महू से इंदौर की वह सुबह 6:30 बजे रोज़ाना ट्रेन से शुरू हुआ संघर्ष
(नैवेद्य पुरोहित)
वर्क फ्रॉम होम के इस दौर के पहले एक संघर्ष का दौर था जहाँ अनुशासन ही सफलता की पहली शर्त थी। वर्षा जोशी के लिए दैनिक भास्कर का दफ्तर सिर्फ साढ़े आठ बजे शुरू नहीं होता था उसकी तैयारी तो तड़के अंधेरे में ही शुरू हो जाती थी। महू की सर्द सुबहें और नींद से बोझिल आँखें, लेकिन दिल में एक ज़िम्मेदारी का अहसास महसूस करते हुए वे कहती है कि उनकी दिनचर्या का सबसे अहम हिस्सा सुबह 6:30 बजे की वह पैसेंजर ट्रेन हुआ करती थी।
महू स्टेशन पर भाप छोड़ते इंजन और डिब्बों की खचाखच भीड़ के बीच एक युवती अपनी जगह बना रही थी। करीब एक घंटे के आसपास का वह सफर, जिसमें पटरियों की आवाज़ के साथ वर्षा के मन में आने वाले दिन के काम का खाका खिंचता रहता था। साढ़े सात बजे इंदौर स्टेशन पर उतरना और वहां से तेज़ी से कदमों को बढ़ाते हुए ठीक 8:00 बजे तक प्रेस पहुँच जाना उनकी नियति बन गई थी। हैरानी की बात यह थी कि उनकी आधिकारिक ड्यूटी सुबह 8:30 या 9:00 बजे से शुरू होती थी, लेकिन वर्षा हमेशा आधा घंटा पहले दफ्तर में मौजूद होती थीं। यह वह दौर था जब काम सिर्फ 'शिफ्ट' पूरी करना नहीं था एक संस्थान के प्रति जज्बा हुआ करता था।
वे कहती हैं, "मुझे कठिनाई कुछ नहीं थी, बस वो एक रूटीन बन गया था।" महू से इंदौर का वह सफर एक छोटे शहर की लड़की का अपने सपनों और ज़िम्मेदारियों के प्रति तय किया गया वह लंबा रास्ता था, जिसने उन्हें 'महू वाली मैडम' की मज़बूत पहचान दी। खाली दफ्तर में सबसे पहले पहुँचकर मशीनों के बीच उस सन्नाटे को महसूस करना और फिर काम की आपाधापी में खुद को झोंक देना ही उनके समर्पण की जीती-जागती मिसाल थी।
(अगली किस्त में पढ़िए: कंपोजिंग विभाग की बारीकियां जब शब्दों को हाथ से संवारा जाता था। अखबार के पन्ने 'डिजिटल क्लिक' से नहीं बल्कि कड़ी मेहनत और प्रूफ रीडिंग की पैनी नज़र से तैयार होते थे।)
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