जब "बीबीसी कहता है..." और "सब चलता है" से मची खलबली: प्रभातकिरण में 10 साल के सफर के बाद इस्तीफा

(नैवेद्य पुरोहित)
इंदौर की पत्रकारिता के इतिहास में कुछ कॉलम ऐसे रहे हैं, जिन्हें पढ़ने के लिए पाठक अखबार का इंतज़ार करते थे। सांध्य दैनिक प्रभातकिरण के उस दौर में धर्मेश यशलहा के दो स्तंभों ने खेल की दुनिया की 'अंदरूनी परतों' को उधेड़ कर रख दिया था। लेकिन इस चमक-धमक वाली पत्रकारिता के पीछे एक कड़वा सच भी छिपा था, जिसने अंततः 10 साल पुरानी इस पारी का अंत कर दिया।
"बीबीसी कहता है..." और "सब चलता है" का क्रेज़ था। उस जमाने में जब इंटरनेट की रफ़्तार नहीं थी, दुनिया भर की अपडेट के लिए धर्मेश देर रात जागकर बीबीसी रेडियो सुना करते थे। अगले दिन प्रभात किरण के मुख्य पृष्ठ पर "बीबीसी कहता है..." के जरिए वो शहर को ताज़ा अंतरराष्ट्रीय खबरों से रूबरू कराते।
वहीं, खेल पृष्ठ पर उनका कॉलम "सब चलता है" किसी धमाके से कम नहीं था। यह कॉलम तारीफों का पुलिंदा नहीं, बल्कि 'खोजी पत्रकारिता' का नमूना था। खेल संगठनों के भीतर की राजनीति हो या मैदान की खामियां, उनकी पैनी नजर से कुछ नहीं बचता था। खेल संघों के पदाधिकारी इस कॉलम से घबराते थे क्योंकि उन्हें डर रहता था कि उनकी किसी अनियमितता कहीं बेनकाब न हो जाए।
प्रभातकिरण में धर्मेश यशलहा ने लगभग 10 साल शानदार तरीके से बिताए। उन्हें घर से काम करने की 'शाही' सुविधा मिली हुई थी, काम की जबरदस्त साख थी, लेकिन आर्थिक मोर्चे पर तस्वीर वैसी नहीं थी जैसी होनी चाहिए थी। धर्मेश बताते हैं, "मुझे वहां 2,000 रुपये प्रति माह मिलते थे। 10 साल बीत गए, काम का बोझ बढ़ा, साख बढ़ी, लेकिन सैलरी की वो सुई वहीं अटकी रही।" जब संस्थान ने एक दशक के समर्पण के बाद भी वेतन में बढ़ोतरी नहीं की, तो धर्मेश के स्वाभिमान ने एक बार फिर करवट ली। उन्होंने तय कर लिया कि जहाँ मेहनत की सही कदर न हो, वहां रुकना ठीक नहीं।
प्रभातकिरण छोड़ने के बाद उनकी काबिलियत के कायल कई अखबार थे। 'नवभारत', 'देशबंधु' जैसे कई प्रतिष्ठित अखबारों के लिए स्वतंत्र रूप से कॉलम लिखना शुरू किया। इसके साथ ही उन्होंने अपनी पूरी ऊर्जा बैडमिंटन की कोचिंग और खेल पत्रकारिता के नए प्रयोगों में झोंक दी। यही वह वक्त था जब उन्होंने खुद की पत्रिका निकालने का सपना देखा जिसने आगे चलकर 'स्मैश' जैसी पत्रिका को जन्म दिया।
(अगली किस्त में पढ़िए: 'स्मैश' का उदय...जब धर्मेश जी ने खुद की पत्रिका निकाली जिसने खेल के साथ राजनीति, बैंक, साइबर सुरक्षा और सिनेमा तक को अपने भीतर समेट लिया था। आखिर क्यों बंद करनी पड़ी ये शानदार पत्रिका?) #दैनिक_भास्कर_इंदौर_लॉन्चिंग_टीम_के_गुमनाम_नायक #सीरीज_15 #डीबी_कॉर्प #गुमनाम_नायक #धर्मेश_यशलहा

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