द केरला स्टोरी 2: इस होली प्रोपेगेंडा का 'गुलाल' नहीं, हकीकत का 'रंग' देखिए!

कल मंगलवार को मैं 'द केरला स्टोरी 2' देखने गया भोपाल के डीबी सिटी मॉल में और मेरे साथ 8 लोग थे। हम 3 लड़के, 5 लड़कियाँ। शुरुआत में मुझे लगा कि ये फ़िल्म उसी घिसे-पिटे प्रोपेगेंडा बेस्ड एजेंडे की राह पर चलेगी जिस राह पर आजकल कई फ़िल्में चलती हैं एक नारा बुलंद करो, जज़्बात जगा दो और छोड़ दो। लेकिन आखिर तक आते-आते मेरा यह भ्रम यह पूरा का पूरा टूट गया। क्योंकि इस फ़िल्म की ख़ास बात जो इसे बाकी सब से अलग करती है यह है कि आखिरी में सिर्फ़ "सच्ची घटनाओं से प्रेरित या Inspired by True Events" नहीं लिखा था वहाँ फैक्ट्स मौजूद थे। वो भी ताज़ा 2024-25 के केसेस थे। नाम, जगह, तारीख सहित। यह ऑथेंटिसिटी का फ़र्क होता है एक फ़िल्म जो सिर्फ़ दर्शक को इमोशनल रोलर कोस्टर पर बिठाकर छोड़ दे और एक फ़िल्म जो आपके ज़ेहन में एक सवाल छोड़ जाए कि यार, यह तो वाकई सच में हो रहा है।
सच्ची घटनाओं का भारी बोझ - इस फिल्म में छांगुर बाबा का भी ज़िक्र है वह मौलाना जिसके ऊपर अभी हाल ही में धर्मांतरण के संगीन आरोप लगे और जो वर्ष 2024-25 के मामलों में सामने आया। कोलकाता-आगरा कन्वर्जन कॉरिडोर का भी ज़िक्र है इस पूरे ऑपरेशन का खुलासा फ़िल्म में तथ्यों के साथ पेश किया गया है। ऐसे कई धर्मांतरण कॉरिडोरों का संचालन शेखर रॉय और उशमा खान जैसे लोगों के साथ उनका पूरा तंत्र संचालित कर रहा है। यहाँ तक कि मेरे अपने शहर इंदौर में खजूरी बाज़ार के पीछे कुँवर मंडली मोहल्ले में जहाँ मैं रहता हूँ। हमारे यहां के पिछले तीन बार के पार्षद अनवर क़ादरी के ऊपर भी लव जिहाद की फंडिंग के आरोप उन्हीं की क़ौम के दो लड़कों ने बाकायदा वीडियो बनाकर लगाए हुए हैं। इस मामले में हाल ही में उन्हें बड़ी मशक्कत के बाद ज़मानत मिली है। अगर कोई व्यक्ति यह कहता है कि ये मूवी सिर्फ़ एक प्रोपेगेंडा है या ऐसी घटनाओं को नकारता है तो ये उसका अपना एजेंडा हो सकता है। लेकिन सच तो यह है कि हमारे समाज में ऐसी घटनाएँ घट रही हैं और तेज़ी से दिन ब दिन बढ़ रही हैं।
दिव्या से आलिया तक एक लड़की का सफ़र - फ़िल्म में दिव्या पालीवाल की कहानी है जब वह दिव्या से आलिया बन जाती है और राशिद को अपना शौहर मान लेती है। यहाँ एक चीज़ जो फ़िल्म बहुत अच्छी तरह पेश करती है वह है कि यह प्रक्रिया कितनी धीरे, कितनी व्यवस्थित ढंग से मोहब्बत की चादर ओढ़े हुए होती है। शुरुआत होती है डांस से क्योंकि डांस दिव्या का इकलौता पैशन है। एक दिन वह अपने दोस्त के चाले में आकर अश्लील डांस का वीडियो बना देती है और अपलोड कर देती है। उसके बाद उसकी मां उसे बहुत डांटती है उसका फोन तोड़ देती है। फिर वह लड़की आक्रोश में आकर विद्रोह करने लग जाती है और रशीद के साथ रहने के लिए अपने घर से भाग जाती है। प्रारंभ में रशीद उसे यह कहकर अपने साथ लाता है कि वह भी उसके साथ डांस की रील्स बनाने में उसका साथ देगा। परंतु जब एक कट्टर मुस्लिम परिवार में उसका आगमन होता है तो वहां इस तरह की किसी बात की उसे कोई अनुमति नहीं होती है बल्कि बेहद प्रताड़ित भी किया जाता है।
फिल्म में एक जगह एक बाप अपनी बेटी से कहता है, "इंडिया इज़ ए सेक्युलर कंट्री और सबको अपने तरीके से जीने का हक़ है।" यह एक माँ-बाप की लिबरल समझाइश है। इस डायलॉग ने तो भारत के सेक्युलर सॉवरिन स्टेट पर ही सवाल खड़ा कर दिया है। फिल्म में तीनों मुख्य किरदार वाली लड़कियाँ अपनी ज़िद पर अड़ी हुई रहती हैं। म्हारो रशीद ऐसा नहीं है...मेरा सलीम ऐसा नहीं है...हमाओ फ़ैज़ान ऐसा नाही है। और फिर एक रोज़ उसी फ़ैज़ान की मर्ज़ी से उसी के निगाह वाले दिन वह धोखा देकर अपनी पत्नी को मौलाना के साथ कमरे में सोने के लिए मजबूर कर देता है। फ़ैज़ान की मर्ज़ी से उसका रेप होता है और मौलाना कहता है, "अब पूरी तरह से पाक है तुम्हारी बेगम।" आखिर यह कौन-सा प्यार है?
वह संवाद जो ज़ेहन में घाव करते है - "मोहब्बत हर हराम चीज़ को हलाल बना देती है।" "हम जो करते है 100 फ़ीसदी लीगल है भारत में कन्वर्जन सेंटर्स लीगलाइज़ हैं। जहाँ हम कल माइनॉरिटी थे, आज वहाँ हमारी रूलिंग पार्टी है। २०४७ में पूरा हिंदुस्तान इस्लामिक स्टेट हो जाएगा?" "बामन की लड़की के 12 लाख मिलते हैं। दलित लड़की के 6 लाख होते हैं।" ऐसे तमाम डायलॉग्स सुनकर आपके रोंगटे खड़े होते हैं। धर्मांतरण के रेट्स भी बताए गए हैं। आतंकवादियों के 2047 का गज़वा-ए-हिंद मॉडल स्टेप बाय स्टेप दिखाया गया है और मुझे कोई शक नहीं कि इस महान देश के किसी हिस्से में इस तरह की सोच रखने वाले लोग हैं। हाँ, हर मुसलमान ऐसा नहीं फ़िल्म में यह बात आती है। डॉ एपीजे अब्दुल कलाम आज़ाद, बिस्मिल्लाह खां, शहीद अब्दुल हमीद सहित तमाम क्रिकेटर्स और म्यूजिशियंस हैं। उन्हीं जैसे अच्छे लोगों की वजह से हिंदू लड़कियां उन पर भरोसा कर के जाल में फंस जाती हैं।
वह सीन्स जो भूल नहीं पाया - कई तरह के अत्याचार सहने के बाद दिव्या पालीवाल एक वीडियो बनाकर रशीद को एक्सपोज करने की कोशिश करती है लेकिन वह पकड़ लेता है उसे। जो वीडियो शायद पूरी दुनिया को सच्ची तस्वीर दिखाता उसके अपलोड होने के पहले ही रशीद दीवार में ज़ोर से सिर फेंक कर दिव्या को मार डालता है। बाद में आरोपी का परिवार उस लड़की के टुकड़े कर दफ़ना देता है। दूसरी लड़की के हाथ-पैर पकड़कर ज़बरदस्ती उसके मुंह में बीफ ठूंस दिया जाता है। बाद में वह अपने बाल काटकर फांसी लगा लेती है। तीसरी लड़की जो कहती थी "हमाओ फ़ैज़ान ऐसा नाही है"। रोज़ाना कई दिनों तक उसके साथ रेप होता है जैसे-तैसे वो वहां से भाग निकलती है और पुलिस स्टेशन पहुंचकर कंप्लेंट करती है। फिल्म के आखिर में बुलडोजर से न्याय भी हो जाता है। पूरे गिरोह का भाँडा फूट जाता है। सब पकड़े जाते हैं।
लिबरल पत्रकार और सेक्युलर वाली बात - एक पात्र है जो शुरुआत में ऐसा लिबरल जर्नलिस्ट है जो धर्म में विश्वास ही नहीं करता था। तथाकथित प्रोग्रेसिव और जब उससे उसके बदले हुए स्वभाव के बारे में उसकी प्रेमिका पूछती है तो कहता है, "वह सब तुम्हें सही रास्ते पर लाने के लिए था।" वास्तव में सेक्युलर होने का मतलब अपने धर्म को नकारना नहीं होता। यह डायलॉग फ़िल्म की महत्वपूर्ण कील है जो बिलकुल ठीक जगह ठोकी गई है। एक सीन में डायलॉग है, हम (हिन्दुओं) यूनाइटेड नहीं हैं इसी बात का फ़ायदा उठा रहे हैं वह लोग। 57 देश हैं इनके, ज़रा सी बात पर सब इकट्ठा हो जाते हैं और हम हिंदू एक कॉलोनी में भी इकट्ठा नहीं होते। हज़ार साल की गुलामी के बाद भी जो लोग समझ नहीं पाये, उन्हें भगवान भी नहीं बचा सकता। एक लड़की के कपड़े और लाइफस्टाइल पर कमेंट करने का मतलब होता है कि आप उस कल्प्रिट को जुर्म करने का एक्सक्यूज़ दे रहे हो। यह बात फ़िल्म में है और बेहद सटीक है।
बुलडोजर न्याय के दौरान मनोज मुंतशिर की आवाज़ में कविता - अरे ओ बाबरों–औरंगज़ेबों होश में आओ तुम्हें जन्मा है जिस मिट्टी ने अब तो उसके हो जाओ कहाँ तक आस्तीनों में तुम्हारा ज़हर पालेंगे कहाँ तक भाईचारा हम अकेले ही संभालेंगे कबूतर शांति के मजबूर हैं अब बाज़ बनने को नज़र डालो हमारी बेटियों पर, नोंच डालेंगे कि जैसे भट्टियों में ढल रही हो धार शस्त्रों की ढली है रण की ज्वाला में जवानी आर्यपुत्रों की हैं अभिमन्यु के वंशज हम पिया है शौर्य घुट्टी में अगर हिम्मत है आ जाओ भरो ये आग मुट्ठी में जो अब छेड़ा तो तहख़ानों से ले आएँगे मतवाले शिवाजी की वो तलवारें महाराणा के वो भाले खदेड़ा वीर बुंदेलों ने तो तुम हाँफ जाओगे जो चंदेलों की रणभेरी बजी तो काँप जाओगे जो बाजीराव की तलवार म्यानों से निकल आई जो पृथ्वीराज की शमशीर पी के रक्त गुर्राई बचोगे क्या जो कुंभा जी कटारें भोंक दें दिल में अगर गरजेंगे छावे तो छुपोगे कौन से बिल में गुरु गोबिंद जी के सिख अगर इंसाफ़ कर देंगे तो आने वाली सौ नस्लें तुम्हारी साफ़ कर देंगे
खामियाँ क्योंकि अंधभक्ति भी सही नहीं - फ़िल्म में कई लूपहोल्स हैं और यह मानना ज़रूरी है। कई बार लगता है कि प्लॉट को स्थापित करने के लिए, सिर्फ दर्शक के मन में एक खास सोच भर देने के लिए बहुत ज़्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर बता दिया है। जब फ़िल्म के अंत में लिखे फैक्ट्स कोई पढ़ेगा तो यह समझ आ जाएगा कि जो दिखाया वह भले ही सिनेमई रंग से रंगीन हो पर उसके पीछे असली ज़ख्म मौजूद हैं। चुनाव का एंगल भी लोग उठाएँगे केरल समेत 5 राज्यों में 2 महीने में चुनाव होने वाले हैं। ऐसे समय ऐसी फ़िल्म एक सवाल हो सकता है। लेकिन टाइमिंग का इल्ज़ाम फिल्म के कॉन्टेंट को कभी गलत नहीं बनाएगा। जो ताक़त मोहब्बत में है, वह बारूद में नहीं लेकिन जब मोहब्बत को हथियार बना लिया जाए तो उससे सिर्फ़ मोहब्बत से नहीं होशियारी से भी लड़ना होगा। धर्मांतरण के संदर्भों को फ़िल्म ने आखिर में सबूत के साथ पेश किया और यही वह चीज़ है जो इसे सिर्फ़ एक एजेंडा वाली मसाला फ़िल्म से ऊपर उठाती है। विपुल अमृतलाल शाह ने एक ऐसी फ़िल्म बनाई जो एक दस्तावेज़ी स्वर भी है। ~ नैवेद्य पुरोहित #द_केरला_स्टोरी_2 #विपुल_अमृतलाल_शाह #धर्मांतरण #लव_जिहाद #प्रोपेगेंडा #एजेंडा

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