खेल डेस्क संभालने वालों का खौफ और संपादक यतीन्द्र भटनागर का भरोसा

(नैवेद्य पुरोहित)
अखबार की दुनिया में 'कॉपी' (खबर) पर लाल पेन चलाने का हक सिर्फ संपादक को होता है लेकिन दैनिक भास्कर इंदौर के उस शुरुआती दौर में एक नौजवान ऐसा भी था जिसकी उंगली अगर खेल डेस्क की किसी गलती पर उठ जाए, तो संपादक की मेज तक बात पहुँचना लाजिमी था।
यतीन्द्र भटनागर जी एक संपादक होने के साथ पारखी जौहरी भी थे। उन्होंने भांप लिया था कि धर्मेश यशलहा नाम का डाक विभाग में बैठा यह कॉलेज का छात्र सिर्फ चिट्ठियां नहीं छांटेगा बल्कि इसकी नजरें चील की तरह खबरों की 'खामियों' को ताड़ ले आएगी।
धर्मेश को स्पोर्ट्स की रग-रग की जानकारी थी। इसी काबिलियत को देखते हुए संपादक यतीन्द्र भटनागर ने उन्हें एक गोपनीय 'विशेषाधिकार' दिया था। डाक के काम के साथ-साथ खेल विभाग की खबरों पर भी पैनी नजर रखने का जहाँ भी गलती दिखे, सीधे संपादक को इख़्तिला करना।
एक तरफ खेल डेस्क के धुरंधर थे और दूसरी तरफ एक युवा छात्र। धर्मेश बताते हैं, "यतीन्द्र जी मुझ पर इतना भरोसा करते थे कि मेरी पकड़ी गई गलतियों के आधार पर खेल विभाग के लोगों को डांट सुननी पड़ती थी।"
खिलाड़ियों के नाम की स्पेलिंग हो, स्कोरबोर्ड का गणित हो या खेल की तकनीकी शब्दावली उनकी पकड़ बेजोड़ थी। धीरे-धीरे हालत यह हो गई कि खबरों को पन्ने पर भेजने से पहले लोग कई-कई बार जांचने लगे थे। धर्मेश का अनुशासन और 'साफगोई' उनकी पहचान थी। किसी गुटबाजी का हिस्सा नहीं बने, बस अपना काम पूरी शिद्दत से करते रहे। इसीलिए 'गुमनाम नायकों' की फेहरिस्त में यह नाम आज भी सबसे अलग खड़ा है।
(अगली किस्त में पढ़िए: आखिर क्यों इस होनहार पत्रकार और एक उभरते हुए संस्थान के रास्ते हमेशा के लिए जुदा हो गए...डेढ़ साल की नौकरी के बाद धर्मेश यशलहा ने दैनिक भास्कर से इस्तीफा क्यों दे दिया था ?) #दैनिक_भास्कर_इंदौर_लॉन्चिंग_टीम_के_गुमनाम_नायक #सीरीज_11 #डीबी_कॉर्प #गुमनाम_नायक #धर्मेश_यशलहा

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