इंदौर प्रेस क्लब की 'सियासत' ने जब 'सहमति' का चोला उतार फेंका!

(नैवेद्य पुरोहित)
इंदौर प्रेस क्लब की सीढ़ियाँ आज भी उन बहसों की गवाह हैं, जिन्होंने मालवा की पत्रकारिता का चरित्र गढ़ा। वैसे तो 1957-58 के दरमियान में 30 लोगों ने मिलकर इंदौर में पत्रकारों के एक संगठन की परिकल्पना की थी। उसी कड़ी में 9 अप्रैल 1962 को जब तत्कालीन मुख्यमंत्री भगवंतराव मंडलोई ने इसका फीता काटा था, तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह संस्था केवल पत्रकारों के बैठने की जगह नहीं, बल्कि लोकतंत्र की एक छोटी सी प्रयोगशाला बन जाएगी।
शुरुआती दौर बड़ा 'शालीन' हुआ करता था। बड़े अखबारों के दफ्तरों में चाय की चुस्कियों के साथ नाम तय होते और प्रेस क्लब में उस पर 'सर्वानुमति' की मुहर लग जाती। यह एक अघोषित परंपरा थी जहां बड़े घरानों का वर्चस्व और छोटे पत्रकारों की मौन स्वीकृति रहती थी। लेकिन हवाएं तब बदलीं जब देश ने 1975 में इंदिरा गांधी द्वारा लगाए आपातकाल का दंश झेला।
इंदौर प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष सतीश जोशी बताते है कि आपातकाल के बाद की पत्रकारिता विचारधाराओं का अखाड़ा बन गई थी। एक तरफ 'नईदुनिया' की अपनी एक गरिमा और प्रभाव था, तो दूसरी तरफ 'स्वदेश' जैसी विचारनिष्ठ पत्रकारिता का उदय हो रहा था। राष्ट्रवादियों और धर्मनिरपेक्षों के बीच की लकीरें गहरी होने लगी थीं। अस्सी के दशक के उत्तरार्ध का वह दौर था जब कुछ नायकों ने महसूस किया कि 'सर्वानुमति' की परंपरा दरअसल लोकतंत्र का गला घोंटने का एक सलीका है। उन लोगों ने तय किया कि अब फैसले बंद कमरों में नहीं, चुनकर पारदर्शिता के साथ होंगे।
एक समय ऐसा आया जब प्रेस क्लब के उपाध्यक्ष पद के लिए स्व. अभय छजलानी के विरुद्ध दिवंगत सुरेश राठौर साहब चुनाव में खड़े हो गए थे। वोटिंग का गणित बड़ा जटिल होता था। हार और जीत की गणना मेजों पर पहले ही हो जाती थी। राठौर साहब जानते थे कि उनके पास न तो संसाधनों का बल है और न ही किसी बड़े संस्थान का वरदहस्त। लेकिन उनके पास कुछ ऐसे साथी थे जो बदलाव लाना चाहते थे। उन मूर्धन्य पत्रकारों में स्व. प्रताप चांद, स्व. ठाकुरदास खुजनेरी और ओमी खंडेलवाल जी जैसे लोगों ने एक ऐसी दीवार खड़ी की, जिसने बड़े-बड़े दिग्गजों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया। स्व. सुरेश सेठ, विश्व भ्रमण वाले अग्रवाल साब और अर्जुन राठौर ने उस समय की 'कर्कश राजनीति' के बीच निष्पक्षता का झंडा बुलंद किया।
इस कहानी का सबसे खूबसूरत हिस्सा वह है, जो आज की राजनीति में दुर्लभ है। सतीश जी याद करते हैं कि भले ही चुनावी मैदान में आपस में विचारधाराएं टकराती थीं, भले ही वोटों के लिए गणित बिछाए जाते थे, लेकिन जैसे ही चुनाव के नतीजे आते, हारने और जीतने वाला एक ही टेबल पर बैठकर चाय पीते थे। वह 'प्रोफेशनल रायवलरी' व्यक्तिगत कड़वाहट में कभी तब्दील नहीं हुई। लीक से हटकर चलने वाले लोगों ने सिद्ध कर दिया था कि प्रेस क्लब किसी मालिक की जागीर नहीं, बल्कि हर उस श्रमजीवी का घर है जिसकी उँगलियों में स्याही लगी है।
इंदौर प्रेस क्लब के उस लोकतांत्रिक उदय की कहानी आज भी हमें याद दिलाती है कि हमारी असली ताकत सत्ता के करीब होने में नहीं, बल्कि अपनी संस्था के भीतर लोकतंत्र को जिंदा रखने में है। वह विरासत ही आज इंदौर की पत्रकारिता की बुनियाद है। ( अगली किस्त में पढ़िए: इंदौर में दैनिक भास्कर जब अपने पांव पसार रहा था तब एक कॉलेज छात्र संभाल रहा था डाक विभाग - नाम है धर्मेश यशलाहा, अगली कड़ियों में आप पढ़ेंगे उनकी कहानी।) नोट: 1. राठौर साहब के स्पूतनिक ज्वाइन करने के पहले 1960 के दशक में उन्होंने 'महामालव' नाम से एक दैनिक समाचार पत्र निकाला था जिसका विमोचन कद्दावर कांग्रेस नेता महेश जोशी, कृपाशंकर शुक्ला, अशोक शुक्ला ने किया था। इस कार्यक्रम के फोटोज मेरे पास मौजूद है। 2. जब छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बने अजीत जोगी तो उन्होंने राठौर साहब को अपना पर्सनल मीडिया सलाहकार बनने का प्रस्ताव दिया था लेकिन उन्होंने यह पेशकश ठुकरा दी थी। 3. सकल पंच राठौर समाज में व्याप्त कई सारी कुरीतियों को हटाने के लिए वरिष्ठों के साथ उन्होंने कई लड़ाइयां लड़ी। ऐसे तमाम विषय जो अभी छूट रहे है उस पर बाद में चर्चा की जाएगी। #दैनिक_भास्कर_इंदौर_लॉन्चिंग_टीम_के_गुमनाम_नायक #सीरीज_07 #डीबी_कॉर्प #गुमनाम_नायक #दिवंगत_पत्रकार_सुरेश_राठौर

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