पत्रकारिता के स्वर्णिम युग की अनुगूँज
(नैवेद्य पुरोहित)
गणेश शंकर विद्यार्थी सभागार के बाहर धूप थी वैसी धूप जो अप्रैल में होती है। थोड़ी तीखी, थोड़ी उदास। लेकिन भीतर जो वातावरण था वह किसी और ही मौसम का था। मंच पर लगे चित्र उन पर सजी पुष्पमालाएँ, और कुर्सियों पर बैठे वे लोग जिनमें से कुछ पत्रकारिता के विद्यार्थी थे, कुछ उसके साधक और कुछ उसके गवाह। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय का यह सभागार आज एक कार्यक्रम-स्थल नहीं था वह एक तीर्थ की तरह लग रहा था।
मंच पर तीन चित्र थे भारत माता, माँ सरस्वती और पत्रकारिता के पितृ-पुरुष पंडित माखनलाल चतुर्वेदी का। प्रसिद्ध कला समीक्षक विनय उपाध्याय ने अपनी चिर-परिचित आत्मीय शैली में मंच-संचालन सँभाला। सरस्वती वंदना की पंक्तियाँ सभागार में गूँजीं एक सच्चे, समर्पित साधक की प्रार्थना थी यह जिसमें जन्म-मरण से ऊपर उठकर, किसी शब्द में अपनी छाप छोड़ने की एक अभिलाषा।
वह क्षण जो कैमरे में कैद नहीं हो सका -
पुष्पांजलि का जब समय आया तभी एक ऐसा दृश्य घटित हुआ जिसे देखकर सभागार में एक अजीब-सी स्तब्धता छा गई। श्रद्धेय अच्युतानंद मिश्र जी जो जीवन के नौ दशक से अधिक देख चुके पत्रकारिता के एक जीते-जागते इतिहास है वे भी पुष्पांजलि के लिए उठे। और कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी सर ने जो स्वयं इस विश्वविद्यालय के सर्वोच्च पद पर आसीन हैं उन्होंने झुककर, अपने हाथों से अच्युतानंद जी के जूते उतारे। यह कोई प्रतीकात्मक भाव नहीं था। यह कोई दिखावटी विनम्रता नहीं थी। यह था एक आधी उम्र के कुलगुरु का, अपने से बड़े एक साधक के प्रति सहज स्वाभाविक श्रद्धा-निवेदन। पूरा सभागार देख रहा था। कोई बोला नहीं। शायद कुछ बोलने की ज़रूरत भी नहीं थी।
मुझे अफसोस है कि उस पल का मैं फोटो नहीं खींच पाया। लेकिन वह दृश्य आँखों में इस तरह उतर गया है कि शायद किसी तस्वीर की ज़रूरत भी नहीं। पूरे कार्यक्रम के दौरान बीच-बीच में उनकी सुविधा का ध्यान रखा जाता रहा और सभागार में बैठे सभी लोग यह सब देखते रहे चुपचाप, एक आत्मीयता के साथ जो शब्दों से परे थी।
नींव के पत्थर की पहचान -
कुलगुरु ने जब बोलना शुरू किया तो उनके शब्दों में एक कृतज्ञता थी वह कृतज्ञता तब होती है जब कोई जानता हो कि वह जिस ज़मीन पर खड़ा है, वह किसी और ने तैयार की है। उन्होंने कहा कि इस विश्वविद्यालय को इस मुकाम तक पहुँचाने में अच्युतानंद जी निर्णायक भूमिका थे। जो पचास एकड़ की हरी-भरी भूमि पर आज यह सभागार सजा है यह ज़मीन भी उन्हीं के कार्यकाल में खरीदी गई थी। एक तरफ उन्होंने हार्डवेयर मज़बूत किया भवन, भूमि, संसाधन। दूसरी तरफ सॉफ्टवेयर भी विचार, दृष्टि, परंपरा। कुलगुरु ने बताया कि जब वे इंदौर में नईदुनिया में कार्यरत थे और फिर भोपाल आए तो अच्युतानंद जी ने उन्हें एक ज़िम्मा सौंपा था मूर्धन्य पत्रकार बाबा रहुल बारपुते पर एक मोनोग्राफ बनाने का। बाबा भी एक असाधारण व्यक्तित्व थे बहुत अच्छे अभिनेता के साथ संगीत में उनकी रुचि थी कुमार गंधर्व उनके नियमित मित्र थे। जब वह मोनोग्राफ पूर्ण हुआ तब विजयदत्त श्रीधर जी ने इस किताब के लिए कहा था, "बाबा की मृत्यु के चौदह साल बाद आज उनका तर्पण हुआ है।"
फिर उन्होंने एक ऐसी बात कही जो बहुत गहरी थी, "कुछ विभूतियाँ ऐसी होती हैं जिनके पास बैठने की दक्षता भी आपको सिद्ध करनी पड़ती है।" यह वाक्य सुनकर मन में एक प्रश्न उठा क्या हम उस दक्षता को सिद्ध कर पा रहे हैं? एमपी ऑनलाइन की पूरी टीम भी वहाँ उपस्थित थी। बैटरी से चलने वाली गोल्फ कार्ट एमपी ऑनलाइन की तरफ से भेंट की गई एक संस्थागत उपहार जो इस आयोजन को और भी स्मरणीय बना गया।
अच्युतानंद जी का उद्बोधन जब इतिहास बोलने लगा -
विनय उपाध्याय ने जब अच्युतजी को आमंत्रित किया, तो कहा कि जिन आँखों में सपने होते हैं, उन आँखों में भविष्य होता है। नब्बे वर्ष के आसपास की आयु में भी सिर्फ बड़ा होना बड़ी बात नहीं, बड़प्पन दिखाना बहुत मायने रखता है। एक पंक्ति उन्होंने कही जो दिल को छू गई, "बड़ी इच्छा थी तुम्हारे निर्मल हृदय में डुबकी लगाने की, पर तुम्हारे चेहरे पर खड़े दंभ ने भीतर जाने नहीं दिया।" अच्युतानंद जी मंच पर आए। बैठे। और पहले ही वाक्य में उन्होंने अपनी आयु में सुधार किया और कहा, "मेरी आयु इकांवे वर्ष की है।" सभागार ठहाकों से भर गया। इस सहज हास्य के बाद जो व्याख्यान शुरू हुआ, वह किसी पाठ्यपुस्तक में नहीं मिल सकता।
उन्होंने कहा, "माखनलाल जी जिस दौर के संपादक थे, वह दौर बहुत अलग किस्म का था।" भारतीय पत्रकारिता में 1920 के आसपास के वर्षों को गाँधी-युग के नाम से जाना जाता है। उस युग के कुछ महान संपादकों का उन्होंने स्मरण किया सभी एक ही कालखंड के एक ही मिट्टी के बने थे।
एक युग की रीढ़ -
माधवराव सप्रे जी के बारे में अच्युतानंद जी ने कहा कि उन्हें केवल पत्रकार कहना बहुत छोटा होगा, वे एक विशाल नायक थे। 1911 की बात है माखनलाल जी का एक लेख कहीं छपा। उस लेख को पढ़कर सप्रे जी स्वयं खंडवा गए यह था उस युग की साहित्यिक दृष्टि जिसमें बिना किसी स्वार्थ के एक प्रतिभा की पहचान की जाती थी। सप्रे जी मराठी भाषी थे। किसी ने उनसे कहा, "आप मराठी हैं, आप मराठियों की सेवा कर सकते हैं।" तो सप्रे जी ने कहा, "मैं अपनी मौसी के घर पला-बढ़ा हूँ। हिंदी मेरी मौसी है।" यह वाक्य एक सांस्कृतिक प्रतिबद्धता का द्योतक था।
मध्यप्रदेश के खंडवा में दो चीज़ें मशहूर हैं: एक माखनलाल जी की समाधि जहाँ वे रहते थे और दूसरे संगीतकार किशोर कुमार जो वहीं के थे। जब माखनलाल जी जेल में बंद थे तभी उन्होंने पुष्प की अभिलाषा नाम से कविता लिखी। यह कविता आज भी पढ़ी जाए तो रोम-रोम में एक संकल्प जाग उठता है।
गणेश शंकर विद्यार्थी जी बनारस आते-जाते रहते थे। उनके एक और मित्र थे लक्ष्मीनारायण गर्दे। प्रताप अखबार का संपादन उनके बाद माखनलाल जी ने संभाला और उसी निर्भीक शैली से आगे बढ़ाया।
पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने रेलवे की नौकरी छोड़कर सरस्वती पत्रिका चलाई। और जब गणेश शंकर विद्यार्थी उनके साथ आए तो द्विवेदी जी ने कहा, "हम राजनीति से अलग हैं, हम राजनीति में नहीं पड़ेंगे।" इस पर विद्यार्थी जी ने विनम्र शब्दों में मना कर दिया।
भारत रत्न को ठुकराना
पाँचवें स्तंभ के रूप में अच्युतानंद जी ने पंडित हनुमान प्रसाद पोद्दार जी का स्मरण किया जिनका जन्मशताब्दी वर्ष चल रहा है, और वह "कल्याण" पत्रिका आज भी चल रही है। महात्मा गांधी ने पोद्दार जी से इस पत्रिका के लिए कहा कि इसमें कोई विज्ञापन मत छापना और कोई पुस्तक-समीक्षा भी मत छापना। यह परंपरा आज तक इस पत्रिका ने बनाए रखी है। फिर अच्युतानंद जी ने एक ऐसा प्रसंग सुनाया जो सभागार में बैठे सभी को आश्चर्य से भरा लगा।
पंडित गोविंद बल्लभ पंत जो मुख्यमंत्री के बाद गृह मंत्री बन चुके थे उन्होंने पोद्दार जी को फोन किया और कहा कि मुझे आपसे मिलना है, अपने घर का पता बताइए। पोद्दार जी ने कहा, "मेरा घर बड़ा छोटा है आप मंत्री हैं जहाँ आप रुके हैं मैं वहीं चला आऊँगा।" जब वे दोनों मिले तो पंत जी ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद का एक पत्र उन्हें दिया। उस पत्र में लिखा था कि अगले वर्ष से भारत सरकार पुरस्कार देना शुरू करेगी उसी कड़ी में आपको भारत रत्न दिया जाएगा। हनुमान प्रसाद पोद्दार ने शांति से मना कर दिया। पंत जी लौटते हुए रास्ते भर सोचते रहे कि, "मैं इतने बड़े आदमी को क्या देने गया था, भारत रत्न...!?"
एक और बात उन्होंने साझा की जब संस्कृति मंत्रालय ने गीताप्रेस गोरखपुर को दान देने की पेशकश की और प्रधानमंत्री स्वयं वहाँ जाने वाले थे तो गीताप्रेस वालों ने विनम्रता से मना कर दिया यह कह कर कि "आप आइए, स्वागत है, लेकिन हम दान नहीं लेते।"
संपादक का पतन एक सभ्यतागत संकट -
अच्युतानंद जी की बातों में एक गहरी चिंता भी थी। उन्होंने कहा कि 1952 के बाद पत्रकारिता में सबसे बड़ा परिवर्तन यह आया कि संपादक के पद का स्तर गिर गया और मालिक स्वयं संपादक बन गया। स्वाधीनता आंदोलन के वे अखबार एक-एक करके बंद होते गए। जनसत्ता अखबार का एक प्रसंग उन्होंने सुनाया जब कर्मचारियों में असंतोष था और वे मोरारजी देसाई के पास गए। मोरारजी ने कहा, "गोयनका बात तो सुनता नहीं है"। जब गोयनका जी से बात हुई तो उन्होंने कहा कल ही तो हमने तुम्हें प्रधानमंत्री बनवाया है, तुम इनकी बात क्यों सुनते हो?"
शिवपूजन सहाय जिन्होंने प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद की जीवनी लिखी थी। राष्ट्रपति बनने के बाद राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें पद्मभूषण दिया तो सहाय जी दिल्ली नहीं जा पाए। जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने कहा कि, "सम्मान तो ठीक है, लेकिन दिल्ली पहुँचने तक के पैसे नहीं भिजवाए।" यह कोई शिकायत नहीं थी यह उस युग के नैतिक स्तर की एक झलक थी। शिवपूजन सहाय ने कहा था कि राष्ट्रपति ने याद किया यह बड़ी बात है।
अच्युतानंद जी ने गहरे दर्द के साथ कहा, "जबसे मालिक संपादक बन गए, पत्रकारिता में वह नैतिक स्तर खत्म होने लगा। जब किसी के मन में बड़ी महत्त्वाकांक्षा पलने लगती है तो उसका मन छोटा होने लगता है सुविधाएँ दिखती हैं और सब गलत काम करने लगते हैं।"
एआई और नैतिकता का प्रश्न -
अच्युतानंद जी ने अपने व्याख्यान के अंत में एक नई बात छेड़ी AI ने जो करिश्मा किया है और जो कर रहा है वह बच्चों को पढ़ाया जाना चाहिए। लेकिन साथ ही उन्होंने गहरा सवाल भी उठाया, "जिस नैतिक स्तर की हम बात कर रहे हैं, उस नैतिक स्तर की पत्रकारिता करना चाहिए या नहीं? यह बड़ा गंभीर विषय है। उस दौर के लोग कैसे थे उन्हें एक आदर्श बनाकर हम रख तो सकते हैं लेकिन उनकी नैतिकता को हमारे अंदर बनाए कैसे रख सकते हैं? यह सब एक गहन विमर्श का विषय है।"
रतौना का किस्सा
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे राज्य निर्वाचन आयुक्त मनोज श्रीवास्तव ने जब बोलना शुरू किया तो उन्होंने कहा, "मुझे रश्क होता है अच्युतानंद जी की स्मृति पर।" उन्होंने बताया कि 1907 के भरतपुर सम्मेलन में माखनलाल चतुर्वेदी जी ने जो कहा था वह इस विश्वविद्यालय की नींव का एक बीज था, "पत्रकारिता एक शस्त्र है और उसकी विद्यापीठ बननी चाहिए।" 1991 में जब यह विश्वविद्यालय बना तो माखनलाल जी ने सबसे पहले यह कल्पना देखी थी। 1908 में सीडीशन एक्ट, 1910 में प्रेस एक्ट और फिर रॉलेट एक्ट यानी कलम उठाना खड्ग उठाने से कम नहीं था। समाचार-पत्र निकालना ही राजद्रोह माना जाता था। प्राणों की बाज़ी का व्यापार था। कुछ ऐसे पत्रकार थे जिन्हें पत्रकार होने के कारण देश से निर्वासित कर दिया गया था राजा महेंद्र प्रताप, सैयद हसन और भी कई नाम थे। माखनलाल जी ने कर्मवीर का प्रकाशन शुरू किया तो उसका नाम भी संभवतः भगवद्गीता के कर्मयोग से प्रेरित था। फिर रतौना का वह किस्सा जब एक कसाईखाना खुलने वाला था और माखनलाल जी ने लेखों की एक ऐसी श्रृंखला लिखी जिसके कारण बड़ा आंदोलन उठ खड़ा हुआ और अंग्रेज़ों को घुटने टेकने पड़े। रतौना में खुलने वाला कसाईखाना फिर कभी शुरू ही नहीं हो पाया।
तेहरान प्रसंग जब माखनलाल जी वहाँ गए तो उन्होंने लिखा कि तेहरान के बाज़ारों में सिख, हिंदू, पारसी और भारतीय मुसलमान थे। वहाँ लखनऊ का एक शिया मुसलमान जोर से "वंदे मातरम" चिल्लाने लगा था। भारतीय मज़दूर जहाँ भी जाएगा वंदे मातरम ही कहेगा।
संस्थागत साहस आज की माँग -
उन्होंने कहा कि माखनलाल जी को जब मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद की पेशकश की गई तो उन्होंने यह कहकर मना कर दिया, "पत्रकार अगर सत्ता का अंग हो जाए तो उसके अंदर का पत्रकार खत्म हो जाता है।" मनोज श्रीवास्तव का सबसे महत्त्वपूर्ण कथन था, "व्यक्तिगत साहस के अलावा पत्रकारिता में आज इंस्टीट्यूशनल करेज होना चाहिए।" यानी केवल एक पत्रकार का साहसी होना काफी नहीं पूरी संस्था का पूरे संगठन का उस साहस में भागीदार होना बहुत ज़रूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रताप के मुखपृष्ठ पर बड़ा सुंदर लिखा रहता था और वह अखबार उस अंधकार में प्रकाश की तरह था।
विनय उपाध्याय ने अंत में जो कहा, वह एक आईना था। उन्होंने मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में कहा, "हम क्या थे, क्या हो गए, और क्या होंगे अभी?" कार्यक्रम पश्चात कुछ प्रश्न हवा में लटके रह गए। कोई जवाब नहीं आया। शायद जवाब हम सब अपने भीतर ढूंढ रहे है।
एक ऋण का बोध -
कुलसचिव पी. शशिकला मैम ने आभार व्यक्त किया। उन्होंने बताया कि कंप्यूटर और संचार विभाग को एक साथ लाने वाले अच्युतानंद जी ही सबसे पहले कुलपति थे। इससे पहले विश्वविद्यालय में महानिदेशक का पद होता था। उन्होंने और ओ.पी. दुबे सर ने मिलकर 2005-10 के बीच अनेक रेगुलेशंस फ्रेमवर्क तैयार किए। बाहर निकलते हुए मन हल्का भी था, भारी भी। हल्का इसलिए कि उस विरासत से परिचय हुआ। भारी इसलिए कि यह प्रश्न पीछा नहीं छोड़ रहा था कि क्या हम उस विरासत के योग्य हैं भी? जो पचास एकड़ की हरी-भरी ज़मीन पर यह विश्वविद्यालय खड़ा है, वह केवल भूमि नहीं है वह एक सपने की ज़मीन है। उस सपने को देखने वाले आज 91 वर्ष के हैं। और उनके जाने के बाद उस सपने की रखवाली हम जैसों को करनी है।
यह कार्यक्रम केवल एक स्मृति व्याख्यान नहीं था। यह एक चुनौती थी उस पत्रकारिता को जीवित रखने की जिसमें कलम खड्ग से कम नहीं थी। जिसमें संपादक सत्ता का दास नहीं था। जिसमें मुख्यमंत्री पद से लेकर भारत रत्न जैसा पुरस्कार भी ठुकराया जा सकता था लेकिन सत्य से समझौता नहीं किया जाता था।
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