नब्बे के दशक की पत्रकारिता में वर्क फ्रॉम होम का वो ज़माना
(नैवेद्य पुरोहित)
आज के दौर में हम 'वर्क फ्रॉम होम' को तकनीक की देन मानते हैं, लेकिन 1985 से 1995 के दशक में इंदौर का एक पत्रकार अपने घर में बैठकर पूरे शहर की खेल पत्रकारिता की दिशा तय कर रहा था। यह करिश्मा मुमकिन हुआ था धर्मेश यशलहा की अटूट साख और सांध्य दैनिक 'प्रभातकिरण' अखबार के उन पर बेइंतहा भरोसे की वजह से। दैनिक भास्कर से इस्तीफा देने के बाद, युवा धर्मेश का अगला पड़ाव सांध्य दैनिक 'प्रभातकिरण' था, जहाँ उनके 10 साल किसी 'शाही' पत्रकारिता से कम नहीं थे।
सोचिए, वो दौर जब न व्हाट्सएप था न ईमेल और न ही इंटरनेट। खबरें हाथों-हाथ पहुँचाई जाती थीं। ऐसे में प्रभातकिरण अखबार के प्रबंध संपादक प्रभात सोजतिया, मालिक स्वर्गीय ओमप्रकाश सोजतिया और संपादक प्रकाश पुरोहित ने धर्मेश यशलहा को वो सुविधा दी, जो शायद ही किसी और को कभी नसीब हुई हो।
धर्मेश बताते हैं, "मेरे काम की वजह से उन लोगों के भरोसे का आलम यह था कि प्रभातकिरण का चपरासी रोज़ सुबह मेरे घर आता था। मैं रातभर का पूरा खेल मेटर और ले-आउट तैयार रखता था। वो चपरासी मेरे घर से सारा कॉन्टेंट लेकर जाता और दोपहर तक अखबार में वो ताजी खबरें छप जाती थीं।"
उस समय शहर से बाहर मेल भेजना भी एक बड़ा टास्क था, लेकिन धर्मेश के घर का दरवाजा खेल संगठनों के पदाधिकारियों और खिलाड़ियों के लिए हमेशा खुला रहता था। देर रात तक लोग खुद खबरें और फोटो लेकर उनके पास पहुँचते थे। उनका घर ही एक छोटा-सा 'न्यूजरूम' बन गया था।
वे याद करते हुए कहते हैं, "मैं घर से ही आधा पेज पूरा तैयार करके भेजता था। शाम के अखबार में बासी खबरें न जाएं, इसका पूरा जिम्मा मेरा होता था।"
(अगली किस्त में पढ़िए: आखिर वो कौन से कॉलम थे जिन्होंने 'प्रभातकिरण' में धर्मेश जी को एक अलग ही पहचान दिलाई? खेल जगत की वो 'खोजी' खबरें और अंदरूनी सच्चाइयां जिनसे खेल संगठनों के बड़े-बड़े सूरमा भी घबराते थे। )
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