कलम और शटल का संगम

(नैवेद्य पुरोहित)
बात 1980 के उस दौर की है, जब इंदौर की गलियों में सुबह की ताजी हवा के साथ अखबारों की सरसराहट एक अलग ही सुकून देती थी। इसी दौर में एक नौजवान, जिसकी आँखों में सियासत की समझ थी और हाथों में बैडमिंटन का रैकेट, इंदौर की पत्रकारिता के फलक पर अपनी दस्तक दे रहा था। वो नाम था धर्मेश यशलहा।
ये दास्तां सिर्फ एक अखबार की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे 'जुनून' का किस्सा है जहाँ कलम और शटल एक साथ परवान चढ़ रहे थे। धर्मेश यशलहा की पत्रकारिता के सफर का आगाज़ 1980 में 'स्वदेश' अखबार से हुआ। जब उनका एक लेख प्रकाशित हुआ। उस वक्त वे क्रिश्चियन कॉलेज में राजनीति विज्ञान के छात्र थे। जहन में 'जनता पार्टी' के उसूल थे और दिल में 'अंग्रेजी हटाओ' आंदोलन की आग। उन्होंने जेल भरो आंदोलनों में भी शिरकत की, लेकिन जल्द ही समझ आ गया कि सियासत की गलियां उनके लिए नहीं बनीं है। उन्हें तो लफ्ज़ों की बाजीगरी और मैदान की फुर्ती रास आती थी।
इंदौर का नेहरू स्टेडियम उस वक्त खेलप्रेमियों की धड़कन हुआ करता था। धर्मेश जी बताते हैं कि उन्होंने पत्रकारिता और बैडमिंटन, दोनों का दामन इसी मैदान की मिट्टी में एक साथ थामा। एक तरफ वे खिलाड़ियों के खेल को करीब से देख रहे थे, तो दूसरी तरफ उनकी कलम उन बारीकियों को कागज पर उतार रही थी। एक छात्र के रूप में उनकी पढ़ाई और एक पत्रकार के रूप में उनकी ड्यूटी, दोनों के बीच का संतुलन काबिले-तारीफ था।
शौक पालना आसान होता है, लेकिन उसे खुद के दम पर जिन्दा रखना एक बड़ी चुनौती। धर्मेश के घर में अनुशासन का सख्ती से पालन होता था। पिताजी शिक्षक थे जिन्होंने कभी फिजूलखर्ची को बढ़ावा नहीं दिया। ऐसे समय युवा धर्मेश ने अपनी गुल्लक में एक-एक पैसा जमा किया ताकि वे अपना पहला रैकेट और शटल खरीद सकें। आज के दौर के बच्चे शायद इस कशमकश को न समझें, लेकिन उस दौर में एक-एक पाई जोड़कर अपनी पहली 'लूना' गाड़ी खरीदना किसी जंग जीतने से कम नहीं होता था।
जब धर्मेश यशलहा दैनिक भास्कर इंदौर की लॉन्चिंग टीम में आए, तो उनके काम के प्रति बेहद संजीदगी को देखते हुए संपादक यतीन्द्र भटनागर साहब ने उन्हें एक खास जिम्मेदारी सौंपी। उन्होंने देखा कि धर्मेश जी को खेल की गहरी समझ है, तो उन्होंने खेल विभाग की खबरों की गलतियों पर नज़र रखने की गोपनीय जिम्मेदारी दे दी।
बस फिर क्या था! खेल विभाग के पुराने धुरंधरों के लिए धर्मेश आंखों में खटकने लग गए। वे ऐसी बारीक गलतियाँ पकड़ते कि खेल विभाग के लोगों को अक्सर डांट खानी पड़ती थी। (अगली किस्त में पढ़िए: स्वाभिमान और सिद्धांतों के धनी धर्मेश जी ने कभी जी-हजूरी नहीं की, वे सिर्फ अपना काम जानते थे।) #दैनिक_भास्कर_इंदौर_लॉन्चिंग_टीम_के_गुमनाम_नायक #सीरीज_09 #डीबी_कॉर्प #गुमनाम_नायक #धर्मेश_यशलहा

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