शेखर जैन एक मददगार फरिश्ता

(नैवेद्य पुरोहित)
आज के कॉर्पोरेट दौर में जहाँ 'नेटवर्किंग' और 'रेफरल' जैसे भारी-भरकम शब्द चलते हैं लेकिन हम उस दौर की बात कर रहे है जब सिर्फ एक 'भरोसा' काफी होता था। वर्षा जोशी (शादी के पहले उनका सरनेम दुबे था अब वे जोशी है) के सफर में शेखर जैन का नाम सिर्फ एक सहकर्मी का नहीं, उस 'फरिश्ते' का है जिसने एक अनजान रास्ते पर मशाल थाम रखी थी।
सिलाई सेंटर की उन आम मुलाकातों के बाद जब वर्षा पहली बार शेखर जैन से मिलीं, तो उनके मन में ढेरों आशंकाएं थीं। महू जैसे छोटे शहर से निकलकर इंदौर के एक उभरते हुए अखबार के दफ्तर में जगह बनाना किसी चुनौती से कम नहीं था। लेकिन शेखर का व्यक्तित्व ही ऐसा था कि पहली ही मुलाकात में वर्षा का डर काफूर हो गया।
वे याद करती हुए कहती हैं कि शेखर जी ने उनकी बात सुनकर उसे समझा भी। उनकी दोस्त ने बस एक बार कहा था कि मेरे हसबैंड करा देंगे वो वहां सबको जानते हैं और सच में तीन दिन के भीतर वर्षा की जॉब लग गई थी।
यह वह दौर था जब दैनिक भास्कर अपनी टीम खड़ी कर रहा था। अनुभवी लोगों की भीड़ में एक नई लड़की को मौका दिलवाना और उस पर भरोसा जताना शेखर जी की दूरदर्शिता ही थी। उन्होंने वर्षा को प्रेस की उस भागदौड़ भरी दुनिया में उन्हें एक अभिभावक जैसा सहारा भी दिया।
अखबार की दुनिया में अक्सर लोग संपादकों और रिपोर्टरों के नाम जानते हैं लेकिन पर्दे के पीछे शेखर जैन जैसे लोग भी थे। जो नए हुनर को तराशने और उन्हें सही जगह पहुँचाने का काम खामोशी से कर रहे थे। वर्षा जोशी के लिए वह दफ्तर काम की जगह नहीं था अब शेखर जी जैसे लोगों की वजह से एक 'परिवार' भी बन गया था।
आज जब वह पीछे मुड़कर देखती हैं तो उनकी आवाज़ में शेखर जैन के लिए वही पुराना आदर छलक आता है। वह मानती हैं कि अगर उस दिन वह मुलाकात न होती और शेखर जी ने हाथ न थामा होता, तो शायद 'महू वाली मैडम' का यह सफर कभी शुरू ही नहीं होता।
(अगली किस्त में पढ़िए: महू से इंदौर की वह सुबह जब संघर्ष 6:30 बजे की ट्रेन से शुरू होता था। हम महसूस करेंगे महू-इंदौर ट्रेन की वो सर्द सुबह और एक युवती का अपने सपनों के लिए रोज़ाना वह लंबा सफर।) #दैनिक_भास्कर_इंदौर_लॉन्चिंग_टीम_के_गुमनाम_नायक #सीरीज_21 #डीबी_कॉर्प #गुमनाम_नायक #वर्षा_जोशी

Comments

Popular posts from this blog

20 की उम्र में चारधाम पूरे, रिश्तों का पंचधाम भी जी लिया!

जड़ों से जुड़ाव की पुकार: एक बार फिर कुलदेवता के दरबार में!

मन की शांति का रहस्य: स्वीकार्यता है!