'स्मैश' का उदय: एक खेल पत्रकार ने अपनी स्वतंत्र राह चुनी
(नैवेद्य पुरोहित)
जब कलम को स्वाभिमान की स्याही मिल जाती है, तो वह किसी की गुलामी नहीं करती। प्रभातकिरण से 10 साल का रिश्ता टूटने के बाद धर्मेश यशलहा के सामने दो रास्ते थे या तो किसी और संस्थान की चौखट पर दस्तक दें या फिर अपनी जमीन खुद तैयार करें। उन्होंने दूसरा रास्ता चुना और जन्म हुआ 'स्मैश'पत्रिका का जो सिर्फ एक मैगजीन नहीं थी, यह इंदौर की पत्रकारिता में एक खेल पत्रकार का 'साहसिक प्रयोग' था।
शुरुआत में 'स्मैश' एक त्रैमासिक पत्रिका के रूप में आई, जो जल्द ही अपनी लोकप्रियता के कारण मासिक हो गई। धर्मेश की सोच इसे सिर्फ खेल तक सीमित रखने की नहीं थी। वे इसे 'इंडिया टुडे' की तर्ज पर एक 'कम्प्लीट मैगजीन' बनाना चाहते थे।
धर्मेश बताते हैं, "मैंने 'स्मैश' में सिर्फ बैडमिंटन और खेल नहीं रखा, बल्कि इसमें राजनीति, मनोरंजन, बैंकिंग, साइबर सुरक्षा, महिला सरोकार और स्वास्थ्य पर भी विशेष पन्ने होते थे।" एक ही छत के नीचे खेल के साथ-साथ गंभीर विषयों का यह संगम पाठकों को खूब रास आया।
बिना किसी बड़े कॉर्पोरेट सपोर्ट के, अपने दम पर एक ऐसी पत्रिका निकालना जो हर क्षेत्र की खबर रखे, यह जुनून का ही नतीजा था। धर्मेश यशलहा खुद इसकी एडिटिंग संभालते, लेखकों से जुड़ते और विज्ञापन से लेकर वितरण तक की बारीकियाँ देखते। 'स्मैश' ने इंदौर की पत्रकारिता को एक नया नजरिया दिया कि एक खेल पत्रकार भी राजनीति और तकनीक पर उतनी ही पकड़ रख सकता है जितनी मैदान पर।
लगभग तीन दशकों तक इस 'सपने' को अपने खून-पसीना से सींचते रहे। लेकिन वक्त की मार और आर्थिक चुनौतियों ने दस्तक दी। धर्मेश कहते हैं, "कोरोना काल के पहले तक मैंने इसे निरंतर निकाला, लेकिन फिर आर्थिक कारणों से इसे बंद करने का फैसला लेना पड़ा।" भले ही 'स्मैश' का छापाखाना रुक गया, लेकिन धर्मेश यशलहा की कलम की रफ़्तार नहीं रुकी। आज भी वे व्हाट्सएप और फेसबुक के जरिए उसी धार के साथ अपनी टिप्पणियां और समीक्षाएं साझा करते हैं।
(अगली किस्त में पढ़िए: दैनिक भास्कर के साथ 'सेकंड इनिंग' और हैदराबाद में वर्ल्ड चैंपियनशिप का वो ऐतिहासिक सफर!)
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