इंदौर में 'दैनिक भास्कर' के शुरुआती समय एक कॉलेज छात्र संभाल रहा था डाक विभाग

(नैवेद्य पुरोहित)
5 मार्च 1983 को जब दैनिक भास्कर ने इंदौर की सुबह में अपनी दस्तक दी, तो उसके पीछे महीनों की कड़ी मेहनत और एक ऐसी टीम का जुनून था जिसे यतीन्द्र भटनागर जी बड़े जतन से तैयार कर रहे थे। इसी टीम के एक 'गुमनाम नायक' है धर्मेश यशलाहा। आज जब धर्मेश जी से इस बारे में बात करते हैं, तो वे उन दिनों की यादों में खो जाते हैं। उस समय वे इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज के छात्र थे और अपनी पढ़ाई के साथ-साथ पत्रकारिता के प्रति आकर्षण उन्हें प्रेस की दुनिया में खींच लाई थी।
भास्कर की लॉन्चिंग से लगभग दो-तीन महीने पहले, यानी दिसंबर 1982 से ही टीम जुटना शुरू हो गई थी। धर्मेश कहते हैं, "अखबार शुरू होने के पहले ही मैंने इंदौर भास्कर ज्वाइन कर लिया था। उस समय यतीन्द्र भटनागर साहब संपादक थे। दिसंबर-जनवरी से ही पूरी टीम एक छत के नीचे आ रही थी, हर तरफ एक नए अखबार को जन्म देने की वैसी ही बेचैनी और उत्साह था, जैसा किसी घर में बच्चे के जन्म से पहले होता है।"
युवा धर्मेश को 'डाक विभाग' की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उन दिनों डाक विभाग का काम आज की तरह ईमेल या व्हाट्सएप वाला नहीं था। बाहरी क्षेत्रों से आने वाली खबरों को सहेजना, उन्हें संपादकीय कसौटी पर कसना और यह सुनिश्चित करना कि दूर-दराज की खबरें समय पर अखबार का हिस्सा बनें, एक चुनौतीपूर्ण कार्य था।
धर्मेश बताते हैं, "मैं डाक की खबरों में था। वहाँ मैंने काम के दौरान कई नए कॉलम भी शुरू किए, जो काफी पसंद किए गए। मेरे अनुशासन और काम के प्रति ईमानदारी ने संपादक यतीन्द्र भटनागर जी का ध्यान मेरी ओर खींचा।"
एक तरफ कॉलेज की कक्षाएं और दूसरी तरफ अखबार का दफ्तर। धर्मेश एक 'फुल-टाइमर' की तरह काम करते थे। वे समय के बड़े पाबंद थे। उनकी नज़रें सिर्फ अपनी डेस्क तक सीमित नहीं थीं, बल्कि वे अखबार के हर बारीक पहलू को सीखने की कोशिश कर रहे थे। यही वह दौर था जब भास्कर अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रहा था। धर्मेश यशलहा जैसे युवा अपना खून-पसीना बहाकर उस सपने को हकीकत में बदल रहे थे।
(अगली किस्त में पढ़िए: कैसे यतीन्द्र भटनागर जी ने धर्मेश यशलहा को खेल विभाग की गलतियां पकड़ने का एक 'स्पेशल टास्क' दिया था।) #दैनिक_भास्कर_इंदौर_लॉन्चिंग_टीम_के_गुमनाम_नायक #सीरीज_08 #डीबी_कॉर्प #गुमनाम_नायक #धर्मेश_यशलहा

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