कंपोजिंग विभाग में हाथों से शब्द संवरते

(नैवेद्य पुरोहित)
आज खबर लिखना और उसे वेबसाइट या अखबार के पन्ने पर सजाना बस कुछ 'क्लिक्स' का खेल है। लेकिन 1983 के उस दौर में एक-एक शब्द को अखबार के पन्ने तक पहुँचाना किसी तपस्या से कम नहीं था। इसी तपस्या का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव'कंपोजिंग विभाग' हुआ करता था। महू की पैसेंजर ट्रेन से उतरकर जब वर्षा जोशी प्रेस पहुँचतीं, तो उनके सामने चुनौतियों का एक नया संसार होता था। वह दौर कंप्यूटर क्रांति की शुरुआती आहटों का था। 'फोटो-टाइपसेटिंग' और 'कंपोजिंग मशीनों' का बोलबाला था। वर्षा याद करती हैं कि उनका काम सिर्फ टाइपिंग करना नहीं था, बल्कि उन 'लेटर्स' (अक्षरों) को बनाना और उन्हें स्क्रीन पर सही ढंग से उतारना था।
वह बताती हैं, "हम लेटर बनाते थे, जो पेपर निकलता है उसकी रीडिंग और स्क्रीन पर हम उसे निकालते थे।" सोचिए एक छोटी सी गलती और पूरा कॉलम खराब हो सकता था। आज की तरह 'डिलीट' या 'बैकस्पेस' जितना आसान नहीं था। कंपोजिंग रूम की वह स्क्रीन जिस पर चमकते हुए अक्षर वर्षा की उंगलियों के इशारे पर नाचते थे वहीं से कल की सुर्खियां जन्म लेती थीं। टाइपिंग के बाद उन पन्नों की बारीक 'प्रूफ रीडिंग' होती थी। शब्दों की अशुद्धियां पकड़ना और यह सुनिश्चित करना कि पाठकों तक पहुँचने वाली भाषा शुद्ध रहें।
अखबार का वह कोलाहल, मशीनों की वह खास महक और अपनी सीट पर बैठकर घंटों स्क्रीन की रोशनी में शब्दों को संवारना यही वर्षा की दुनिया थी। उनके पास न केवल टाइपिंग की रफ़्तार थी बल्कि भाषा की वह पैनी समझ भी थी जो एक कंपोजिटर को 'कलाकार' बना देती है।
काम का दबाव बहुत रहता है लेकिन जब सुबह वह छपा हुआ अखबार हाथ में आता है तो मेहनत को उन पन्नों पर देखकर कई लोगों की थकान मिट जाती है। शब्दों के उस कारखाने में वर्षा एक ऐसी कारीगर थीं जिनकी उंगलियों ने भास्कर के शुरुआती सालों के सैंकड़ों पन्ने बुने थे।
(अगली किस्त में पढ़िए: पुरुष प्रधान क्षेत्र में 'नारी शक्ति' जब तीन लड़कियों ने बदली प्रेस की रवायत। प्रेस को सिर्फ पुरुषों का गढ़ माना जाता था तब वर्षा जी और उनकी सखियों ने वहां अपनी जगह कैसे बनाई।) #दैनिक_भास्कर_इंदौर_लॉन्चिंग_टीम_के_गुमनाम_नायक #सीरीज_23 #डीबी_कॉर्प #गुमनाम_नायक #वर्षा_जोशी

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