रंग-रिवाज़ और रूह को छू लेने वाले लम्हे: होली 2026

लोग अक्सर कहते हैं होली अपने घर पर अपनों के साथ मनाना चाहिए।माँ के हाथों से रंग लगवाओ, घर में बने गुझिया खाओ, आँगन में ठंडाई पियो, यह बहुत प्यारी बातें है। लेकिन मेरी कहानी ज़रा अलग है। इसके दो कारण है मेरे गृहनगर इंदौर में होली से ज़्यादा रंगपंचमी का इंतज़ार रहता है। वहाँ असली जश्न लोगों को रंग तो पंचमी के दिन चढ़ता है। दूसरी बात मैं पिछले तीन साल बेनेट यूनिवर्सिटी, ग्रेटर नोएडा में था और तीनों साल की होली मैंने वहीं मनाई। अब माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में हूँ और यहाँ भी पहले से तय था कि होली तो बिशनखेड़ी की वादियों में बसे इसी कैंपस में ही खेलूंगा।
अब दिल्ली-एनसीआर की प्राइवेट यूनिवर्सिटी की होली और भोपाल की सरकारी मीडिया यूनिवर्सिटी की होली में ज़मीन-आसमान का फ़र्क है।एक तरफ विश्वविद्यालय प्रशासन की तरफ से भरपूर इंतज़ाम रहते है डीजे, रेनडांस, पूल, गुलाल, ठंडाई...सबकुछ। दूसरी तरफ हमारे यहाँ हॉस्टल के कुछ विद्यार्थी चंदा इकट्ठा करके बाहर से डीजे मँगवाते हैं, एक-दो घंटे नाचते हैं, परिसर में रहने वाले कुछ प्रोफेसरों को गुलाल लगाकर ही हम खुश हो जाते हैं। लेकिन इस बार कुछ अलग करने का सोचा।
एक रात पहले का फैसला - होली की एक रात पहले, हम कुछ दोस्तों ने मिलकर तय किया कि यार, भोपाल शहर में जो होली के इवेंट्स हो रहे हैं, उनमें से किसी एक में चलते हैं। यहाँ काम आए हमारे फिल्म डिपार्टमेंट के मित्र द्विप दत्ता जिनकी मदद से हमें भोपाल की गुलमोहर कॉलोनी स्थित अरेरा फॉर्म्स एंड गार्डेंस में होने वाले "रंगरिवाज़" नामक इवेंट की जानकारी मिली। अपनी पहचान के ज़रिए डिस्काउंट हो गया जहां बाकी जगह 1500-2000 के पासेस थे यहाँ हमें सिर्फ 200 रुपए पड़ा। वही सब सुविधाओं के साथ अनलिमिटेड डीजे, अनलिमिटेड गुलाल, पूल पार्टी, रेनडांस सब कुछ।
हम कुल 15 लोग थे मैं, हर्ष कर्णवाल, प्रशांत सिंह, सागनिक मजूमदार, द्विप दत्ता, ऋतिक पांडेय, अंजलि चौधरी, आकाश नाथकर, लीज़ा सिन्हा, जिया केसरी, अश्विनी शुक्ला, हरिओम गुप्ता, राहुल सोनी, खुशी पांडेय और सृष्टि। हम सभी माखनलाल के विद्यार्थी पेमेंट कर चुके थे।
होली की सुबह - सुबह-सुबह हाथ-पाँव पर अच्छे से तेल लगाया। पुराने फटे जूते, पुरानी जींस, पुरानी टी-शर्ट होली का यूनिफॉर्म तैयार किया। जब नीचे गया तो हॉस्टल के सारे मित्र मेरा इंतज़ार कर रहे थे बड़े प्यार से एक-एक ने गुलाल लगाया। वो पल जब दोस्तों आपके साथ हो तब रंग भी अलग चमकता है। फिर हम फैकल्टी एरिया की तरफ गए जहाँ परिसर में रहने वाले शिक्षक अपने परिवार के साथ होली खेल रहे थे।
पहले गजेंद्र सर को रंग लगाया। फिर लोकेंद्र सर भी वहीं मिल गए उनके साथ खड़े बाकी फैकल्टी को भी रंग लगाया। फिर एलबी ओझा सर को फोन लगाया। उन्होंने हम सबको ऊपर उनके कमरे बुलाया, गुझिया खिलाई साथ ही प्रसाद भी दिया और ढेर सारा आशीर्वाद।
रंगरिवाज़: जहाँ होली असली लगी - मेरे लिए इस तरह के होली इवेंट में जाना पहली बार था। इससे पहले होली के किसी पेड-इवेंट में कभी नहीं गया था। लेकिन कल जब गया तो लगा होली तो ऐसी ही होनी चाहिए! 12:30 बजे कैम्पस से निकल कर हम करीब 1 बजे पहुंचे एंट्री मिली और डीजे पर पहला गाना बज रहा था, "दिल्ली से है बे****द." वहां फुल एनसीआर वाली वाइब आ गई! 😂
हम सब पहले डीजे की धुन पर जमकर थिरके फिर रेनडांस में गए, पूल में उतरे, एक-दूसरे को खूब गुलाल लगाया, घंटों नाचते रहे, रील्स बनाईं खूब मौज की। और फिर जब करीब 4 बजे हम सब थककर चूर होने को थे तभी ज़ोर से भूख लगी। सबने एक-दूसरे को देखा और बिना कुछ कहे ही समझ आ गया। पास में ही इंडियन कॉफी हाउस था वहाँ गए और पेटभर के अच्छे से भोजन-प्रसादी की।
नेहरू नगर की मेहफ़िल: कचोरी, समोसे और कीचड़ - करीब 5 बजे हम लोग अपने-अपने रास्ते निकले। कोई डैम घूमने गया, कोई सीधे कैम्पस। मैं अश्विनी शुक्ला और हरिओम गुप्ता के साथ नेहरू नगर गया वहां पहले मित्र रोहित तिवारी की तबीयत पूछी। फिर फोन लगाया अपनी क्लास के साथियों को तब पता चला कि भूमि सिंह, कमलेश कुलमी, अमृता चतुर्वेदी और उसकी बड़ी बहन अर्पणा दीदी, सौम्या वारदे ये सब संस्कृति शर्मा के घर नेहरू नगर में ही दिनभर से होली मना रहे हैं। जैसे ही मैं वहाँ पहुँचा वो सब पक्के रंग लिए तैयार बैठे थे! दरअसल, हम लोग जो में गए थे वहाँ दिनभर पूल में डीजे रेनडांस और गुलाल में ही व्यस्त थे, पक्का रंग नहीं लगाया। और मेरे सहपाठियों ने दिनभर पक्के कलर से होली खेली थी और मेरे पहुंचते ही मुझे भी पूरा उनकी तरह भूत बनाकर पोत दिया।
फिर संस्कृति ने आज हम सबके लिए कचोरियाँ बनाई थीं। मैं और कमलेश चौराहे पर आशा स्वीट्स से समोसे और कोल्डड्रिंक लेकर आ गए। नेहरू नगर के उस गार्डन में हम सब बैठ गए कचोरी-समोसे खाते हुए, ठंडी हवा में, खिलखिलाते हुए, गप्पें मारते हुए। शाम के करीब 7:45-8:00 बजे तक वो महफ़िल सजी रही। जब विदा लेने का समय आया तो मैंने कीचड़ में से मिट्टी उठाई और बारी-बारी से सबको पोत दिया। इस तरह हम सभी ने कीचड़ वाली होली भी खेल ली। 😂
वापसी और थकान - करीब 8:15 बजे मैं और कमलेश नीलबड़ के लिए निकले। 8:50 पर मैं कैम्पस पहुँचा। और भला हो विश्वविद्यालय प्रशासन का जो हर वर्ष मार्च से जून तक हॉस्टल में एंट्री रात 9 बजे तक रहती है, वरना अभी तक हमें 8:30 से पहले आना पड़ता था। मैं बहुत ज्यादा थका हुआ था। लेकिन हॉस्टल आते ही देखा हर्ष कर्णवाल की तबीयत बिगड़ गई थी। और उन्होंने हॉस्टल के गलियारे में उल्टी कर रखी थी। अब हॉस्टल में हाउसकीपिंग स्टॉफ सिर्फ सुबह आता है। यदि उनका इंतज़ार करते तो सुबह तक पूरा हॉस्टल बदबू से महक उठता, यह हम कतई नहीं चाहते थे। तो मैंने, सागनिक और द्विप ने मिलकर सब साफ किया। बिना कोई शिकायत या नाटक नौटंकी नहीं की सीधे साफ कर दिया। यही तो दोस्ती होती है। यही दोस्ती भी होती है जहां कोई शिकायत नहीं सिर्फ एक दूसरे का सहारा होता है।
अभी जब मैं यह लिख रहा हूँ सोच रहा हूँ कि हॉस्टल लाइफ़ के ये दिन कभी वापस नहीं आते। ज़िंदगी के ये लम्हे लौटकर कभी नहीं आएंगे, हर पल बीतता चला जाता है। ज़रूरी यह है कि हम वर्तमान में हो रहे उन लम्हों को महसूस करें और उन्हीं वर्तमान पलों में खुशी के साथ अपनी ज़िंदगी खुलकर जिएँ। क्योंकि हमारा वर्तमान ही हमारा भविष्य तय करता है! ~ नैवेद्य पुरोहित #होली_2026 #रंगरिवाज़ #भोपाल #माखनलाल_चतुर्वेदी_राष्ट्रीय_पत्रकारिता_एवं_संचार_विश्वविद्यालय #अरेरा_फॉर्म्स_एंड_गार्डेंस #holi #rangrivaz

Comments

  1. वर्तमान में जीना ही सही है, क्योंकि जो बीत गया वो बदल नहीं सकते और उसका शोक या खुशी मनाने से भी कुछ नहीं होगा..... वो जा चुका है।
    और आने वाले कल की चिंता में अपना वर्तमान समय खराब नहीं करना चाहिए। आपके हाथ में सिर्फ वर्तमान है और अपना हर दिन ऐसे जियो की ये दिन आखिरी हो, इससे होगा ये कि आपको सही दिशा मिलेगी।
    क्या करना है और क्या नहीं।
    हॉस्टल के दिन कभी वापस नहीं आयेंगे इसलिए जी भर जिओ.... खूब मस्ती करो और खुश रहो, mcu का नाम रोशन करो

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