अनुभव सिन्हा की नज़र से बलात्कार और समाज का एक डरावना आईना

कल शाम भोपाल के सिनेपोलिस आशिमा मॉल में अपनी दोस्त कीर्ति शर्मा के साथ मैंने फिल्म अस्सी देखी। आर्टिकल 15, मुल्क, थप्पड़, भीड़ जैसी मूवीज़ के बाद अनुभव सिन्हा ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वो एक ज़िंदा ज़मीर के साथ काम करने वाले कलाकार हैं। यह फिल्म देखते वक्त सीना भारी हो जाता है और यही इसका मकसद भी है।
हर बीस मिनट में लाल रोशनी - फिल्म की सबसे ताकतवर सिनेमाई ज़ुबान यह है कि हर बीस मिनट में पर्दे पर एक लाल रोशनी चमकती है। यह विज़ुअल ट्रिक है दर्शकों को याद दिलाने के लिए कि हिंदुस्तान में हर बीस मिनट में एक बलात्कार होता है। रोज़ाना अस्सी। साल में तीस हज़ार। अनुभव सिन्हा यह आंकड़ा आपके ज़ेहन में ठोकना चाहते हैं और वो कामयाब भी होते हैं। जब वो लाल रोशनी आती है, तब दिल में एक धक्का लगता है कि अपनी मातृभूमि पर जिन लोगों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए क्या इसीलिए कि यहां हर बीस मिनट में अभी, इस लम्हे, कहीं कुछ बुरा हो रहा होगा।
मनोज पाहवा का किरदार: मीठी ज़ुबान में ज़हर - मनोज पाहवा ने जो किरदार उनकी परफॉर्मेंस रूह को हिला देती है। एक सीन में वो अपने बेटे के साथ बाहर छोले भटूरे खाने जाते हैं और उस मेज़ पर डबल मीनिंग बातें कहते हैं। वो कहते हैं, "बेटा, मेरी पत्नी घर पर बहुत अच्छा खाना बनाती है पर छोले भटूरे बाहर खाने आता हूँ! घर अपना हमेशा साफ रहना चाहिए, बाहर कितनी भी गंदगी हो।" और फिर रेट साठ रुपये, नब्बे रुपये तय होते हैं। मनोज पाहवा ने जो किरदार निभाया है ऐसे इंसान हमारे आसपास कई मिल जाएंगे। कोई अजीब नहीं लगता।
रेप पीड़िता की हिम्मत और बुज़दिल समाज - फिल्म में रेप पीड़िता हिम्मत करके स्कूल जॉइन करने जाती है क्योंकि ज़िंदगी को आगे ले जाना चाहती है, अपने ज़ख्मों को पीछे छोड़ देना चाहती है। मगर प्रिंसिपल मैडम के अल्फाज़ सुनकर दिल डूब जाता है।प्रिंसिपल कहती है, "हम रेडी नहीं हैं आपके जॉइन करने के लिए लेकिन बच्चे बातें कर रहे हैं।" और जब पीड़िता कहती है कि बच्चे भूल जाएंगे तो मैडम कहती है, " वे आपको भूलने नहीं देंगे।" नौवीं कक्षा के बच्चे खुद की टीचर पर इस हालत में मीम्स बना रहे हैं। कार्टून्स। व्हाटसअप ग्रुप्स पर लिख रहे है कि उस रात मुझे क्यों नहीं इनवाइट किया। वास्तव में दर्द यह है कि यह सब आजकल बड़े स्कूलों में हो रहा है, यह कोई कल्पना नहीं है। प्रिंसिपल जब कहती है, "हमेशा हमारे स्कूल का रिज़ल्ट बेस्ट आता था पर आज पूरा स्कूल फेल हो गया।" यह एक लाइन पूरी फिल्म का निचोड़ लगती है।
कुमुद मिश्रा: छतरी मैन का दर्द - कुमुद मिश्रा एक ऐसा किरदार है जो अपने अंदर खामोशी में आग लेकर चलता है। वह 2 रेप आरोपियों का क़त्ल कर देता है तीसरे आरोपी तक पहुँचता है तो उस समय वो अपनी गर्लफ्रेंड के साथ होता है, गर्लफ्रेंड छतरी मैन का वीडियो बना रही होती है और गोली चल जाती है। यहाँ एक सवाल उठता है क्या इंसाफ न मिलने पर एक अकेला आदमी खुद इंसाफ कर सकता है और क्या वो रास्ता सही है?
मरने के बाद आदमी कुछ नहीं बोलता - फिल्म में एक सीन आता है जब आरोपी की मौत के बाद रेप पीड़िता कहती है, "किसी के मरने से पहली बार दुखी लग रहा है मुझे।" दूसरा सीन जब कोर्टरूम में तापसी पन्नू एएसआई संजय को उदय प्रकाश की कविता कहती है। "आदमी मरने के बाद कुछ नहीं सोचता। आदमी मरने के बाद कुछ नहीं बोलता। कुछ नहीं सोचने और कुछ नहीं बोलने पर आदमी मर जाता है।" यह मौत की बात नहीं, खामोशी की बात है। उस खामोशी की जो समाज पीड़िता पर थोप देता है। "अस्सी" एक ऐसी फिल्म है जो एंटरटेन करने नहीं, झंझोड़ने आई है। यह फिल्म उर्दू अल्फाज़ो की तरह है जो गहरी बात को मुलायम ज़ुबान में कहने की कोशिश करता है, मगर दिल में घाव छोड़ जाता है। ~ नैवेद्य पुरोहित #ASSI #अस्सी #फिल्म_समीक्षा #अनुभव_सिन्हा #तापसी_पन्नू #कुमुद_मिश्रा #मनोज_पाहवा #नसीरुद्दीन_शाह

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