दैनिक भास्कर इंदौर की लॉन्चिंग टीम के गुमनाम नायक सीरीज 01

इतिहास के हाशिये पर छूटे वे चेहरे, जिनकी मेहनत से खड़ा हुआ एक मीडिया साम्राज्य
(नैवेद्य पुरोहित) हिंदी पत्रकारिता का इतिहास अक्सर संपादकों की कलम और मालिकों के विज़न के इर्द-गिर्द सिमट कर रह जाता है। लेकिन किसी भी बड़े संस्थान की सफलता की इमारत जिन ईंटों पर टिकी होती है, वे अक्सर ज़मीन के नीचे दबी रह जाती हैं। रिपोर्टर, कॉपी राइटर, डाक विभाग के साथी, टाइपिस्ट और डीटीपी ऑपरेटर ये वे लोग हैं जिन्होंने रातों की नींद और दिन का चैन बेचकर एक अखबार को 'संस्थान' बनाया, पर इतिहास के पन्नों में इनका जिक्र 'फुटनोट' बनकर भी नहीं आ पाया!
5 मार्च 1983: इंदौर के मीडिया जगत की वह तारीख, जब दैनिक भास्कर ने इस शहर में अपना पहला कदम रखा। आज जब यह वटवृक्ष बन चुका है, तब उन "गुमनाम नायकों" की यादें ताज़ा करना ज़रूरी है जिनके पसीने से इसकी नींव सींची गई थी। मेरी यह श्रृंखला उन्हीं चेहरों के संघर्ष, यादों और अनकहे संस्मरणों को समर्पित है।
जब अखबार नौकरी नहीं, एक 'मिशन' था - उन दिनों इंदौर में भास्कर की शुरुआत किसी कॉर्पोरेट प्रोजेक्ट की तरह नहीं बल्कि एक जुनून की तरह हो रही थी। संसाधन सीमित थे तकनीक शुरुआती दौर में थी वेतन नाममात्र था। लेकिन टीम में शामिल युवाओं के लिए यह सिर्फ रोज़गार नहीं, शहर में एक नई पत्रकारिता को स्थापित करने की ज़िद थी। उस दौर की टीम में कई ऐसे नाम थे जो आज मुख्यधारा की चकाचौंध से दूर हैं, लेकिन उनके बिना शुरुआती सफर अधूरा था जैसे स्व. सुरेश राठौर, राजेन्द्र पुरोहित, धर्मेश यशलाहा, विमल गुप्ता, गोकुल शर्मा, वर्षा जोशी, सुधा साकल्ले, सुनीता तिवारी, हीरालाल शर्मा, शेखर जैन सहित दर्जनों लोग है जिनके बारे में कम ही लोग जानते है। क्योंकि इनमें से आधे लोगों ने कुछ समय बाद 2-3 साल तक काम किया फिर पारिवारिक-आर्थिक मजबूरियों के चलते यह नौकरी छोड़ दी। जिन्होंने उस वक्त नौकरी नहीं छोड़ी उनमें से कई आगे चलकर संपादक बने और स्टार रिपोर्टर कहलाए। इन गुमनाम नायकों में से कोई डाक विभाग संभाल रहा था, तो कोई कंपोजिंग कर रहा था, कोई टेलीफोन ऑपरेटर था तो कोई खेल की खबरों में आंकड़े दुरुस्त कर रहा था और कोई फ्रंट पेज देखता था।
डिजिटल क्रांति से पहले का वह दौर 'हस्तलिखित कॉपियों' का था। रिपोर्टर की लिखावट कई बार डीटीपी ऑपरेटरों के लिए किसी पहेली से कम नहीं होती थी। एक दिलचस्प वाकया उस समय की कार्यसंस्कृति को बखूबी बयां भी करता है। उस किस्से को भी मैं आप सभी लोगों से अगली कड़ियों में साझा करूंगा। वह दौर ऐसा था जहाँ एक पत्रकार की पहचान केवल उसकी खबर से नहीं, बल्कि कागज़ पर उतरे उसके साफ-सुथरे अक्षरों से भी होती थी।
₹400 का वेतन और 'जुनून' की कीमत - आज के दौर में शायद यह अविश्वसनीय लगे, लेकिन उस समय पत्रकारिता का आर्थिक ढांचा बेहद संघर्षपूर्ण था। कई लोगों ने ₹350-400 के मासिक वेतन पर काम शुरू किया था। वादा था कि कुछ समय बाद यह ₹600 हो जाएगा। जब वक्त पर यह बढ़ोतरी नहीं हुई, तो कईयों को भारी मन से अपने रास्ते अलग करने पड़े। यह उस दौर की कड़वी हकीकत थी जहाँ जुनून इज्जत तो भरपूर थी, लेकिन जेबें अक्सर खाली रहती थीं।
संस्थान के भीतर का मानवीय कोलाहल - अखबार का दफ्तर केवल खबरों का घर नहीं होता, वह मानवीय भावनाओं का अखाड़ा भी होता है। वहाँ आपसी खींचतान भी होती है, राजनीति भी और जबरदस्त टकराव भी। कुछ साथी बेहद शांत रहकर काम की गहराई में डूबे रहेंगे, तो कुछ का मिजाज थोड़ा गरम रहेगा। इतिहास हमेशा 'विजेताओं' और 'नेताओं' का लिखा जाता है। प्रोडक्शन स्टाफ, सर्कुलेशन की टीम या डेस्क पर रातें काली करने वाले सब-एडिटर्स अक्सर गुमनाम रह जाते हैं। मेरी यह सीरीज़ इस धारणा को तोड़ने की एक कोशिश भर रहेगी। दैनिक भास्कर इंदौर के इस विशाल स्वरूप के पीछे उन अनगिनत हाथों का भी श्रम है, जिन्हें कभी 'क्रेडिट लाइन' नहीं मिली। शायद वर्षों बाद अब वक्त आ गया है कि इतिहास इन गुमनाम नायकों की आवाज़ को न केवल सुने, बल्कि उन्हें वह सम्मान भी दे जिसके वे हकदार हैं!
(अगली किस्त में पढ़िए: 4 अप्रैल 1986 का दैनिक भास्कर का फ्रंट पेज जिस पर दिवंगत पत्रकार सुरेश राठौर साहब एवं विमल गुप्ता जी की बायलाइन से छपी फ्रंट पेज की आठ कॉलम वाली पूरी लीड स्टोरी जिसमें 7 फोटोज के साथ शीर्षक दिया गया है: "शाहबानो - कल तक न्याय के लिए चौखटें चूमती, आज सत्ता की वहशी !" इसे पढ़कर आप सभी को शाहबानो का एक अलग ही रूप देखने को मिलेगा जो शायद ही किसी को पता हो!) #दैनिक_भास्कर_इंदौर_लॉन्चिंग_टीम_के_गुमनाम_नायक #सीरीज_01 #डीबी_कॉर्प #इतिहास #हिंदी_पत्रकारिता #मीडिया_जगत #दिवंगत_पत्रकार_सुरेश_राठौर

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