इंदौर शहर के कुंवर मंडली मोहल्ले में 30 वर्षों से अनवरत जारी है सार्वजनिक बच्चा महावीर हनुमान मंदिर का भव्य भंडारा
(नैवेद्य पुरोहित)
शहर के हृदयस्थल राजबाड़ा क्षेत्र के समीप खजूरी बाज़ार के पीछे कुंवर मंडली नाम के मोहल्ले में स्थित सार्वजनिक बच्चा महावीर हनुमान मंदिर आस्था का केंद्र तो है ही इसके अलावा यह स्थान निस्वार्थ सेवा की एक ऐसी मिसाल बन चुका है जिसे देखते-देखते तीन दशक बीत चुके हैं। साल 1996 में भक्ति का जो छोटा सा सिलसिला शुरू हुआ था, वह आज 2026 में अपने 30वें वर्ष में प्रवेश कर एक भव्य और विशाल स्वरूप ले चुका है।
संकट के दौर में भी नहीं थमी सेवा की राह -
वर्तमान में जहाँ विश्व स्तर पर युद्ध जैसी स्थितियाँ हैं और गैस सिलेंडरों की भारी किल्लत के कारण आम जनजीवन प्रभावित है, ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में भी कुंवर मंडली के इस क्षेत्र में भंडारे की परंपरा अटूट बनी हुई है। संसाधनों की कमी और बढ़ती महंगाई के बावजूद, यहाँ की सेवा भावना में कोई कमी नहीं आई है।
पालीवाल समाज के साथियों ने रखी थी नींव -
इस ऐतिहासिक कारवां की शुरुआत ग्राम सालेरा के श्यामसुंदर जोशी और उनके सहयोगी ग्राम उथनोल के स्वर्गीय दुर्गाशंकर जोशी ने मिलकर की थी। उस समय इन दोनों महाुभावों ने मिलकर जो 'गैंती' चलाई थी और कड़ी मेहनत की थी, उसी का परिणाम है कि आज यह आयोजन इतने भव्य स्तर पर पहुंच गया है। शुरुआत में इनके साथ बच्चों और युवाओं की एक पूरी टीम थी, जिसने इस सेवा कार्य को अपना मिशन बना लिया था।
समर्पित टीम और नई पीढ़ी का जोश -
आज अगर इस विशाल भंडारे के पीछे छिपे चेहरों की बात की जाए, तो एक लंबी फेहरिस्त है जिन्होंने अपनी मेहनत से इसे सींचा है। इनमें दिलीप जोशी, योगेंद्र जोशी (बबलू), मोहन दवे (भाऊ), कैलाश दवे, सुरेश दवे, पुखराज दवे, रवि जोशी, प्रवीण जोशी, अरविंद बागरेचा, मनीष शर्मा, गुड्डू भैया, कपिल व्यास, शीतल व्यास, रोहित जोशी, सुरेश जोशी और प्रमोद पालीवाल जैसे नाम प्रमुख हैं। संतोष की बात यह है कि अब इस कार्य की कमान नई पीढ़ी ने भी बखूबी संभाल ली है, जो पूरे जोश और उत्साह के साथ इस आयोजन को भव्यता प्रदान कर रही है।
स्वाद का जादू: विरासत आज भी बरकरार -
मंदिर का श्रृंगार इतना मनमोहक होता है कि इसे देखने दूर-दूर से श्रद्धालु खिंचे चले आते हैं। लेकिन इस आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ की 'भोजन प्रसादी' है। प्रसादी का स्वाद ऐसा है कि लोग श्रद्धापूर्वक डब्बे भर-भर कर अपने घर ले जाते हैं। इस बेमिसाल स्वाद की नींव प्रख्यात हलवाई रहे रिटायर्ड बैंक अधिकारी स्वर्गीय नारायण दवे (गुरु) ने रखी थी। आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके सुयोग्य सुपुत्र सुरेश नारायण दवे के हाथों का जादू वही पुराना स्वाद आज भी जिंदा रखे हुए है। चाहे वह मशहूर रामभाजी हो या चटपटा रायता, हर व्यंजन का स्वाद श्रद्धालुओं की जुबान पर चढ़ा हुआ है।
यह भंडारा केवल भोजन का वितरण नहीं बल्कि एकता, भक्ति और सेवा का वह जीवंत उदाहरण है जो पिछले 30 सालों से राजबाड़ा की गलियों में गूंज रहा है।
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