संघर्षों की 'गुल्लक' और स्वाभिमान की 'लूना'
(नैवेद्य पुरोहित)
कहते हैं कि इंसान की फितरत और उसकी नींव बचपन में ही पड़ जाती है। धर्मेश यशलहा की शख्सियत में जो 'न झुकने' वाला तेवर है, उसकी जड़ें उनके घर के कड़े अनुशासन में छिपी थीं। जब सपने बड़े थे पर जेब छोटी लेकिन धर्मेश ने कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया।
धर्मेश के पिता एक सरकारी स्कूल में शिक्षक थे। अनुशासन के पक्के और फिजूलखर्ची के सख्त खिलाफ। युवा धर्मेश को बैडमिंटन का जुनून सवार था लेकिन उस दौर में यह रईसों का खेल माना जाता था। घर से आर्थिक मदद की उम्मीद नहीं थी। धर्मेश बताते हैं, "मुझे शौक था पर उसे पूरा करने का रास्ता खुद बनाना था। मैंने अपनी गुल्लक में एक-एक पैसा जमा करना शुरू किया। जब पर्याप्त पैसे हुए, तब जाकर मैंने अपना पहला बैडमिंटन रैकेट और शटल खरीदी।"
धर्मेश का शुरुआती रुझान विज्ञान की तरफ था। उन्होंने स्कूल में साइंस-मैथ्स लिया था और इंजीनियर बनना चाहते थे। लेकिन यहाँ भी उनके 'सिद्धांत' बीच में आ गए। वे 'अंग्रेजी हटाओ' आंदोलन के सिपाही थे और उस वक्त विज्ञान की सारी पढ़ाई अंग्रेजी में होती थी। अपने भाषाई स्वाभिमान की खातिर उन्होंने रातों-रात अपना रास्ता बदला और आर्ट्स विषय चुन लिया। बाद में फिर क्रिश्चियन कॉलेज इंदौर से पॉलिटिकल साइंस में मास्टर्स की डिग्री हासिल की। यहीं से उनके जीवन में पत्रकारिता के बीज पड़े।
कॉलेज के दौरान ही उन्होंने काम करना शुरू कर दिया था। जब स्वदेश, दैनिक भास्कर और अन्य अखबारों से पहली कमाई आनी शुरू हुई तो उन्होंने सबसे पहले अपनी सहूलियत के लिए एक 'लूना' गाड़ी खरीदी। एक तरफ नेहरू स्टेडियम में बैडमिंटन की कोचिंग शुरू हो रही थी और दूसरी तरफ पत्रकारिता की जमीन तैयार हो रही थी। धर्मेश यशलहा अंडर-19 के स्तर पर सिर्फ डेढ़ साल बैडमिंटन खेल पाए क्योंकि जब खेलने का जुनून था तब पैसे नहीं थे और जब पैसे आए तब समय की कमी हो गई। उन्होंने हार नहीं मानी और कोच बनकर दूसरों के सपने सच करने में जुट गए।
(अगली किस्त में पढ़िए: पत्रकारिता का वो 'शाही' दौर, सांध्य दैनिक प्रभातकिरण के वो 10 साल जहाँ धर्मेश जी घर बैठे खेल संपादक की भूमिका निभाते थे और दफ्तर का चपरासी मेटर लेने उनके घर आता था।)
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