80,000 रुपये से भरा ईमानदारी का वो बैग

(नैवेद्य पुरोहित)
मनुष्य को उसके चरित्र और मूल्यों की कसौटी पर ही परखना चाहिए। किसी पत्रकार की पहचान उसकी रिपोर्टिंग के साथ उसके जीवन-व्यवहार से भी बनती है। दिवंगत पत्रकार सुरेश राठौर साहब ऐसे पत्रकार थे जो फक्कड़ मिज़ाज, बेबाक और अपने उसूलों पर अडिग रहते थे। उनके जीवन के कई छोटे-छोटे प्रसंग भी ऐसे हैं जो बताते हैं कि उनकी पत्रकारिता केवल पेशा नहीं बल्कि एक जीवन-दृष्टि थी। ऐसा ही एक प्रसंग लगभग वर्ष 2000 के आसपास का है, जब राठौर साहब ने दैनिक भास्कर से अचानक इस्तीफा दे दिया था। (उनके इस्तीफ़े की कहानी बाद में साझा करूंगा) ओमी खंडेलवाल जी के कहने पर वे इंदौर से प्रकाशित दैनिक अपनी दुनिया में कुछ घंटे पार्ट-टाइम काम किया करते थे।
इंदौर के प्रेस कॉम्प्लेक्स में जहाँ शहर के कई अखबारों के दफ्तर स्थित हैं, उस दिन दोपहर का समय था। रोज़ की तरह काम निपटाने के बाद राठौर साहब अपने साथी रमेश नंदवाल के साथ चाय पीने निकल रहे थे। जैसे ही वे दफ्तर से बाहर निकले और आगे बढ़े, उनकी नजर ज़मीन पर पड़े एक बैग पर गई। बैग थोड़ा भारी दिख रहा था। उत्सुकता से उन्होंने उसे उठाया और खोला तो उसमें अंदर नोटों की गड्डियाँ रखी थीं।
गिनती करने पर पता चला कि उसमें पूरे 80,000 रुपये थे। आज के समय में यह रकम शायद सामान्य लगे, लेकिन आज से 26 साल पहले उस दौर में यह बहुत बड़ी राशि मानी जाती थी, एक “भारी भरकम रकम” हुआ करती थी। आम तौर पर राठौर साहब दोपहर एक या डेढ़ बजे तक दफ्तर से निकल कर अपने घर पहुंच जाते थे। लेकिन उस दिन उन्होंने एक अलग फैसला लिया। उन्होंने तय किया कि वे तुरंत पुलिस के पास नहीं जाएंगे। उन्हें डर था कि कहीं वो पैसे पुलिस या कानूनी प्रक्रिया में उलझ न जाएँ और असली मालिक तक कभी न पहुँच पाएँ। इसलिए उन्होंने सोचा कि शायद जिसने भी यह बैग खोया है, वह इसे खोजते-खोजते यहाँ तक जरूर आएगा। इसी उम्मीद में वे उस दिन शाम चार-पांच बजे तक वही बैठे रहे।
दरअसल, वह बैग पास की एक निजी कंपनी के चपरासी का था। कंपनी ने उसे बैंक जाकर डिमांड ड्राफ्ट (डीडी) बनवाने के लिए पैसे दिए थे। रास्ते में कहीं उसका बैग गिर गया और उसे पता ही नहीं चला। जब वह खाली हाथ दफ्तर पहुँचा और अपने अधिकारियों को बताया कि पैसे खो गए हैं, तो पहले तो किसी ने उसकी बात पर विश्वास ही नहीं किया। आखिरकार उसके साथियों ने उसके बताए रास्ते पर जाकर जांच करने का फैसला किया। खोजते हुए जांच करते-करते वे लोग प्रेस कॉम्प्लेक्स पहुँचे।
राठौर साहब पहले से ही वहाँ इंतजार कर रहे थे। लेकिन पैसे लौटाने से पहले उन्होंने एक पत्रकार की तरह रूटीन पूछताछ की। उन्होंने पूछा बैग कैसा था? उसमें कितने पैसे थे? नोट किस-किस मूल्य के थे? जब सामने वाले व्यक्ति ने सारी जानकारी ठीक-ठीक बता दी, तब राठौर साहब को भरोसा हो गया कि वही असली मालिक है। इसके बाद उन्होंने बिना किसी हिचक के बैग उसे वापस सौंप दिया।
जिस व्यक्ति का बैग था, वह एक साधारण चपरासी था। उसकी मासिक आय लगभग 2,000 से 3,000 रुपये के बीच थी। उसके लिए 80,000 रुपये खो जाना मानो जीवन की सबसे बड़ी मुसीबत थी। जब उसे उसका पैसा वापस मिला तो उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसने बार-बार हाथ जोड़कर राठौर साहब को धन्यवाद दिया और ढेर सारी दुआएँ दीं। यह घटना शायद किसी अखबार की बड़ी हेडलाइन नहीं बनी। यह उस व्यक्ति के चरित्र को ज़रूर बताती है जिसने पूरी जिंदगी पत्रकारिता को केवल पेशा नहीं, एक नैतिक जिम्मेदारी की तरह भी जिया।
(अगली किस्त में पढ़िए: इंदौर प्रेस क्लब के चुनाव लोकतांत्रिक तरीके से कब होने लगे उसमें राठौर साहब के साथ किन लोगों का योगदान रहा। इंदौर के पत्रकारों ने वोट डालकर कब से अपना अध्यक्ष चुनना शुरू किया।) #दैनिक_भास्कर_इंदौर_लॉन्चिंग_टीम_के_गुमनाम_नायक #सीरीज_06 #डीबी_कॉर्प #गुमनाम_नायक #दिवंगत_पत्रकार_सुरेश_राठौर

Comments

Popular posts from this blog

20 की उम्र में चारधाम पूरे, रिश्तों का पंचधाम भी जी लिया!

जड़ों से जुड़ाव की पुकार: एक बार फिर कुलदेवता के दरबार में!

मन की शांति का रहस्य: स्वीकार्यता है!