छत्रपति शिवाजी महाराज जयंती पर ‘हिन्दवी स्वराज्य दर्शन’ की सारगर्भित पुस्तक चर्चा, स्व-बोध और स्वराज्य के विचारों पर हुआ मंथन
(नैवेद्य पुरोहित)
छत्रपति शिवाजी महाराज जयंती के पावन अवसर पर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल में पत्रकारिता विभाग के कॉन्फ़्रेंस हॉल में लेखक लोकेन्द्र सिंह की चर्चित पुस्तक “हिन्दवी स्वराज्य दर्शन” पर एक विशेष पुस्तक चर्चा कार्यक्रम आयोजित किया गया था। फाल्गुन मास में दोपहर 3 बजे आयोजित इस कार्यक्रम का संचालन उद्यांश पांडेय ने किया एवं अतिथि शिक्षिक विजयश्री नेमा की गरिमामयी उपस्थिति रही।
यह पुस्तक मूलतः एक यात्रा वृत्तांत है, जिसमें ऐतिहासिक दृष्टिकोण का समावेश करते हुए छत्रपति शिवाजी महाराज के दुर्गों की दर्शन-यात्रा का जीवंत और प्रेरक वर्णन प्रस्तुत किया गया है। चर्चा के दौरान बताया गया कि लेखक ने पुणे से लगभग 50 किलोमीटर दूर रायरेश्वर पहाड़ी से अपनी ऐतिहासिक यात्रा आरंभ की। यहीं वह पावन स्थल है जहाँ किशोर अवस्था में शिवाजी महाराज ने अपने साथियों के साथ हिंदवी स्वराज्य की स्थापना का संकल्प लिया था।
चर्चा में पुरंदर दुर्ग से प्रतापगढ़ तक विभिन्न किलों के ऐतिहासिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला गया। पुरंदर के युद्ध में मुरारबाजी देशपांडे के अद्वितीय पराक्रम का उल्लेख करते हुए यह बात भी स्पष्ट हुई कि 11 जून 1665 की पुरंदर संधि, जिसमें शिवाजी महाराज को 23 किले सौंपने पड़े, वस्तुतः पराजय नहीं बल्कि एक दूरदर्शी कूटनीतिक रणनीति थी।
कार्यक्रम का सबसे प्रभावशाली पक्ष शिवाजी महाराज के “स्व” की अवधारणा पर केंद्रित रहा। उन्होंने कभी “मराठा साम्राज्य” की संकीर्ण परिभाषा नहीं अपनाई, बल्कि सदैव “हिंदवी स्वराज्य” की व्यापक संकल्पना को आगे बढ़ाया। उनके पत्राचार और नीतियों में यही दृष्टि परिलक्षित होती है।
भाषा और संस्कृति के संरक्षण पर भी विशेष चर्चा हुई। शिवाजी महाराज ने अपने अष्टप्रधान मंडल में भाषा की शुद्धता और स्वदेशी अस्मिता को प्राथमिकता दी तथा राजकीय मुद्रा को संस्कृत में अंकित कराया। इस संदर्भ में इजरायल और तुर्की जैसे राष्ट्रों के उदाहरण भी हुए, जहाँ स्वराज्य के साथ भाषा के पुनर्जीवन का प्रयास हुआ।
समुद्री शक्ति के निर्माण को लेकर भी शिवाजी महाराज की दूरदृष्टि पर प्रकाश डाला गया। जलदुर्ग, सिंधुदुर्ग और कोलाबा जैसे समुद्री किलों के निर्माण के माध्यम से उन्होंने भारतीय नौसैनिक शक्ति की नींव रखी। इसके अतिरिक्त, उनकी छापामार युद्धनीति (गुरिल्ला वॉरफेयर) को आधुनिक सैन्य रणनीति का आधार बताया गया। शत्रुओं द्वारा उपहास किए जाने के बावजूद शिवाजी महाराज की रणनीतिक सूझबूझ और लक्ष्य के प्रति अडिगता आज भी प्रेरणास्रोत है।
कार्यक्रम में पुस्तक प्रेमी विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। प्रश्नोत्तर सत्र में अंकित आनंद, कमलेश कुलमी, गौतम चौधरी आदि ने पुस्तक के विभिन्न आयामों पर जिज्ञासाएँ व्यक्त कीं। चूंकि हम सभी पत्रकारिता एवं संचार के विद्यार्थी है तो सत्र में यह भी रेखांकित किया गया कि एक सशक्त संचारकर्ता छत्रपति शिवाजी महाराज की तरह है जो स्वयं चिंतन करता है और वहीं बात दूसरों को भी सोचने के लिए प्रेरित करता है।
“हिन्दवी स्वराज्य दर्शन” जैसी किताबें केवल एक यात्रा-वृत्तांत नहीं रहती, बल्कि इतिहास, प्रेरणा और स्व-बोध का सशक्त दस्तावेज बन जाती है। कार्यक्रम का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि हमें अपने नायकों को जानना, उनके विचारों को आत्मसात करना और अपनी भाषा व संस्कृति पर गर्व करना चाहिए।
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