सुंदर लिखावट हुआ करती थी एक पत्रकार की पहचान
(नैवेद्य पुरोहित)
आज हिंदी पत्रकारिता के उस दौर की कल्पना कीजिए आप जब न्यूज़रूम में न डिजिटल डिवाइसेज थे और न ही ईमेल से खबरें भेजने की सुविधा। रिपोर्टर अपनी खबरें कागज़ पर हाथ से लिखकर देते थे और वही पांडुलिपि आगे कंपोजिंग या टाइपिंग के लिए जाती थी। ऐसे समय में किसी पत्रकार की पहचान केवल उसकी खबर से ही नहीं, उसकी लिखावट से भी बनती थी। साफ, सुघड़ और पढ़ने में आसान लिखावट एक तरह से पेशेवर दक्षता का प्रतीक मानी जाती थी।
दैनिक भास्कर के इंदौर संस्करण के शुरुआती दिनों में भी ऐसी ही एक घटना अक्सर पुराने साथी याद करते हैं, जो उस समय की कार्यसंस्कृति को बहुत सहजता से सामने रखती है। कहा जाता है कि एक बार स्व. विनय लाखे जी ने सिरपुर क्षेत्र में किसी ज़मीन विवाद को लेकर एक रिपोर्ट लिखी। उस जमीन पर कोई मल्टी बनने वाली थी। खबर महत्वपूर्ण थी लेकिन जब वह कॉपी टाइपिंग के लिए डीटीपी ऑपरेटर तक पहुँची तो बड़ी समस्या खड़ी हो गई। लिखावट इतनी उलझी हुई थी कि कई शब्द समझ ही नहीं आ रहे थे।
उस समय वहाँ मौजूद स्व. गोकुल शर्मा ने हंसते हुए कहा, “इसे छोड़ो, राठौर से लिखवाओ…वही ठीक करेगा।” जब वह कॉपी सुरेश राठौर साहब के पास पहुँची तब उन्होंने उसे दोबारा अपने हाथों से लिखा। उस नई कॉपी के अक्षर इतने साफ, सधे हुए और सुंदर थे कि उसे पढ़ना किसी मुद्रित पाठ जैसा आसान लग रहा था। उस दौर में जब हर शब्द हाथ से लिखा जाता था, ऐसी लिखावट अपने आप में एक कला मानी जाती थी।
कहते हैं कि जब वह सुंदर लिखावट मालिक स्व. रमेशचंद्र अग्रवाल तक पहुँची, तो वे भी उन अक्षरों की सुघड़ता देखकर प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। यह उस दौर की पत्रकारिता में मौजूद अनुशासन और सौंदर्यबोध की एक झलक थी। दरअसल उस समय न्यूज़रूम में कई ऐसे लोग थे जो अपनी-अपनी विशिष्टताओं के कारण पहचाने जाते थे कोई तेज़ तर्राट रिपोर्टिंग के लिए, कोई खबर को सूंघने के लिए और कोई अपनी बेहतरीन लिखावट के लिए। राठौर साहब की लेखनी केवल शब्दों में ही नहीं, अक्षरों की बनावट में भी दिखाई देती थी।
आज जब न्यूज़रूम पूरी तरह डिजिटल हो चुके हैं और हस्तलिखित कॉपी का महत्व लगभग समाप्त हो गया है, तब यह किस्सा हमें उस दौर की याद दिलाता है जब पत्रकार की पहचान उसके व्यक्तित्व और उसकी लिखावट दोनों से बनती थी। मेरी इस सीरीज में यह सुरेश राठौर साहब को समर्पित एक अध्याय चल रहा है आगे उन सभी गुमनाम नायकों के किरदार पर किस्से, कहानियां, रोचक प्रसंग और उनसे जुड़ी हर बात साझा करूंगा।
(अगली किस्त में पढ़िए: वह दिलचस्प प्रसंग जब देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने राठौर साहब की मदद करने की पेशकश की और कहा कि “बुढ़ापे में काम आएगा।” तब राठौर साहब ने मुस्कुराकर जवाब दिया,“क्या गारंटी है कि बुढ़ापा आएगा?”)
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