधर्म का सबसे परिपक्व रूप दर्शाता है जहाँ राष्ट्रहित, सुरक्षा और सत्य तीनों सर्वोपरि हैं।
आतंकवाद के खिलाफ पत्रकारिता का संघर्ष - 26/11 मुंबई हमला भारत के लिए सबसे काला दिन था। आतंकवादियों ने मुंबई को दहला दिया। लेकिन उस समय पत्रकारों ने अद्भुत साहस दिखाया। उन्होंने गोलियों की बौछार के बीच रिपोर्टिंग की, जनता को अपडेट दिया और सुरक्षा बलों की मदद की। जब देश पर संकट हो, तो हर नागरिक को आगे आकर मदद करनी चाहिए। पत्रकारों ने यह काम बखूबी किया। इस प्रदर्शनी में उन त्रासदियों की तस्वीरें और रिपोर्ट देखकर दिल दहल जाता है, लेकिन साथ ही यह भी दिखता है कि कैसे पूरा देश एक होकर खड़ा हो गया था। कोरोना काल में पत्रकारिता का योगदान - 2020-21 में जब कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया, तब भी सभी पत्रकार अपने राष्ट्रधर्म को नहीं भूले। लॉकडाउन के दौरान जब सब कुछ बंद था, तब भी अखबार लोगों तक पहुँचते रहे। पत्रकारों ने अपनी जान जोखिम में डालकर रिपोर्टिंग की। इस प्रदर्शनी में कोरोना काल की कवरेज देखकर पत्रकारों की मेहनत और समर्पण का पता चलता है। पत्रकारों ने सही जानकारी दी, अफवाहों का खंडन किया और राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया।
दादा माखनलाल: राष्ट्रधर्म के प्रतीक - दादा माखनलाल ने अपनी पत्रकारिता से स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूती दी। उन्होंने "प्रभा", "कर्मवीर" जैसे अखबारों में लिखा और अंग्रेजों के खिलाफ जनमत तैयार किया। उनके लिए पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि राष्ट्रसेवा का व्रत था। उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपने राष्ट्रधर्म से कभी समझौता नहीं किया। विश्वविद्यालय का नाम दादा माखनलाल चतुर्वेदी के नाम पर रखना यह संदेश देता है कि यहाँ से निकलने वाले हर पत्रकार को राष्ट्रधर्म के प्रति समर्पित होना चाहिए। यह परिसर माखन दादा की विरासत को आगे बढ़ाने का माध्यम है। यहाँ सीख रहे विद्यार्थियों में वो निडरता, वो साहस और वो प्रतिबद्धता आनी चाहिए जो पंडित माखनलाल चतुर्वेदी में थी। नई पीढ़ी को राष्ट्रधर्म का पाठ - यह प्रदर्शनी सिर्फ पुराने अखबारों का संग्रह नहीं है। यह नई पीढ़ी को राष्ट्रधर्म का पाठ पढ़ाने का एक माध्यम है। जब आज के युवा पत्रकारिता के विद्यार्थी इन अखबारों को देखते हैं, तो उन्हें समझ आता है कि असली पत्रकारिता क्या होती है। आज के दौर में पत्रकारिता की दिशा बदल गई है। कई चैनल और अखबार सिर्फ व्यावसायिक हितों को देखते हैं। सनसनीखेज खबरें, फेक न्यूज, पेड न्यूज ये सब चलन में हैं। लेकिन यह प्रदर्शनी बताती है कि पत्रकारिता का असली मकसद क्या है राष्ट्रधर्म की सेवा करना। यहाँ से हम सीख सकते हैं कि हेडलाइन कैसे बनाई जाती है, फोटो का चयन कैसे किया जाता है, खबर को किस तरह प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन सबसे बड़ी सीख यह है कि पत्रकारिता में राष्ट्रधर्म सबसे ऊपर होना चाहिए। राष्ट्रधर्म में शोध का विषय - राष्ट्रधर्म के संदर्भ में इस प्रदर्शनी पर अनगिनत शोध हो सकते हैं। उदाहरण के लिए आजादी की लड़ाई में पत्रकारिता का राष्ट्रीय योगदान, युद्धों के दौरान राष्ट्रीय भावना को जगाने में अखबारों की भूमिका, आपदाओं में पत्रकारों का मानवीय योगदान, आतंकवाद के खिलाफ मीडिया की लड़ाई ये सब शोध के विषय हो सकते हैं। जब किसी घटना को समझना हो, तो उस समय के अखबार सबसे प्रामाणिक स्रोत होते हैं। ये अखबार उस दौर की जनभावना, सरकार की नीतियों, समाज की सोच सब कुछ बयान करते हैं। और सबसे बड़ी बात ये अखबार राष्ट्रीय चेतना के दस्तावेज हैं। समाजशास्त्री इस प्रदर्शनी से सामाजिक बदलाव का अध्ययन कर सकते हैं। कैसे समाज बदला, कैसे सोच बदली, कैसे मूल्य बदले यह सब इन अखबारों में दर्ज है। और यह भी दिखता है कि पत्रकारिता ने समाज को सही दिशा देने में क्या भूमिका निभाई। अखबारों में राष्ट्रीय एकता का संदेश इस प्रदर्शनी में जो अखबार हैं, वे राष्ट्रीय एकता के संदेशवाहक भी हैं। चाहे देश के किसी भी हिस्से में कोई घटना हो, अखबार पूरे देश को एक सूत्र में बाँधते हैं। जब मुंबई में बाढ़ आती है, तो दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई के लोग भी दुखी होते हैं। जब कश्मीर में आतंकी हमला होता है, तो कन्याकुमारी तक लोग गुस्से में आ जाते हैं। यह राष्ट्रीय एकता का जज़्बा मीडिया ने ही जगाया है। सिर्फ राजनीतिक आजादी से देश आजाद नहीं होता, सामाजिक बुराइयों से भी मुक्ति जरूरी है। पत्रकारिता ने दोनों मोर्चों पर लड़ाई लड़ी। भ्रष्टाचार के खिलाफ पत्रकारिता की लड़ाई भ्रष्टाचार देश का सबसे बड़ा शत्रु है। इसके खिलाफ लड़ना हर नागरिक का राष्ट्रधर्म है। पत्रकारों ने हमेशा भ्रष्टाचार को उजागर किया है। बोफोर्स कांड, हर्षद मेहता घोटाला, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, कोयला घोटाला इन सब भ्रष्टाचार के मामलों को सबसे पहले पत्रकारों ने उजागर किया। जब किसी बड़े नेता का भ्रष्टाचार सामने आता है, तो अखबार उसे छुपाते नहीं। वे अपने राष्ट्रधर्म का पालन करते हुए सच्चाई को सामने लाते हैं। यह निडर पत्रकारिता का नमूना है। आज की जरूरत है कि और ज्यादा खोजी पत्रकारिता हो। भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने के लिए पत्रकारों को और सक्रिय होना होगा। यह उनका राष्ट्रधर्म है। डिजिटल युग में राष्ट्रधर्म की नई चुनौतियाँ आज का युग डिजिटल युग है। सोशल मीडिया, ऑनलाइन न्यूज पोर्टल, यूट्यूब चैनल ये सब नए माध्यम हैं। इनमें भी राष्ट्रधर्म का पालन जरूरी है। लेकिन अफसोस कि आज बहुत से डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म फेक न्यूज फैला रहे हैं, नफरत फैला रहे हैं, समाज को बाँट रहे हैं। यह प्रदर्शनी डिजिटल युग के पत्रकारों को भी सीख देती है। जब वे पुराने अखबारों की जिम्मेदार पत्रकारिता देखते हैं, तो उन्हें समझ आता है कि पत्रकारिता का असली मकसद क्या है। चाहे माध्यम कोई भी हो कागज का अखबार हो या डिजिटल प्लेटफॉर्म राष्ट्रधर्म सबसे ऊपर होना चाहिए। आज फेक न्यूज एक बड़ी समस्या है। झूठी खबरें तेजी से फैलती हैं और समाज में अफरा-तफरी मचाती हैं। पत्रकारों की जिम्मेदारी है कि वे सच्चाई को सामने लाएँ। हिंदी हमारी राजभाषा है और इसका विकास भी राष्ट्रधर्म का हिस्सा है। आजादी की लड़ाई में हिंदी अखबारों ने बड़ी भूमिका निभाई। "कर्मवीर", "आज", "प्रताप", "सरस्वती", "हंस" जैसे हिंदी अखबारों और पत्रिकाओं ने जनता को जगाया। आज भी हिंदी अखबार देश के बड़े हिस्से में पढ़े जाते हैं। ये जनता की आवाज हैं। हिंदी पत्रकारिता ने राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया है। लेकिन यह भी सच है कि हर भाषा के अखबार राष्ट्रधर्म की सेवा कर रहे हैं। तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, बंगाली, गुजराती, मराठी, पंजाबी हर भाषा के अखबार अपने-अपने क्षेत्र में राष्ट्रीय चेतना जगा रहे हैं। यह भारत की विविधता में एकता का प्रतीक है।
"सदी साक्षी है" का भविष्य के लिए संदेश यह प्रदर्शनी अतीत की यादों का संग्रह नहीं, बल्कि भविष्य के लिए एक संदेश है। यह संदेश है कि राष्ट्रधर्म कभी पुराना नहीं होता। हर युग में, हर परिस्थिति में राष्ट्रधर्म का पालन जरूरी है। आज के युवा पत्रकारों को यह प्रदर्शनी बताती है कि उनके पूर्वजों ने किस तरह राष्ट्रधर्म का पालन किया। उन्होंने जान की परवाह किए बगैर सच्चाई का साथ दिया। आज के पत्रकारों को भी यही रास्ता अपनाना होगा। आज के पत्रकारों को भी यही रास्ता अपनाना होगा। भविष्य में चाहे तकनीक कितनी भी बदल जाए, राष्ट्रधर्म की अहमियत नहीं बदलेगी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आ चुकी है, आगे भले ही भविष्य में रोबोट पत्रकारिता करने लगें, लेकिन राष्ट्रधर्म की भावना सिर्फ़ मनुष्य में ही होगी। इसलिए मानवीय मूल्यों के साथ पत्रकारिता करना जरूरी है। यह प्रदर्शनी राष्ट्रधर्म की एक अमर कहानी है। यह प्रदर्शनी माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय की धरोहर है। कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी ने इसे साकार करके एक ऐतिहासिक काम किया है। यह प्रदर्शनी आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्रधर्म का पाठ पढ़ाती रहेगी। यह सिर्फ अखबारों का संग्रह नहीं है यह राष्ट्रधर्म का मंदिर है, जहाँ हर अखबार एक पूजा की तरह सजा है। यह वो तीर्थस्थल है जहाँ हर पत्रकार को आकर यह संकल्प लेना चाहिए कि वो अपने राष्ट्रधर्म का पालन करेगा। राष्ट्रधर्म सर्वोपरि है। जय हिंद! #सौ_साल_सौ_सुर्खियां #सदी_साक्षी_है #अखबारों_की_प्रदर्शनी #इतिहास #पत्रकारिता #माखनलाल_चतुर्वेदी_राष्ट्रीय_पत्रकारिता_एवं_संचार_विश्वविद्यालय #भोपाल #बिशनखेड़ी #राष्ट्रधर्म #ध्येयनिष्ठ_पत्रकारिता #मूल्यवान_पत्रकारिता

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