अपने घर की ओर: बेनेट यूनिवर्सिटी का सालाना जलसा Uphoria 2026
एक ख़ुशबू, एक आवाज़, एक याद जो वक़्त के साथ धुंधली नहीं पड़ती बल्कि और गहरी होती जाती है। भारत के सबसे पुराने और बड़े मीडिया घराने द टाइम्स ग्रुप की ग्रेटर नोएडा स्थित बेनेट यूनिवर्सिटी मेरे लिए कुछ ऐसी ही जगह है। पिछले चार दिन से मैं दिल्ली एनसीआर में था। मगर ये कोई आम सफ़र नहीं था। ये एक वापसी थी उस घर की तरफ़, जहाँ मैंने ज़िंदगी जीना सीखा। मेरी अपनी यूनिवर्सिटी के वार्षिक उत्सव "युफोरिया 2026" में एक एलुमनाई की हैसियत से शिरकत करने का मौक़ा मिला था।
नवंबर 2025 में जब मेरा दीक्षांत समारोह हुआ था, उसी रोज़ मैंने अपने दिल में एक क़रार कर लिया था कि मैं उन लोगों में से नहीं बनूँगा जो किसी जगह से निकलते हैं तो वापस पलट कर नहीं देखते! जो रिश्ते ज़िंदगी ने मुझे यहाँ दिए, उन्हें महज़ यादों की किताब में या डायरी के पन्नों में बंद नहीं बंद नहीं रखूंगा कभी! रहे सहे में इस बेहतरीन मिलन से बेहतर बहाना क्या हो सकता था एक ही परिसर में एक ही महफ़िल में सभी से मुलाक़ात। जूनियर, सीनियर, अलुम्नाई, प्रोफ़ेसर सब एक साथ। मन में ठान चुका हूं कि हर साल युफोरिया पर अपनी हाज़िरी तो लगेगी।
पहला दिन: 14 फ़रवरी वैलेंटाइन डे और वापसी -
13 तारीख़ की रात, मैं और मेरी दोस्त जिया जैन इंदौर से निकले। 14 की सुबह दिल्ली पहुँचे और वहाँ से ग्रेटर नोएडा की राह पकड़ी अपने "घर" की तरफ़। यूनिवर्सिटी के गेट पर पहुंचते ही कुछ हुआ मेरे मोबाइल का वाईफाई अपने आप उस पुराने नेटवर्क "STUD" से जुड़ गया। वहां रहते हुए जिस नेटवर्क को हम सबसे खराब कहते थे आज उस दर पर पहुंचते ही सबसे तेज़ी से जैसे तार जुड़ चुके थे। बस, यही एक वो लम्हा था। इंस्टाग्राम पर एक रील देखी थी कि, "जिस घर का वाईफाई अपने आप कनेक्ट हो जाए, समझ लो वो घर तुम्हारा है।" उस पल ये बात जो महज़ एक कैप्शन नहीं बल्कि सच हो गया।
मुझे मेरे दोस्त हर्ष नायर का भी इंतज़ार था। हम चार यार का एक ग्रुप है "C1-310 BiAbNeHa", हर्ष (पुणे से), अभिनव श्रीवास्तव (मिर्ज़ापुर से), बिशाल साहा (शिलांग से) और मैं। हर्ष उस दिन पुणे से फ्लाइट लेकर सीधे पहुँच गया था। C1-310 हॉस्टल के उस कमरे की यादें ज़हन में कौंध गईं भेल बनाना, रात को कोल्ड कॉफी पीना, कभी सुबह के 3 बजे ज़ोमेटो से ऑर्डर करना वो सबकुछ, वो सारा बेफ़िक्र वक़्त।
मेनगेट पर हर्ष और मैंने साथ में रजिस्ट्रेशन किया उसके बाद C-10 में हम दोनों को कमरा मिला। नहाया, तैयार हुआ और नीचे उतरा माही से मिलने। माही मेहता जो बेनेट यूनिवर्सिटी में पूरे समय मेरी सबसे अच्छी दोस्त रही। लोगों ने अलग करने की फूट डालने की कोशिशें भी की पर दोस्ती का वो बंधन टूटा नहीं। भला टूटेगा भी कैसे आखिर 50-55 साल से ज्यादा पुराना रिश्ता जो है। जी हाँ, पढ़ने वाले जानकार ताज़्जुब करेंगे कि एक परिवार ऐसा भी है जो दोस्ती की यह परंपरा तीन पीढ़ी से निभा रहा है। मेरे दादाजी के सबसे खास मित्र रहे स्व. रमेशचंद्र मेहता की पौत्री है माही। उनका पूरा परिवार दूर-दूर के रिश्तेदार तक सब हमें जानते है। जानेंगे भी क्यों न 35-40 साल पहले दादाजी दादी पापा बुआजी को लेकर और उनके परिवार में सब उस ज़माने में साथ घूमने जाते थे। कभी वैष्णो देवी, कभी अमृतसर, कभी आगरा आदि। वहीं परंपरा बाद में पापा और आतिश अंकल भी निभा रहे हैं। साल में एक बार जब हम घूमने जाते है तो दोनों परिवार अक्सर साथ जाते है। पिछले वर्ष 2025 में भी जगन्नाथ पुरी, कोणार्क और विशाखापट्टनम हम साथ गये थे। ख़ैर, बेनेट में माही ने मेरे एमएस एक्सेल के कई सारे असाइनमेंट्स भी बनाए और हर मुश्किल में मेरे साथ खड़ी रही। उससे मिला, फिर मेस में साथ खाना खाया। वहीं खाना जिसे कभी मजबूरी में खाना पड़ता था आज वही रोटी-सब्ज़ी किसी नेमत जैसी लगी। कैम्पस का माहौल देखते ही बनता था। वैलेंटाइन्स डे था हर तरफ़ फूल, टेडी बियर के स्टॉल्स, फोटो बूथ, रंग-बिरंगे झूले, कोलंबस ब्रेकडांस आदि। इस बार युफोरिया में SHEIN, Bisleri, Monster Energy ड्रिंक जैसे ग्लोबल ब्रांड्स स्पॉन्सर्स थे। पूरा परिसर एक मेले में बदल गया था।
शाम को प्रॉम नाइट थी। बेनेट यूनिवर्सिटी की प्रॉम नाइट पिछले दो सालों से सोशल मीडिया पर धमाल मचा रही है। प्रॉम के कपल डांस वाली किसी रील पर 1 करोड़, तो किसी पर 8 मिलियन, 4 मिलियन व्यूज़। इस बार भी वो जादू बरक़रार था। सब ने खूब डांस किया, प्रॉम के बाद डीजे नाइट के लिए प्रख्यात डीजे श्रुति धस्माना ने रात के 2 माहौल बनाए रखा। थक कर चूर हो गए फिर भी फूड स्टॉल्स से खाना खाया और अपने अपने कमरे में पहुंच कर मानो गिर ही पड़े। बिस्तर पर लेटते ही नींद आ गई।
दूसरा दिन: 15 फ़रवरी सुफ़ियाना शाम -
सुबह क़रीब 10 बजे आँख खुली। आज दो रिश्तों की सालगिरह थी मेरे दादाजी-दादीजी की 51वीं और माँ-पापा की 24वीं विवाह वर्षगांठ। पहले उन्हें कॉल किया बातें कीं फिर नहा-धोकर तैयार हुआ। आज का दिन अपने साथ एक अलग खुशी लाया था। मैं और माही जब साथ बैठे थे तब टाइम्स स्कूल ऑफ मीडिया- TSOM के रेडियो स्टूडियों और टीवी स्टूडियो के दीपक सर और आशीष सर से मुलाक़ात हो गई बड़े दिनों बाद उनसे बातें हुईं। वो बातें जो सिर्फ़ एक उस्ताद और शागिर्द के बीच होती हैं।
उसके बाद माही के साथ चिल्ली पोटेटो खाते हुए मुलाक़ात हुई ईशानी घोष दीदी से, जो मुझसे दो साल सीनियर थी। बेनेट से उन्होंने बीएजेएमसी किया फिर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल से एमबीए किया और अब यहीं बेनेट से वो पीएचडी कर रही हैं। उनसे बहुत देर तक बात हुई। यूजीसी नेट को लेकर उनसे मैंने मार्गदर्शन लिया।
फिर शाम की तैयारी शुरू हो गई आज की थीम ट्रेडिशनल थी। मैंने काला कुर्ता पाजामा और खासतौर से सफ़ेद चप्पल पहनी। रात का आग़ाज़ हुआ डीजे साहिब के साथ और फिर आया बिस्मिल। मशहूर सूफ़ी गायिक बिस्मिल जब मंच पर आए, तो हवा का रुख़ ही बदल गया। वो महफ़िल, वो शेर-ओ-शायरी, वो कैफ़ियत वहाँ मौजूद हर इंसान एक ही आलम में था। मुझे मेरे फर्स्ट ईयर 2022 के युफोरिया की याद आ गई जब फेस्ट के दूसरे दिन निज़ामी बंधु आए थे। उसके बाद से आज पहली बार लगा कि वैसी ही रूह को छूने वाली सूफ़ियाना शाम नसीब हुई। "वाह" निकलना बंद नहीं हो रहा था किसी के भी मुँह से। बिस्मिल के बाद डीजे कशिश का सिलसिला शुरू हुआ इतने में रात के 3:30 बज गए। आँखें बंद हो रही थीं, पर दिल अभी भी डीजे की धुन पर नाचने के लिए कुलांचे मार रहा था।
तीसरा दिन: 16 फ़रवरी हार्डी संधू और एक अनजान दोस्त -
सुबह उठा 11 बजे। आज हर्ष और अभिनव के साथ वो नाश्ता किया जो मैं इंदौर से लाया था। नवरतन स्वीट्स एंड नमकीन की फेमस मैगी मसाला सेव, रोस्टेड पीनट्स, खाकरा और इंदौर की इस नमकीन की बात ही कुछ अलग है। दिन आराम से गुज़रा। शाम में सब दोस्तों ने मिलकर तय किया आज झूला भी झूलेंगे। कोलंबस पर बैठे खूब मज़ा आया, देर तक घूमते रहे।फिर तैयार होने गया आज का आउटफिट ब्राउन लेदर जैकेट, अंदर व्हाइट टीशर्ट और ब्लैक जींस। और तभी बिना किसी पूर्वयोजना के एक मुलाक़ात हुई। मुझे जहाँ रूम अलॉट हुआ वहां एक अनजान चेहरा मिला स्पर्श सिंह मथुरा से। मैं उसके पास फास्ट चार्जर माँगने गया था। उसके कमरे में थोड़ी देर बैठा और उसने कहा, "भाई, यार आपको कहीं देखा है।" मैंने कहा, "कहाँ ही देखा होगा, तुम तो बाहर से हो।" उसने नाम पूछा। मैंने कहा, "नैवेद्य पुरोहित।" वह कह उठा, "अरे भाईया! आप हैं! मैं अदिति अग्रवाल का दोस्त हूँ।"
और बस बातों का सिलसिला शुरू हो गया। उसके रूममेट्स भी मौजूद थे केशव गर्ग (हिसार से) और पीयूष गोयल (गाज़ियाबाद से)। मेरी आदत के मुताबिक़ उन्हें भी इंदौर की नमकीन खिलाई खाते ही उनकी आँखें चमक उठीं उन तीनों को बहुत अच्छी लगी। ये है इंदौर की नमकीन का जादू किसी को नापसंद नहीं कभी नहीं आयेगा।
रात 11 बजे शुरू हुआ हार्डी संधू (Harrdy Sandhu) का कॉन्सर्ट। हार्डी संधू के सिर्फ़ दो गाने जानता हूँ मैं, "क्या बात है" और "बिजली-बिजली"। मुझे पंजाबी गाने वैसे भी कम समझ आते हैं। लेकिन वहाँ खड़े होकर, उस भीड़ के जोश के साथ घुलकर, मैंने भी थोड़ा वाइब कर ही लिया। रात 1 बजे कॉन्सर्ट ख़त्म हुआ। सबने मिलकर एम ब्लॉक वाली पेड मेस से खाना मँगवाया बैठकर, साथ में उस बेफ़िक्री के साथ खाया जो सिर्फ़ दोस्तों के दरमियान होती है। सब थक कर चूर थे फिर भी नीचे हम 3:30 तक घूमते रहे। कमरे में पहुँचा तो नींद नहीं आ रही थी। मन में एक ही ख़याल था अब कल निकलना होगा। और वही रोज़ की दुनिया में वापस।
3 दिन कैसे गुज़र गए, पता ही नहीं चला -
एक ख़याल आया काश माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में एमए इन डिजिटल जर्नलिज़्म कोर्स यहाँ बेनेट में होता, तो मैं यहीं से करता। मगर फिर ख़ुद को रोका यह कहकर "जो खोया उसका ग़म नहीं, जो पाया वो किसी से कम नहीं। जो नहीं है वो ख़्वाब है और जो है, वो लाजवाब है!" घड़ी देखी रात के 5:40 हो चुके थे। मैं उठा, जैकेट पहनी और अकेला निकल पड़ा फुटबॉल फील्ड की तरफ़। कैंपस एकदम ख़ाली था, सुबह की ख़ामोशी में डूबा हुआ। और अकेला वहाँ, उस मैदान के किनारे खड़े होकर, मैंने सनराइज़ देखा। उस लम्हे में कोई शोर नहीं था, कोई कॉन्सर्ट नहीं, कोई डीजे नहीं। सिर्फ़ एक एहसास एक और उगते सूरज की नर्म रोशनी में डूबा हुआ वो कैंपस जो कभी मेरा घर हुआ करता था। सुबह हर तरफ घूमा। हर कोने को, हर गलियारे को। जैसे विदा लेने से पहले एक आख़िरी बार सब को याद में क़ैद कर लूँ।
वापसी -
नाश्ते के बाद स्पर्श, केशव और पीयूष से मिला। क़रीब डेढ़-दो घंटे उनके साथ बैठा कमरे में फिर नहाया, तैयार हुआ, सामान पैक किया और कमरा ख़ाली कर दिया। बेनेट को अलविदा कहकर मैं, माही और जिया निकले पास ही द ग्रैंड वेनिस मॉल। वहाँ देखी फ़िल्म "ओ रोमियों"। फिल्म की समीक्षा पर बाद में चर्चा करेंगे, पिच्चर 1 बजे शुरू हुई और 4:15 पर ख़त्म। बाहर निकले, कैब बुक की, माही को बाय किया वो बेनेट वापस चली गई और हम बस स्टैंड पहुँचे। शाम 7:15 की खन्ना मार्केट से राज रतन टूर्स एंड ट्रेवल्स की वॉल्वो बस थी और सुबह 9 बजे इंदौर पहुंच गया।
इस पूरे सफ़र में मन के अंदर साल 2012 में रणबीर कपूर की हिट मूवी "बर्फ़ी" का एक ही गाना बजता रहा:
"फिर ले आया दिल...मजबूर क्या कीजे...रास ना आया रहना दूर, क्या कीजे...दिल कह रहा उसे मुकम्मल...कर भी आओ
वो जो अधूरी सी बात बाकी है...!" बेनेट में क़दम रखते ही लगा था अपने घर लौट आया और जाते वक़्त समझ आया घर वो नहीं होता जहाँ आप रहते हैं। घर वो होता है जहाँ से जाने का मन कभी नहीं करता पर जाना पड़ता है!
~ नैवेद्य पुरोहित
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अच्छा कॉलेज यात्रा वृतांत है, बढ़िया लिखा है, जो नहीं है वह ख्वाब है और जो है वो लाजवाब हैं,......... इसी के साथ आगे बढ़ते चलो, चलना ही जिंदगी है........ रुकने से, या ठहरने पर शुद्ध पानी में भी कीड़े पड़ जाते हैं, इसलिए उम्मीद है कॉलेज लाइफ़ की खुमारी,जल्दी उतर जाएगी और नए लक्ष्य का सामना जल्दी करोगे और उसे हासिल करोगे।
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